मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

सम ‘आयनिक’ व्यंग्य


ये है ‘जूता’ हिन्दुस्तानी!

अमिताभ फरोग

लो, ईराक से चलता हुआ ‘जूता’ भारत तक आ ही पहुंचा। यह उम्मीद से अधिक आश्चर्य होने सरीखी स्थिति है, क्यों ? दोनों ही जगह जूता ठीक निशाने पर नहीं बैठा, एकदम ‘नाक’ के निकट से निकल गया...सो नाक बच गई ! दूसरा आश्चर्य यह है कि बुश सरीखी फुर्ती चिदम्बरम में कहां से आ गई?
सवाल लाजिमी है, क्योंकि भारत में ‘धोती या लुंगी ’ पहनने वाले उतने फुर्तीले नहीं माने जाते; हाँ वे 'ताक़तवर' जरूर होते हैं। उनकी ‘लुंगियां ’ तो औरतें भी सरलता से खींचती रही हैं। यहां प्रसंग जयललिता और एम. करुणानिधी का नहीं है, संदर्भ ‘जूता’ है, लेकिन ‘ धोती और लुंगी ’ पार्श्व में अपनी बहुधा विराट-विकराल संस्कृति के साथ दोनों समय मौजूद रही है।

बुश लुंगी नहीं पहनते। वे नियमित व्यायाम करते हैं, इसलिए फिट हैं। वे पैंट पहनते हैं, सो उन्हें बार-बार अपनी लुंगी नहीं संभालनी पड़ती। ...और न ही कभी अपनी ‘सरकार’ की धोती संभालने में वक्त जाया करना पड़ा होगा ! शायद यही एक मूल कारण रहा कि बुश ने अपनी ‘नाक’ पर जूता नहीं पड़ने दिया, लेकिन चिदम्बरम के मामले में ऐसा नहीं है। इसीलिए घोर आश्चर्य होता है कि उन्होंने ‘जूते’ से खुद को कैसा बचा लिया?
मुंबई के ताज होटल पर हुए आतंकी हमलों के बाद शिवराज पाटिल की विदाई और अर्थ मंत्री पी. चिदम्बरम का गृहमंत्री बनना शायद इस ‘स्टेमिना’ का जनक हो सकता है। ‘अर्थ’ के अनेक अर्थ निकाले जा सकते हैं। लोगों को उलझाए रखा जा सकता है, ऐसे में उन्हें जूता फेंकने की सुध ही नहीं रहती। हालांकि इसमें काफी ज्ञान-गणित और कला कौशल आवश्यकता होती है, जो चिदम्बरम खूब जानते हैं।
हां, गृहमंत्रालय संभालते हुए जूतम-पैजार का सामना करना आम बात है। संभव है कि गृहमंत्री बनने के बाद विरोधी दलों के इस जूतम-पैजार के आदी हो चुके पी. चिदम्बरम जूतों से बचने की कला सीख चुके हों ! बचने-बचाने की यह ‘आर्टिफिशियल स्टेमिना’ चिदम्बरम के लिए काफी मुफीद साबित हुई है। यह भी कयास लगाए जा सकते हैं कि पी.चिदम्बरम को पूर्व से आभास हो कि चुनावी दौर में कहीं भी, किसी भी वक्त ‘जूता’ चल सकता है, इसलिए वे सदैव सतर्कता बरतते रहते हों?
जनरैल सिंह एक सरदार है, लेकिन भिंडरावाला नहीं!...और न ही उसने भिंडरावाला जैसा दुस्साहसपूर्ण कृत्य किया है। लेकिन दोनों के कृत्य-कुकृत्य में ‘जूता’ और ’लुंगी- धोती’ पूर्ण हैसियत के संग मौजूद रही है। लुंगी पहनने वाले पंजाबियों को एक धोती पहनने वाली ‘मर्दानी नारी’ ने जूतों तले खूब रौंदा। जूतम-पैजार से शुरू हुए झगड़े में भिंडरावाला मारा गया। ‘खूब लड़ी मर्दानी’ लेकिन अंतत: उसे भी अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। सरदारों का ‘असर’ खत्म करने दंगों के दौरान उन्हें मसलने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई। जिन्होंने सरदारों का दमन किया, वे दंगई एक सरदार के सरकार में ‘सरदार’ होने के बावजूद साफ़ बच निकले, जबकि आवश्यकता उन्हें ‘टाइट’ करने की थी। जनरैल के जूते में यही दर्द भरा हुआ था, जो गृहमंत्री के ह्रदय को छू तक न सका।
‘जूता’ से साफ बच निकलने के बाद गृहमंत्री के होंठों पर जो कुटिल मुस्कान देखी गई, उसके तमाम मायने हैं। पहला-वे ‘धोती’ की ‘धाक’ अच्छी तरह से जानते हैं। उन्हें पता है कि देश में असली सरदार तो ‘धोतियां’वाली और वाले ही रहे हैं और आगे भी रहेंगे। समय, काल, परिस्थिति, संस्कृति और समाज हर जगह धोती का वर्चस्व रहा है। चाहे यह दैविक रूप में हो या गांधी से लेकर सोनिया तक। इसलिए ‘सिक्ख दंगों’ से उपजा रोष दो-चार जूते चलने के बाद स्वत: ही ठंडा पड़ जाएगा...और न भी पड़ा तो इस महंगाई के दौर में कौन कितने और जूते चलाएगा ? अगर जूता यूं ही चलने लगा, तो उसकी कोई ‘वैल्यू’ भी कहां बचेगी?

वैसे भी ‘लुंगी वाले’ चिदम्बरम जानते हैं कि वैल्यू ‘जूते’ की नहीं, ‘जूतेवाले’ की होती है। इसलिए अगर जनरैल को हवालात में भेज देते, तो वो सिक्खो का ‘जनरैल’ बन बैठता!
खैर चुनावी मौसम है, ‘आमों’ और ‘आमजनों’ की खैर-खबर लेने का वक्त है, इसलिए नेताओं का पूरा-पूरा ध्यान ‘आम’ चूसने पर है। जूते तो चलते ही रहेंगे....अगर अधिक चले तो उन पर टैक्स लगा दिया जाएगा! टैक्स थोपने का फंडा पी. चिदम्बरम अच्छे से जानते हैं। इसलिए फिलहाल, उनका लक्ष्य ‘आमों’ को चूसने का है। अगर सरकार बनी तो सरदारों से कैसे निपटना है ‘सरदार’ खूब जानते हैं!
‘जय हो जूता!’

सोमवार, 6 अप्रैल 2009

एक वैचारिक विश्लेषण



भगवान राम और तुलसीदास का जल सत्याग्रह

ध्रुव शुक्ल
(लेखक प्रसिद्ध कवि एवं कथाकार हैं।)


सुमति भूमि थल हृदय अगाधु।
बेद
पुरान उदधि घन साधु॥

बरषहिं
राम सुजस बर बारी।

मधुर
मनोहर मंगलकारी॥

- रामचरित मानस


रा
मचरित मानस बांचते हुए प्राय: राम, सीता, जनक, भरत, हनुमान और रावण आदि के चरित्रों पर प्रवचनकारों और भक्तों का ध्यान जाता रहा है। वे आनंदमग्न होकर इनकी महिमा का गुणगान करते आए हैं। मैंने भी वर्षों तक रामचरित मानस को ऐसे ही बांचा है। आज जब धरती पर जल के स्रोत सूख रहे हैं, नदियां मैली हो रही हैं, पुरानी बावड़ियों, कुंओं, सरोवरों और कुण्डों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है, ऐसे कठिन समय में राम की महिमा का गुणगान करते हुए यह ख्याल आया कि रामचरित मानस महाकवि तुलसीदास का जल सत्याग्रह भी है।

तुलसी बाबा सबकी मतियों और सम्मतियों को मथकर एक मानस सरोवर रचते हैं और जैसे उस सरोवर में हिलोरे लेते नीलवर्ण जीवन जल की महिमा का ही गुणगान करते हैं। जैसे कविता पानी बचाने की पारंपरिक विधि हो और तुलसीदास हमें हमारी ही मति की सीप में राम नाम की बूंदें इकट्ठी करने की कला सिखा रहे हों। जैसे बूंद-बूंद के लिए उठती पुकार हमारे ही लोचनों के जल से हृदय सिंधु को भर रही हो और जीवन के प्रति प्रेम और पुलक से भरे हुए मेघ उठ रहे हों।
ये मेघ हमारे ही ज्ञान के सागर से आते हुए दिखाई देते हैं और राम की भक्ति उस वर्षा ऋतु के समान लगने लगती है, जिसमें राम नाम के दो अक्षर सा
वन-भादों के महीनों की तरह देह पर बरसने लगते हैं। राम प्राण प्रिय तो हैं ही, वे सूर्यवंशी भी हैं। आखिर प्राण सूर्य से ही तो धरती पर आया करते हैं और सूर्य की किरणें प्राणरूपी जीवन जल को बार-बार उठाकर मेघों में प्रतिष्ठित करती रहती हैं। फिर वही प्राण जैसे धरती पर बरसकर अन्न के रूप में प्रकट होते रहते हैं। अन्न वीर्य में बदल जाता है और तरह-तरह के बीज बनकर धरती में गर्भ खोजता फिरता है। हमारा प्राण जलमय है और जो जलाश्रित है, वही तो ‘नारायण’ कहलाता है। राम इसी नारायण के प्रतिनिधि हैं और रामचरित मानस क्षीर सागर से राम को उठाकर अपने ही हृदय कुण्ड तक ले आने की कथा लगती है। तुलसीदास काल शैया पर डोलती हमारी जीवन नौका को भवसागर में थामने का गुर ही तो सिखा रहे हैं।
कहते हैं कि यह संसार पानी पर लिखी लिखत जैसा है। जैसे जल और उसकी लहर के बीच कोई दूरी नहीं है, बिलकुल ऐसे ही सब एक-दूसरे से अभिन्न होते हैं। सागर सबके आंसुओं से ही तो खारा होता रहता है। अपनी ही आंखों से बार-बार छलक उठते इस खारे जल को रामचरित मानस सबके पीने योग्य बनाती है। तुलसी बाबा हमें जीवन जल के गुण और दोषों की पहचान करवाते हैं।
वे समझाते हैं कि सं
सार में कुछ भी अच्छा और बुरा नहीं होता। सिर्फ कुयोग और सुयोग पाकर चीजें अच्छी या बुरी कहलाने लगती हैं। कुसंगति में फंसा हुआ धुआं मुंह पर कालिख पोतने के अलावा और कर ही क्या सकता है। वही धुआं जब आग, पानी और हवा का सुसंग पा लेता है, तो जीवन देने वाला जलद बन जाता है।
तुलसी बाबा की कविता हृदय के सरोवर और अपनी ही मति की सीप में सचमुच उस बूंद की तरह लगने लगती है, जो हमारे ही जीवन जल में हिलुरती हुई धीरे-धीरे ज्ञान के मोती को पकाती होगी। तुलसीदास राम की महिमा के इस जल की गहराई में डुबाकर साधना की भी कला सिखाते हैं। वे जीवन में यश और प्रतिष्ठा को जल की प्राचीनता से नापते हैं। वे कहते हैं कि सीता और राम का अनादि-अनंत यश ही इस जल की प्राचीनता और गहराई है। रामचरित मानस में दी गई उपमाएं ही इस जल की तरंगों का विलास है। तुलसी बाबा की काव्य युक्तियां ही वे सीपियां हैं, जिनमें ज्ञान के मोती पैदा होते हैं।
इस जल में खिले हुए बहुरंगी कमलों के समूह ही तुलसी बाबा के इस मानस सरोवर के छन्द हैं, जहां अर्थ और भावों का पराग और मकरंद झर रहा है। कविता के इस सरोवर में शब्दों की तरह बूंद-बूंद संचित किए गए जल में भाषा की सुगंध बसी हुई है।
प्राण शक्ति से संयुक्त जल की सूक्ष्म अवस्था को श्रद्धा नाम से अभिहित किया गया है। तुलसी बाबा के मानस सरोवर पर श्रद्धा ही बसंत ऋतु की तरह छाई हुई है। उनके भक्ति निरूपण लताओं के मंडप जैसे हैं-जहां अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, पवित्रता, संतोष, तप, स्वाध्याय और प्रणति के फूल खिले हैं। भारत माता की पूजा के लिए महात्मा गांधी ने इन्हीं फूलों का संचय करना सिखाया था। हमारे चारों तरफ प्रकृति ही तो बोलती है, हम उसी से बातें करते हैं। तुलसीदास की कवि
ता के उपवन को सींचने के लिए हमारे नेत्रों का जल ही काफी है। इस उपवन का माली और कोई नहीं हमारा निर्मल मन ही है। तुलसी बाबा हमें सिखाते हैं कि जीवन रूपी कविता की क्यारियों की रोज निदाई-गुड़ाई करना पड़ती है।
रामचरित मानस पढ़ते हुए लगता है कि सारा संसार हमारे हृदय सरोवर के पास ही बसा हुआ है और इस जल के आनंद उछाह से ही कविता की एक नदी निकलती है, जो ज्ञान और विवेक के किनारों के बीच बहती रहती है। तुलसी बाबा समझाते हैं कि ये पानी बड़ा गुणकारी है, जो आशारूपी प्यास तो बुझाता ही है, मन के मैल को भी धो देता है। वे सलाह देते हैं कि हमें
कविता के जल से अपने मानस को हमेशा धोते रहना चाहिए। तुलसी बाबा के वचन सुनकर यह महसूस होता है कि हमारे ही मानस सरोवर से निकली कविता की नदी ही सागर तक जाती होगी। हमारा ही बूंद-बूंद इकट्ठा किया हुआ शब्दों का जल अनंत आकाश में विलीन होता होगा।
जल को अगर सुमति की भूमि न मिले, तो वह भटक जाता है और कुयोगवश कुमति की भूमि मिल जाने से उस पर विपत्ति के बीज पैदा होते हैं। कपट का जल पाकर होने वाला अंकुरण जीवन में दु:ख के फल ही लाता है फिर कैकेयी की नसों-नाड़ियों में बहने वाला जल उसके रोष की तरंगों से संचालित होता है। उसके दोनों वरदान ही उसकी नदी के किनारे बन जाते हैं और यह नदी दशरथ जैसे वटवृक्ष को ढहाती हुई राम, सीता, लक्ष्मण और अवध निवासियों को विपत्ति के समुद्र की ओ
र बहाए चली जाती है।
महाकवि तुलसीदास राम से बिछोह का शब्द चित्र रचते हुए हमसे कहते हैं कि राम रूपी जीवन जल के वियोग से अकुलाई हुई प्रजा चित्र लिखी-सी रह गई है। जब जल जड़ों से दूर चला जाता है तब सूखे हुए वन, उपवन चित्र लिखे से ही जान पड़ते हैं।
तुलसीदास समझाते हैं कि जल तो सबका स्वार्थरहित सखा है और सबकी जड़ों को सींचने के लिए सदा आतुर है। राम ऐसे ही स्वार्थरहित सखा हैं, जो हमारी देह के हृदय कुण्ड में भरे हैं और हमारी देह ही अयोध्या है। राम वियोग और कुछ नहीं अयोध्या में हृदय के जल का सूख जाना है। तभी तो वाल्मीकि मुनि, राम रूपी जलधर की ओर चातक की तरह अपनी निगाह टिकाए रखने
की सलाह देते हैं।
संसार के पोषण के लिए अनादि यश का निर्मल जल चाहिए, जिसे धरती युगों-युगों से अपने हृदय की गहराइयों में छिपाए हुए है। यह हृदय की गहराई ही राम का घर है। हम सतह पर डबरों में चमकते अपयश के जल को चमकीला बनाकर दुनिया की प्यास नहीं बुझा सकते, वह सदा अतृप्त ही बनी रहेगी। तुलसी बाबा सिखाते हैं कि जीवन स्वार्थ की नदी नहीं है वह तो करुणा की सरिता है। इस करुणा की सरिता का जल ही हमारे शोक को बहा ले जा सकता है। इस सरिता को ज्ञान और वैराग्य के किनारों के बीच बहना चाहिए। तुलसीदास भी नदियां जोड़ते हैं, वे तो छोटे-छोटे दु:खों के नालों को भी करुणा के सागर में मिलाने का स्वप्न देखते हैं। वे अपने-अपने
मार्गों से बहते विभिन्न स्वाद वाले संसार के सारे जल को प्रशान्त गहराई में लय होते देखना चाहते हैं।
तुलसी बाबा ने ही संतों के समाज को चलते-फिरते प्रयागराज की संज्ञा दी है, जो सब दिनों और सब देशों में सहज ही सुलभ रहता है, पर आज इस प्रयागराज का मजबूत किला क्यों ढह रहा है? सारे तीर्थों, जिन्हें तुलसी बाबा इस प्रयागराज के वीर सैनिक कहते हैं और जिन्हें पाप की सेना को कुचल डालने वाले रणधीरों के समान मानते हैं, क्यों इन रणधीरों को क्षीण होती गंगा की धारा और कीचड़ से भरी यमुना दिखाई नहीं देती? उन लोगों को भी कहां दिखाई देती है, जो औद्योगिक कचरा, मल-मूत्र और सड़े फूल गंगा ही क्या, सभी नदियों में निर्लज्जतापूर्वक बहा रहे हैं। यमुना की दुर्दशा देखकर तो उन्हें भी दु:ख और आश्चर्य नहीं होता, जो ताजमहल को दुनिया के साथ आश्चर्यों में शामिल करना चाहते हैं। क्या यमुना के जल में अब ताजमहल का प्रतिबिम्ब हमें कभी दिखाई नहीं देगा? क्या ताजमहल और यमुना का बिम्ब-प्रतिबिम्ब संबंध फिर से जोड़ा जा सकेगा?

गांधी और रामत्व
तुलसीदास
की शरण में बैठकर यह अनुभव होता है कि राम के अंकुरण की भूमि हमारी सुमति की धरती ही है, जिसे पूर्वजों से प्राप्त पारंपरिक ज्ञान से हमें रोज गोड़ना पड़ता है और ज्ञान के अनेक मार्गों की पहचान करते हुए अपना मार्ग बनाना पड़ता है। सिर्फ इतना ही नहीं परंपरा से रक्षित ज्ञान के बीजों को अपने जीवन में बोकर उन्हें अपने ही नेत्रों के जल से रोज सींचना भी पड़ता है। महात्मा गांधी ने भारत के साधारण जन की आंखों में बार-बार छलक आते इसी रामत्व को पहचानकर भारत भूमि पर स्वराज्य के बीज बोए थे। आज भी जानकीप्राण राम की धरती विश्व व्यापारियों द्वारा छल पूर्वक हरी जा रही है। वे अभी भी समंदर पार से ही तरह-तरह के कपटवेश धारण करके हमारी ओर आते ही जा रहे हैं। आदिकवि वाल्मीकि से महाकवि तुलसीदास और फिर महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ तक चली आई रामकथा हमें प्रेरित कर रही है कि हम ‘पृथ्वी तनया कुमारिका छबि’ की आराधना करते हुए जीवन जल के लिए जल सत्याग्रह करें और बहुरंगी जीवन का अनिष्ट करने वाले परद्रोहियों से सीता की धरती की रक्षा करें।

रामचरित मानस : जीतने की एक कला
रामकथा धरती पर उस मनुजरूप नायक की खोज है, जिसकी छाया में नागरिक धर्म फलता-फूलता है। तुलसी बाबा विषमता के अभाव को ही ‘रामप्रताप’ कहते हैं। जहां विजय प्राप्त करने के लिए कोई दूसरा है ही नहीं, बस अपने मन को ही जीतना पड़ता है। रामचरित मानस विश्वव्यापी सेवा धर्म और स्वार्थ के बीच प्रेम का सेतु बांधने की भी कला सिखाती है। जगत की गति ही ऐसी है कि यह सेतु बंध-बंधकर बार-बार टूटता है, तभी तो राम के भक्ति नयनों में बार-बार जल छलक आता है। वे अकेले में रोते हैं, महात्मा गांधी भी अकेले में रोते थे।

वर्तमान विसंगतियां
आज रामचरित मानस पढ़ते हुए लगता है कि अब हम फिर उस भय उपजाने वाली नदी के किनारे पर पहुंच रहे हैं, जिसमें जल नहीं रेत भरी होगी। जिस नदी में जल की जगह मज्जा बह रहा हो, उसमें भूत, पिशाच और बेताल ही स्नान करेंगे। कौए और चील शवों को छीनकर खाएंगे। योगनियां खप्परों में खून का संचय और पिशाचों की स्त्रियां नंगा नाच करेंगी। चामुण्डाएं खोपड़ियों के खड़ताल बजाकर गाएंगी। हाथों में मुण्डों की मालाएं लेकर कालिकाएं इस रुधिर की नदी में स्नान करेंगी। किसी समय ऐसी ही नदी पार करके राम अयोध्या लौटे थे। राम का अयोध्या लौट आने का अर्थ अपनी ओर वापसी है। रघुनायक को अपनाने का अर्थ उस संतोष के भाव में रहना है।
जिसके बिना कामनाएं कभी जाती ही नहीं। हमें उस धर्म विज्ञान को प्रीति में ले आना है, जिससे जीवन में समता का वास्तविक अर्थ खुलता है। रामत्व हमारा ही अर्जित किया हुआ जीवन जल है। इससे पहले कि हमारी आँखों का पानी ही मर जाएं, हमें प्रकृति की तरफ जाना होगा, जो राम का आश्रय है, जब वह हर ली जाती है तो राम उसी का पता पूछते फिरते हैं। याद करें तुलसीदास द्वारा रचित उन दो पक्षियों (कागभुसुण्डि और गरुड़) को जहां शरीर को ही मोक्ष की सीढ़ी कहा जा रहा है, किसी विचारधारा को नहीं। दरिद्रता से अगर दु:ख उपजता है तो वह अपने ही पुरुषार्थ से जाएगी। दूसरों द्वारा किए गए पूंजी निवेश ने कभी किसी की दरिद्रता को कम नहीं किया बल्कि बढ़ाया ही है।
तुलसी बाबा सब रोगों की जड़ हमारे अनुभव सिद्ध मोह को ही मान रहे हैं और परनिन्दा को ही सबसे बड़ा पाप कह रहे हैं। वे किसी धर्म को नहीं, अहिंसा को परमधर्म कह रहे हैं। संसद से सड़क तक हमारा समय परनिन्दा के पाप को ही तो ढो रहा है और गंगा सूख रही है। पता नहीं यह पाप कहां और किस साबुन से धोया जाएगा। क्या परमाणु ऊर्जा इसे धोएगी?
(यह लेख भोपाल से पब्लिश पीपुल्स समाचार में छपा है ।)

रविवार, 5 अप्रैल 2009

‘बालिका वधू’ के बसंत यानी सत्यजीत शर्मा से बातचीत



‘लड़कियां’ फिक्र का मुद्दा होना चाहिए

अमिताभ फरोग

कलर्स चैनल के सर्वाधिक लोकप्रिय धारावाहिक ‘बालिका वधु’ ने स्त्री-पक्ष को सामाजिक बहस में तब्दील करने का कार्य किया है। भारत में लड़कियों की घटती संख्या और उनके प्रति सामाजिक सोच पर तीखा प्रहार करते इस धारावाहिक में बसंत का किरदार निभा रहे सत्यजीत शर्मा मानते हैं कि ‘स्त्री पक्ष’ फिक्र का मुद्दा होना चाहिए, तभी इस संकट को टाला जा सकता है। ‘नेशनल स्कूल आफ ड्रामा’ ’से अभिनय का सबक सीखने वाले सत्यजीत ने ‘बालिका वधू’ और रंगमंच के विभिन्न मुद्दों पर बातचीत की..

बालिका वधू और सामाजिक चेतना:
धारावाहिक ने भारतीय दर्शकों में गहरी पैठ बनाई है, जो इस बात का संकेत है कि ऐसा कुछ तो है जो लोगों को चिंतन पर विवश कर रहा है। अगर बालिका वधू से थोड़ी-बहुत भी जागरुकता आ रही है, तो यह अच्छी बात है। छोटे शहरों और कस्बों के लोग धारावाहिक के हरेक पहलू को व्यक्तिगततौर पर समाज में देख और महसूस करते आए हैं, इसलिए उनकी सोच बदले तो बेहतर रहेगा। खासकर, बड़े शहरों के लिए इस धारावाहिक में दिखाए जा रहे तमाम स्त्री पक्ष अनोखी चीज-सरीखे होते हैं। वो सोचते हैं कि किसी दुनिया में ऐसा होता होगा? बालिका विवाह, बेमेल विवाह और विधवाओं से अछूत-सा बर्ताव महानगरों में रहने वालों को अचंभित करती है। दरअसल, ये विसंगतियां, बुराइयां ग्रामीण अंचलों और छोटे शहरों में अधिक दिखाई देती हैं। इस धारावाहिक ने एक बात बहुत अच्छी की, कि लोगों को खासकर बड़े शहरों के लोगों को भारतीय रीति-रिवाजों के इस स्याह पक्ष से सीधा साक्षात्कार कराया। यह बालिका वधू से भारतीय समाज की सोच में तनिक भी परिवर्तन आता है, तो वो जागरुकता की पहली सीढ़ी होगी-लोग इस दिशा में कुछ अच्छा प्रयास करें, वो बाद की बात है। जहां देश में लड़कियों की घटती संख्या की बात है, तो यह गंभीर विषय है। इसके लिए सभी को सचेत होना होगा। इसे लेकर सबको ‘परेशान’ होना चाहिए। यह फिक्र का मुद्दा होना चाहिए। जहां तक धारावाहिक से ‘चेतना’ आने का सवाल है-लोग जरा-भी जागरुक हो जाएं, तो परिवर्तन अवश्य आएगा।

बसंत और सत्यजीत की सोच/परंपरागत धारणाएं:
परंपरागत होना या रूढ़िवादी संस्कारों में जीना वक्त दोनों की परिभाषाएं वक्त और परिस्थितियों पर निर्भर करती हैं। जिस रीति-रिवाज को कल तक भारतीय समाज संस्कारों के रूप में आत्मसात करता था, वो जरूरी नहीं कि आज भी उन्हें हम अपनाएं। जिस विचारधारा या संस्कारों को आज हम रूढ़िवाद से जोड़कर देख रहे हों, कल तक वे हमारे समाज के अटूट हिस्से रहे होंगे! ‘बसंत’ को लेकर मेरे भीतर कोई दुर्भावना नहीं है और न ही लगाव। बसंत जिन स्थितियों/परिस्थितियों से गुजर रहा है,कभी न कभी हम सभी उनके भोग चुके हैं, उन्हें देख चुके हैं। जहां तक मेरी बात है-मैं व्यक्तिगततौर पर ‘वैचारिक स्वतंत्रता’ में विश्वास करता हूं। ‘वैचारिक स्वतंत्रता’ से तात्पर्य मैं सदैव सही सोच और कार्य के साथ जीने का प्रयास करता हूं। परंपरागत होना कोई बुरा नहीं है, लेकिन आपकी सोच क्या है? यह महत्वपूर्ण बात है। मेरे भीतर बसंत कभी घर नहीं कर पाया। बसंत के जीवन की अपनी एक सामजिक यात्रा, दिक्कतें और परेशानियां हैं-मेरी अपनी। दोनों अपने-अपने वर्तमान सामाजिक परिवेश में जी रहे हैं। अगर मैं अपने नजरिये से बसंत का विश्लेषण करूं तो वह एक ऐसा व्यक्ति है, जो सामाजिक परंपराओं में विश्वास करता है, उन्हें पूरी शिद्दत से जीता है। इसी पहलू को अगर शहरी नजरिये से देखूं तो निश्चय ही बसंत रूढ़िवादी नजर आएगा।

ड्रीम रोल :
एक पेशेवर अभिनेता होने के नाते सबसे पहले मैं यही चाहता हूं कि मेरे पास काम हो, उसके बाद अच्छे और बुरे किरदार की बात आती है। कौन सा किरदार ठीक से निभाया और कौन सा नहीं, यह उसी वक्त तक जेहन में रहता है। बाद में कुछ नहीं सोचता, बस अगले कार्य को अच्छे ढंग से निभाने में जुट जाता हूं। साफ कहूं तो मैंने कभी भी इस बारे में सोचा ही नहीं। एक अभिनेता होने के नाते सदैव मेरा प्रयास यही रहा कि अच्छा कार्य करूं। मेरे अच्छे-बुरे काम का निर्णय दर्शकों को ही करना है। बालिका वधू के अलावा दर्शक मुझे एनडीटीवी इमेजिन पर प्रसारित हो रहे‘कितनी मोहब्बत है’में भी देख सकते हैं।

रंगमंच का अस्तित्व :
जो लोग ऐसा सोचते हैं कि टेलीविजन या सिनेमा से रंगमंच को खतरा है-मैं इससे इत्तेफाक नहीं रखता। जिन्हें रंगमंच में रुचि है, वे इसे अवश्य देखेंगे। रंगमंच का दायरा न पहले कभी वृहद था और न कभी रहेगा-मतलब स्थिति जैसी है, वैसी सदैव बनी रहेगी। मैं 1986 से रंगमंच कर रहा हूं और यही मानता हूं कि टेलीविजन और सिनेमा के बीच इसकी अपना एक मुकाम है। हां, यह सच है कि वक्त के साथ चीजें बदलती हैं, इसलिए रंगमंच का उत्थान या पतन उस शहर के समाजिक/आर्थिक और व्यावहारिक परिवर्तन पर निर्भर करता है। रंगमंच में परिवर्तन दर्शकों के अनुपात पर चलता है। मोटेतौर पर कहूं तो रंगमंच को न तो अभी खतरा है और न भविष्य में रहेगा।

घर-परिवार
मैं दिल्ली में पला-बढ़ा हुआ, लेकिन पिछले 12-13 साल से मुंबई में ही हूं, इसलिए अब खुद को यहीं का निवासी मानता हूं। मैं सिंगल हूं। मेरा एक छोटा भाई है, जो आस्ट्रेलिया में रहता है। मेरी एक बुआ हैं, जिनसे मेरा गहरा लगाव है।


सत्यजीत शर्मा एक नजर :
सत्यजीत ने 1994 में ‘नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा’ से अभिनय की शिक्षा हासिल की है। हालांकि ये 1986 में ही रंगमंच से जुड़ गए थे। कल्पना आजमी, सुधीर मिश्रा, रोमेश शर्मा, रमेश सिप्पी, पंकज कपूर जैसे धुरंधर फिल्ममेकर्स के साथ काम कर चुके सत्यजीत फरहान अख्तर की ‘डॉन’, अमृत सागर की‘1971’, कुनाल शिवदेसानी की‘काफिर’ में अपने अभिनय की छाप छोड़ चुके हैं। बहुत जल्द आप इन्हें विशाल भारद्वाज की‘कमीने’ में भी देखेंगे।
(यह साक्षात्कार पीपुल्स समाचार, भोपाल में प्रकाशित हुआ है )