मेरी सांसें अभी थमी नहीं...
फिर उठूंगा, चल पडूंगा।
चुप हूँ लेकिन थमा नहीं...
आग हूँ, फूंको जरा...
फिर जल पडूंगा।
अमिताभ
गुरुवार, 15 अप्रैल 2010
शनिवार, 10 अप्रैल 2010
बुधवार, 7 अप्रैल 2010
एक क्रांति बनकर सारी दुनिया बदल जाऊंगा
दो-चार पंख क्या काट लिए
सोचते हो मैं उड़ना भूल जाऊंगा...
हौसलों की उड़ान अभी बाकी है...
तुम देखनाएक दिन...
आसमान छूकर आऊंगा।
अपनी हद से भी गुजरकर देख लो...
मैं नहीं डरूंगा...
तुम्हारे बीच से निकलूंगा....
और तुम्हारा गढ ढ़हा जाऊंगा।
मेरी दुम नहीं, जो हिलाता फिरूं
यहां-वहां, सबके आगे...
तुम तानाशाह बनकर देख लो...
मैं आंधियों-सा आऊंगा...
एक क्रांति बनकर..
सारी दुनिया बदल जाऊंगा।
अमिताभ बुधौलिया
दो-चार पंख क्या काट लिए
सोचते हो मैं उड़ना भूल जाऊंगा...
हौसलों की उड़ान अभी बाकी है...
तुम देखनाएक दिन...
आसमान छूकर आऊंगा।
अपनी हद से भी गुजरकर देख लो...
मैं नहीं डरूंगा...
तुम्हारे बीच से निकलूंगा....
और तुम्हारा गढ ढ़हा जाऊंगा।
मेरी दुम नहीं, जो हिलाता फिरूं
यहां-वहां, सबके आगे...
तुम तानाशाह बनकर देख लो...
मैं आंधियों-सा आऊंगा...
एक क्रांति बनकर..
सारी दुनिया बदल जाऊंगा।
अमिताभ बुधौलिया
शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010
मेरे पिता श्री कंठमणि बुधौलिया वर्षों समाजवादी आंदोलन से जुडे रहे। मीसा के दौरान जेल यात्रा की। बीडी मजदूरों के हित में कई बडे आंदोलन किए। फिलहाल, वकालात कर रहे हैं। उनकी लिखी एक विद्रोही गजल..
बूढे दरख्त सा चरमरा रहा हूं...
बूढे दरख्त सा चरमरा रहा हूं...
क्रेता और विक्रेता का ही संबंध बचा है अब इंसान में,
अब तो मुश्किल पहचानना यारो अंतर घर और दुकान में॥
देखो खादी विचार नहीं अब लाइसेंस है आखेट का,
चित्र लगाकर बैठे हैं शिकारी गांधी का अब मचान में॥
चित्र लगाकर बैठे हैं शिकारी गांधी का अब मचान में॥
जिसने कद बढाया अपना तोडे घुटने उसके दरवारे-आम,
आखिर अंतर होता है बुनियादी सिंहासन और पायदान में॥
आखिर अंतर होता है बुनियादी सिंहासन और पायदान में॥
भाषा, संस्कृति, धर्म-मजहब के इन बूढों को तो देखो,
आतिशबाजी का खेल-खेलते हैं आस्था के खलिहान में॥
आतिशबाजी का खेल-खेलते हैं आस्था के खलिहान में॥
जिनके दरवाजे बंधी हुई हैं योजना की कामधेनुएं,
यक्ष, किन्नर-वरुण देवता हैं आज के हिंदुस्तान में।
यक्ष, किन्नर-वरुण देवता हैं आज के हिंदुस्तान में।
वहेलियों के सम्मेलन में अभिनंदित होती हैं गुलेलें,
जब भी परिंदे उडान भरते हैं खुलकर के आसमान में।
जब भी परिंदे उडान भरते हैं खुलकर के आसमान में।
ये तो गलतबयानी दोस्तों इतिहास उठाकर देख लो,
मुर्दों ने कब विद्रोह किया है जाकर के श्मशान में।
मुर्दों ने कब विद्रोह किया है जाकर के श्मशान में।
बोटी देखकर दुम हिलाए वरना काटे और गुर्राए,
कुत्ते जैसी सीरत देखो दफ्तर बैठे श्रीमान में।
कुत्ते जैसी सीरत देखो दफ्तर बैठे श्रीमान में।
न वो रौनकें, न मुक्त ठहाके महफिल भी न यार की,
बूढे दरख्त सा चरमरा रहा हूं जिंदगी की दालान में।
बूढे दरख्त सा चरमरा रहा हूं जिंदगी की दालान में।
गुरुवार, 1 अप्रैल 2010
अनुशासनहीनता और भ्रष्टाचार पर
काका हाथरसी के दो व्यंग्य
1
बिना टिकिट के ट्रेन में चले पुत्र बलवीर
जहाँ ‘मूड’ आया वहीं, खींच लई ज़ंजीर
खींच लई ज़ंजीर, बने गुंडों के नक्कू
पकड़ें टीटी गार्ड, उन्हें दिखलाते चक्कू
गुंडागर्दी, भ्रष्टाचार बढ़ा दिन-दूना
प्रजातंत्र की स्वतंत्रता का देख नमूना
-----------------------------------
2
राशन की दुकान पर, देख भयंकर भीर
‘क्यू’ में धक्का मारकर, पहुँच गये बलवीर
पहुँच गये बलवीर, ले लिया नंबर पहिला
खड़े रह गये निर्बल, बूढ़े, बच्चे, महिला
कहँ ‘काका' कवि, करके बंद धरम का काँटा
लाला बोले - भागो, खत्म हो गया आटा
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काका हाथरसी के दो व्यंग्य
1
बिना टिकिट के ट्रेन में चले पुत्र बलवीर
जहाँ ‘मूड’ आया वहीं, खींच लई ज़ंजीर
खींच लई ज़ंजीर, बने गुंडों के नक्कू
पकड़ें टीटी गार्ड, उन्हें दिखलाते चक्कू
गुंडागर्दी, भ्रष्टाचार बढ़ा दिन-दूना
प्रजातंत्र की स्वतंत्रता का देख नमूना
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2
राशन की दुकान पर, देख भयंकर भीर
‘क्यू’ में धक्का मारकर, पहुँच गये बलवीर
पहुँच गये बलवीर, ले लिया नंबर पहिला
खड़े रह गये निर्बल, बूढ़े, बच्चे, महिला
कहँ ‘काका' कवि, करके बंद धरम का काँटा
लाला बोले - भागो, खत्म हो गया आटा
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