सोमवार, 24 अगस्त 2009

बातचीत/अखलाक मोहम्मद खान उर्फ शहरयार

नेशनलिज्म का उन्माद एक खतरनाक चीज

अमिताभ बुधौलिया 'फरोग'
उमराव जान(1981) और गमन(1978) जैसी चर्चित फिल्मों के गीतकार ख्यात शायर शहरयार हिंदुस्तानियों में ‘नेशनलिज्म’ के उन्मादी स्वरूप को खतरनाक मानते हैं। हालांकि वे यह भी कहते हैं कि राष्ट्रवाद के नाम पर पनपने वाला ‘वैचारिक व्याभिचार’ लंबे समय तक जीवित नहीं रहता। हिंदुस्तानियों में सभ्यता और संस्कृति का जो भाव पहले था; वह आगे भी कायम रहेगा। शहरयार भारत भवन में आयोजित ‘काव्य पाठ’ श्रंखला में शिरकत करने आए हुए थे।

आज के दौर में दिल क्या ‘चीज’ है...
मुद्दा हिंदुस्तानी संस्कृति/तहजीब या सांप्रदायिक सौहार्द्र की भावनाओं को सहेजने वाले दिल का हो या आम हिंदुस्तानी के जजबातों का; दिल अब भी वही है; जहां पहले था। इसकी धड़कनें हिंदुस्तान की पुरानी वैल्यूज के साथ आज भी जिंदा हैं। यह जरूर है कि बहुत से लोग उसकी धड़कनों को अनसुना करने की असफल कोशिशें करते रहते हैं। फिलहाल, हम आज हिंदुस्तान में जो भी बुरा बदलाव देख रहे हैं-चाहे वो सामाजिक हो राजनीतिक या सांप्रदायिक; वह ताउम्र यथावत नहीं रहने वाला। राजनीति की बात करें, तो चुनावों के दौरान हिंदुस्तानी जिस गुस्से/भावना का इजहार करते हैं, वह यह दर्शाता है कि ज्यादातर लोग हिंदुस्तान को उसी शक्ल में देखना चाहते हैं, जैसा पहले था, पवित्र और सौहार्द्रपूर्ण।
जिन्ना: इंडिया-पार्टीशन-इंडेपेंडेंस :
मेरा सोचना तो यह है कि पाबंदी किसी भी चीज पर नहीं होनी चाहिए। यह सब जानते हैं कि जिस चीज पर जितनी पाबंदी लगाई जाती है, वह उतनी ही तीव्र प्रतिक्रिया देती है। हर चीज को उसके अंजाम तक पहुंचने देना चाहिए, चाहे वो अच्छी हो या बुरी। मामला जसवंत सिंह की किताब का हो या दूसरी किसी अन्य का; लिखने-पढ़ने से कोई गुमराह नहीं होता। बुराइयां आंतरिक भावनाओं की उपज हैं। कभी-कभार नेशनलिज्म खतरनाक भी हो जाती है।
सोच की पराकाष्ठा :
कितनी अजीब स्थिति है कि एक तरफ तो हम आधुनिक होते जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ वैलेंटाइन-डे जैसे आयोजनों का विरोध करते हैं। जहां तक सिनेमा में फूहड़ता का प्रश्न है-फिल्मों में ख्वाहिशों को उभारने के लिए छोटे-छोटे कपड़े पहने जाते हैं। कभी-कभी इन चीजों को रोकने से विस्फोटक स्थिति हो जाती है। मौजूदा फिल्मों के बारे में लोग नाराजगी जताते हैं कि फलां का संगीत अच्छा नहीं है, बावजूद वे बॉक्स आफिस पर सफल हो जाती हैं। जो लोग मानते हैं कि भारतीय समाज काफी बदल गया है, मैं उनसे सहमत नहीं हूं। शहर में रहने वाले 10-20 लोगों को ही सिर्फ समाज नहीं कह सकते। इसके लिए समूचे हिंदुस्तान को देखना होगा। दरअसल, ‘मकान’ से ‘फ्लैट’ में शिफ्ट होते ही हम खुद को आधुनिक मानने लगते हैं।
कविता पढ़ना भी परफार्मिंग आर्ट है...
मेरे मित्रों और लोगों का मानना है कि मैं शेर तो अच्छे लिखता हूं, लेकिन उन्हें उस तरह नहीं पढ़ पाता; जैसा पढ़ना चाहिए। दरअसल, कविता/शेर पढ़ना भी परफार्मिंग आर्ट में शामिल हो गया है। कई शायर/कवि चिल्लाकर या विभिन्न भाव-भंगिमाओं के संग पाठ करते हैं, मैं इसमें फिट नहीं हूं। (हंसते हुए) शेर को अच्छा पढ़ना एक खूबी है, जो ऊपर वाला देता है। मैं बदकिस्मत हूं कि मैं इस खूबी से वंचित हूं।
(यह लेख पीपुल्स समाचार, भोपाल में छपा है )

रविवार, 23 अगस्त 2009

अब भी जिंदा है ‘भय का भूत’
यह अत्यंत दिलचस्प बात है कि, एक उपन्यास जो छपने को तैयार था; का क्लाइमेक्स लेखक ने सिर्फ इस वजह से बदल दिया, क्योंकि एक युवक को वह अधूरा-सा लगा था। ‘मुहिम’ शीर्षक से प्रकाशित होने जा रहे इस उपन्यास में वर्षों चंबल घाटी में आतंक बरपाते रहे गड़रिया गिरोह के खौफ की कहानी बयां की गई है। उपन्यास के लेखक राजनारायण बोहरे पिछले दिनों भोपाल में थे। क्यों बदला गया उपन्यास का क्लाइमेक्स? एक रोचक प्रसंग...

अमिताभ फरोग
पिछले एक दशक से ग्वालियर, शिवपुरी, दतिया और श्योपुर जिले में आतंक बरपाने वाले डकैत बंधु दयाराम-रामबाबू गड़रिया हकीकत में भले ही मारे जा चुके हों, लेकिन ग्रामीण अंचलों में उनका खौफ अभी भी जिंदा है। दरअसल, गड़रिया गैंग एक उपन्यास ‘मुहिम’ का मुख्य पात्र बनकर सामने आ रहा है। गड़रिया के कर्म-कुकर्म स्थल, उनके अत्याचार का ग्रास बने ग्रामीणों और पकड़ पर केंद्रित ‘मुहिम’ को दिल्ली का एक प्रकाशन मार्केट में उतारने जा रहा है।
राजनारायण बोहरे प्रदेश के उन नामचीन कहानीकारों में शुमार हैं, जिन्होंने ग्रामीण परिवेश की जीवनशैली, विसंगतियों और खूबियों पर खूब कलम चलाई है। ‘मुहिम’ इनमें सबसे हटकर की गई कोशिश है, जो ‘चंबल घाटी’ में ‘भय के भूत’ की कहानी बयां करता है। दरअसल, इस इलाके में छुटपुट बदमाश/लुटेरे डकैतों के मारे जाने के बाद भी ग्रामीणों में उनका भय बनाए रखते हैं। ‘भय का यह भूत’ गड़रिया गैंग के रूप में आज भी जिंदा है। अक्टूबर, 2004 में ग्वालियर जिले के भंवरपुरा गांव में दर्जनभर गुर्जरों को मौत के घाट उतारकर मीडिया की सुर्खियों में आया गड़रिया गैंग मध्यप्रदेश और राजस्थान सरकार के लिए एक बड़ा सिरदर्द बना हुआ था। इसे शिवपुरी के जंगलों में एक मुठभेड़ के दौरान मार दिया गया था।
इसलिए बदला क्लामेक्स :
लेखक के मुताबिक, ‘पिछले साल एक कार्यक्रम के सिलसिले में भोपाल आना हुआ था। मेरे पास मुहिम की पांडुलिपी थी, जिसे प्रूफ करके पब्लिशर्स को भेजना था। अचानक मेरे दिमाग में विचार आया, क्यों न यह पांडुलिपी किसी को पढ़वाई जाए, ताकि ज्ञात हो सके कि उपन्यास कहीं अधूरा-सा प्रतीत तो नहीं हो रहा? मैंने उसे एक युवक को पढ़ने को दिया। उसके मुताबिक क्लामेक्स जंच नहीं रहा था। बस, मैंने क्लामेक्स बदल डालने का मूड बना लिया।’ कहानी संग्रह ‘गोष्टा तथा अन्य कहानियां’ के लिए प्रदेश का ‘साहित्य अकादमी 2001-02’और ‘वागीश्वरी-2003’ सम्मान से नवाजे जा चुके श्री बोहरे खुलासा करते हैं-‘दरअसल, पहले मुहिम का क्लाइमेक्स एक महिला पात्र केतकी की हत्या से होता है, जिसे गड़रिया बंधुओं ने अपह्रत किया था। पिछले कुछ साल पहले शिवपुरी के जंगलों में हुई मुठभेड़ के दौरान पुलिस ने दयाराम गड़रिया को मार गिराया था, लेकिन छोटे-मोटे अपराधी उसका खौफ आज भी भुना रहे हैं। नए क्लाइमेक्स में इसी सच को बयां किया गया है, ताकि लोगों को असलियत पता चल सके। वे भय के भूत से खुद को उबार सकें। ’
‘मुहिम’ में एक सनसनीखेज खुलासा किया गया है कि दयाराम के परिजनों ने उसकी तेरहवीं तक नहीं की। उन्हें भरोसा है कि दयाराम जिंदा है। लेखक संशय जाहिर करते हैं-‘हो सकता है कि उनके मन में कोई बदले की आग सुलग रही हो?’ गड़रिया को जीवित रखने का उद्देश्य? लेखक के अनुसार,‘कोई भी डर दिल से तभी निकलता है, जब हमारे भीतर हौसला जन्मे। दयाराम बेशक मारा जा चुका हो, लेकिन यहां के ग्रामीण अंचलों में अभी भी दहशत कायम है। जरूरत इसके निर्मूलन की है।’
यूं शुरू हुई ‘मुहिम’ :
पेशे से सेल्स टैक्स इंस्पेक्टर श्री बोहरे कुछ साल पहले मुरैना में पदस्थ थे। वहां कलेक्ट्रेट में अकसर उन्हें दो व्यक्ति हैरान-परेशान हाल में अफसरों के चक्कर काटते मिल जाते थे। पूछने पर पता चला कि उनमें से एक घोघा (श्योपुर) का पटवारी और दूसरा टीचर था। इन्हें गड़रिया गैंग ने अपह्रत किया था। 2001 में मुक्त होने के बाद दोनों मुरैना अपना ट्रांसफर चाहते थे, क्योंकि डकैतों का डर उनके अंदर तक बैठ गया था। दरअसल, इनकी गवाही पर ही गड़रिया बंधुओं को जेल हुई थी। श्री बोहरे के मुताबिक,‘उस वक्त मुरैना में प्रदीप खरे कलेक्टर थे। वे दतिया से तबादला होकर आए थे, इसलिए उनसे अच्छा मेल-मिलाप था। उन्हें भी लगा कि गड़रिया के खौफ के विरुद्ध ग्रामीणों में हौसला पैदा करना चाहिए।’
‘मुहिम’ का कार्यक्षेत्र :
इस उपन्यास में शिवपुरी, दतिया, ग्वालियर, मुरैना, भिंड जिले के ग्रामीण अंचलों को मुख्य आधार बनाया गया है। दयाराम हरसी गांव (ग्वालियर)में पैदा हुआ था। ‘मुहिम’ डकैत प्रभावित ग्रामीण अंचलों में भी सार्थक साबित हो सके, इसलिए इसकी भाषा में हिंदी के अलावा भदावरी(भिंड, मुरैना और श्योपुर) के अलाव पंचमहली(डबरा, भितरवार और हरसी) बोली का पुट दिया गया है। हालांकि इसमें पात्रों के नाम जरूर बदले गए हैं। जैसे-दयाराम को कृपाराम और रामबाबू को श्यामबाबू नाम दिया गया है। वहीं उनकी जाति गड़रिया के बजाय घोसी बताई गई है। लेखक स्पष्ट करते हैं-‘यथार्थ में कल्पनाओं का रंग भरना जरूरी है, ताकि लोग इसे रुचि लेकर पढ़ें और मुहिम अपने मकसद में कामयाब हो सके।’

‘फिल्मकारों और लेखकों के लिए ‘चंबल घाटी’ उर्वरा-कार्यस्थली रही है। यहां के डकैतों पर दर्जनों सफल फिल्में बनीं और किताबें-उपन्यास प्रकाशित हुए हैं। ‘मुहिम’ खौफ की इसी बानगी का नया संस्करण है। इसमें डकैतों का महिमा मंडन नहीं, बल्कि पीड़ितों की व्यथा का बखान है। मकसद दस्यु प्रभावित ग्रामीण अंचलों में खौफ के विरुद्ध खड़े हो उठने का साहस पैदा करना है।’
राजनारायण बोहरे
‘मुहिम’ के लेखक

शनिवार, 13 जून 2009

स्नेहा वाघ


सीन पढ़ते हुए रो देती हूँ

पल्लवी वाघेला
एनडीटीवी इमेजिन के चर्चित धारावाहिक 'ज्योति' का मुख्य किरदार निभा रही स्नेहा वाघ इन दिनों घर-घर की चहेती बेटी बन चुकी हैं । अपने सीरियल 'ज्योति' के प्रमोशन के लिए स्नेहा पिछले दिनों भोपाल में थीं । इस दौरान अपने अभिनय सफर के खास लम्हों को स्नेहा ने बांटा हमारे साथ...

अभिनय का कभी सोचा न था
मैंने अभिनय क्षेत्र में आने के बारे में कभी सोचा नहीं था। कंप्यूटर साइंस से पढ़ाई करने के बाद टेक्निकल फील्ड को कैरियर बनाने का प्लान था, लेकिन डांस का शौक इस ओर ले आया। मराठी थिएटर में कई म्यूजिकल प्ले किए हैं और मराठी टेलीविजन पर भी काम किया। थिएटर एक्टिंग को निखारता गया और अब ज्योति के बाद तो अभिनय ही मेरी पहचान और प्यार बन गया है।

डांस मेरा पैशन
डांस केवल मेरा शौक नहीं मेरा पैशन भी है। हां, मैं इसे कभी भी कैरियर बनाना नहीं चाहती थी। जब दो साल की थी, तभी से मम्मी ने डांस सिखाना शुरू कर दिया था। मैंने विधिवत क्लासिकल डांस की शिक्षा ली है और 'नृत्य रंजिनी' का खिताब भी जीत चुकी हूं। अभिनय क्षेत्र में आने से पहले कई डांस शो किए हैं लेकिन अब समय नहीं है।

ज्योति का सफर दो साल
मराठी थिएटर करने के दौरान ज्योति के ऑडीशन का कॉल आया। मैं उन दिनों काफी बिजी थी। यही वजह है कि रात को बारह बजे के बाद ऑडीशन देने गई थी। मेरे हिसाब से वह मेरा सबसे खराब ऑडीशन था, क्योंकि मेरी बैटरी पूरी तरह डिस्चार्ज हो चुकी थी। लेकिन दो दिन बाद कॉल आया -'हम आठ माह से अपनी ज्योति को ढूंढ रहे थे और वो आप हैं।

ज्योति जितनी सहनशीलता नहीं
मैं ज्योति से प्यार करती हूं। यह किरदार मेरे करीब भी है, क्योंकि मैं भी अपने घर की बड़ी बेटी हूं और इस नाते कुछ समझौते मैंने भी किए हैं। हां, इसके बावजूद मुझमें ज्योति जितनी सहनशीलता नहीं है। मुझे लगता है ज्योति कितना सहती है। जब ब्रज और सुषमा के प्यार का खुलासा होता है-वह सीन पढ़ते हुए मैं खूब रोई। ये पहली बार नहीं अक्सर मैं इस सीरियल के दौरान सीन पढ़ते हुए रोई हूं।

बातें चटपटी
-मुंबई में जन्मीं और पली-बढ़ी स्नेहा को इन दिनों राजस्थान के उदयपुर का क्लाइमेट काफी भा रहा है, जहां वह ज्योति की शूटिंग कर रही हैं।
- स्नेहा फिल्मी दुनिया में स्मिता पाटिल और छोटे परदे पर स्मृति ईरानी की फेन हैं । इसके अलावा डांस के लिहाज से इन्हें हेमामालिनी सबसे अधिक पसंद हैं।
-कुछ साल पहले स्मृति ईरानी ने स्नेहा को अपना सीरियल 'विरुद्ध' करने का ऑफर दिया था, लेकिन तब उम्र कम होने के कारण स्नेहा और उनके परिवार ने इसके लिए मना कर दिया। - स्नेहा खाने की बेहद शौकीन हैं। तंदूरी चिकन इनकी फेवरेट डिश है और इनके पर्स में चॉकलेट हमेशा मौजूद होती है। इतना फूडी होने पर खुद को फिट रखने के लिए स्नेहा नियमित रूप से योगा करती हैं।
- स्नेहा को जींस पहनना पसंद है। वे इसमें कंफर्टेबल महसूस करती हैं। यही वजह है कि वह इन दिनों टेंशन में हैं , क्योंकि ज्योति के आगामी एपीसोड में शादी होने के कारण उन्हें साड़ी पहनना होगी, जिसे संभालना उन्हें काफी मुश्किल लगता है।
- स्नेहा के पास फिल्मों के ऑफर आए हैं, लेकिन अभी वह केवल ज्योति पर फोकस करना चाहती हैं। हां, डायरेक्टर अनुराग कश्यप के साथ फिल्म करना उनका ख्वाब है। वह अनुराग की फिल्म 'देव डी' से खासी प्रभावित हैं।
- स्नेहा को रियालिटी शोज काफी पसंद है और उनकी तमन्ना है कि वह किसी न किसी रियलिटी शो का हिस्सा जरूर बनें।
(यह साक्षात्कार दैनिक जागरण, भोपाल में प्रकाशित हुआ है )