शनिवार, 9 अक्तूबर 2010


बुरे दौर में देवियां


नौ शक्ति का त्यौहार नवरात्र नारी के विविध रूपों का प्रतिनिधित्व करता है। भारत में नारी को जगत जननी का दर्जा दिया जाता है, बावजूद आधुनिक रूप में देखें तो ‘नारी सर्वत्र पूज्यते’ की मान्यता वाले इस देश में महिलाओं से संबंधित क्राइम का रेशो सबसे ज्यादा है। इसमें मप्र की स्थिति भी अच्छी नहीं। देवी के नौ रूप और नारी की मौजूदा स्थिति का तुलनात्मक विश्लेषण करती स्टोरी...

पल्लवी वाघेला


पूरे देश में वूमेन से जुड़े क्राइम का बोलबाला है। इसमें मध्यप्रदेश ऐसा राज्य है, जिसमें वूमन क्राइम की स्थिति को लेकर खुद ‘राष्ट्रीय महिला आयोग’ की अध्यक्ष डॉ. गिरिजा व्यास अपनी चिंता जता चुकी हैं।

जगत जननी बनाम कन्या भ्रूण हत्या :
यह विडंबना ही है कि मां दुर्गा, काली और सरस्वती को पूजने वाले इस देश में कन्या भ्रूण हत्या बड़ी समस्या है। इससे न सिर्फ सेक्स रेशो बिगड़ा है, बल्कि सोसाइटी को ढेरों प्रॉब्लम्स फेस करनी पड़ रही हैं। हजारों बेटियों को आज भी मां की कोख में ही मार दिया जाता है।

फैक्ट:
प्रदेश के श्योपुर, मुरैना, दतिया, भिंड, ग्वालियर, शिवपुरी, गुना, टीकमगढ़ और छतरपुर वे जिले हैं, जहां चाइल्ड सेक्स रेशो 900 लड़कियां/1000 लड़कों से भी कम है।

शक्ति का रूप बनाम घरेलू हिंसा:
शारीरिक, यौन और मानसिक उत्पीड़न तीनों ही घरेलू हिंसा के अंतर्गत आते हैं। मप्र की स्थिति यहां भी अच्छी नहीं है, पिछले 9 सालों में घरेलू हिंसा की शिकायतों में 5 गुना बढ़ोतरी हुई है।

फैक्ट:
पुलिस रिकार्ड के अनुसार 2009 में घरेलू हिंसा के 36, 215 केस दर्ज हैं, जबकि 2001 में इनकी संख्या मात्र 7,283 थी।

लज्जा स्वरूपा बनाम बलात्कार:
भारत व प्रदेश में ऐसे केसेस की संख्या लगातार बढ़ रही है, जिनमें नारी की लज्जा को तार-तार किया जा रहा है। दु:ख की बात यह कि इनमें ज्यादातर बलात्कारी घर के सदस्य या परिचित होते हैं।

फैक्ट:
नेशनल क्राइम ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार 2009 में प्रदेश में बलात्कार के 2,900 केस दर्ज हुए। पिछले वर्ष इस क्राइम में मप्र पूरे देश में अग्रणी था। दो सालों में प्रदेश में गैंग रेप का आंकड़ा तेजी से बढ़ा है।

अन्नपूर्णा बनाम कुपोषण:
नारी पूरे घर की धुरी होती है। वह परिवार के भोजन व पोषण का ध्यान रखती है, लेकिन बचपन से ही कन्या के साथ खान-पान में भेदभाव किया जाता है। दूध, दही हो या खाने की अन्य चीज; पहला अधिकार बेटे का माना जाता है। इसी वजह से कुपोषित कन्याओं की संख्या कहीं अधिक है। इसके अलावा एनीमिया और आॅस्टोपोरायसिस जैसी समस्याएं भी महिलाओं में अधिक होती हैं।

फैक्ट:
मप्र को देश का सबसे कुपोषित राज्य माना जाता है। इनमें कन्याओं में कुपोषण का कोई स्पष्ट आंकड़ा तो सामने नहीं है, लेकिन प्रदेश में कुपोषित बच्चों का प्रतिशत 60.3 है और एक निजी संस्था के सर्वे के अनुसार इनमें कन्याओं की संख्या ज्यादा है। इसके अलावा 15 से 40 साल तक की की महिलाओं में 58 प्रतिशत एनिमिक हैं।

लक्ष्मी रूप बनाम दहेज का लालच:
घर की लक्ष्मी मानी जाने वाली नारी को लक्ष्मी के लालच में होम कर दिया जाता है। इस मामले में मप्र देश में तीसरे स्थान पर है। यूपी और बिहार मप्र से आगे हैं।

फैक्ट:
लोकसभा में ‘वूमेन डेवलपमेंट डिपाटर्मेंट’ द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार 2009 में दहेज के लिए मारी जाने वालीं महिलाओं की संख्या 834 है, जबकि दहेज प्रताड़ना संबंधी केस की संख्या इससे कई गुना अधिक।


और भी हैं मसले

-आए दिन महिलाओं को छेड़छाड़ जैसी परेशानियों से निपटना पड़ता है। बुद्धि देने वाली सरस्वती मां के देश में बच्चियों के लिए शिक्षा की राह भी आसान नहीं। कहीं रूढ़िवादी समाज के कारण उन्हें पढ़ाना उचित नहीं माना जाता, तो कहीं बुनियादी सुविधाएं राह में रोड़ा बन जाती हैं। बाल विवाह और कम उम्र में मां बनने के कारण कई कन्याएं हेल्थ प्रॉब्लम से गुजरती हैं। ‘नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-3’ के अनुसार मध्यप्रदेश में डिलेवरी के 42 दिन के अंदर मरने वाली माताओं की संख्या 27-30 प्रतिदिन है। इनमें से 42 प्रतिशत नाबालिक माताएं होती हैं।

-एक सर्वे के अनुसार केवल 45 फीसदी महिलाएं ही घर के निर्णयों में भागीदारी लेती हैं। यह भी विडंबना है कि महिला आरक्षण के बाद भी महिलाएं सरपंच पति की छाया से बाहर नहीं निकल पा रही हैं। उन्हें आज भी भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है।




गांधी तोरे देश में...


-9/11( 2001) हमले के फौरन बाद से अमेरिका आगंतुकों के ‘वीजा’ को लेकर कितना कठोर हो चला है, जगजाहिर है। इसके ठीक इतर मुंबई में 1 जनवरी, 2008 को हुए आतंकी हमले के बाद भी हिंदुस्तान में पाकिस्तानियों का आना-जाना प्रतिबंधित नहीं किया गया। ऐसे उदाहरण संभवत: गांधी के देश में ही संभव हैं।

इसी महीने की तीन तारीख से दिल्ली में ‘19 वें राष्ट्रमंडल खेलों’ का शंखनाद होने जा रहा है। ऐन-केन प्रकारेण! मीडिया और केंद्र सरकार विरोधी पार्टियों ने भ्रष्टाचार/गड़बड़ियों और अव्यवस्थाओं को लेकर आयोजन की जो छीछालेदर की; वैसा साहस/दुस्साहस सिर्फ गांधी के देश में ही संभव है। वर्ष, 2008 में बीजिंग(चीन) में ‘ओलंपिक गेम्स’ हुए थे-भ्रष्टाचार/गड़बड़ियां और अव्यवस्थाएं वहां भी रही होंगी; लेकिन अंगुली उठाने की ताकत किसी ने नहीं दिखाई। प्रचलित कथन है-‘तोल मोल के बोल!’...लेकिन दुनिया के सबसे सशक्त लोकतांत्रिक देश बोले तो; गांधी के भारत में शब्दों को तोलना बेमानी-सा हो चला है। सरकार पर; राजकाज पर; यहां तक कि ‘न्याय प्रणाली’ पर सवाल खड़े करने का अधिकार सिर्फ गांधी के देश में ही संभव है।

अमिताभ फरोग

माना कि;

‘गड़बड़ियां/अव्यवस्थाएं/भ्रष्टाचार बहुत भरे हैं इस देश में/

फिर भी हम लगातार बढ़ते जा रहे हैं,

दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति बनने की रेस में।’

तमाम अवरोधों/विरोधों के बावजूद यदि भारत स्वतंत्रता के बाद 63 वर्षों के भीतर दुनिया की तीसरी बड़ी ताकत के रूप में उभरा है, तो निश्चय ही यह हमारी उस लोकतांत्रिक व्यवस्था-प्रणाली की देन है, जिसे हम वजह/बेवजह ‘लचर!’ शब्द से संबोधित करते रहते हैं।

मुंबई के ताज होटल पर हुए आतंकी हमले के सारे जख्म सुखाते/दर्द बिसराते हुए ‘स्टार प्लस’ ने ‘छोटे उस्ताद-दो देशों की आवाज’ सिंगिंग रियलिटी शो शुरू किया। इसमें भारत और पाकिस्तान के चाइल्ड सिंगर्स शामिल हुए। मकसद वही वर्षों पुराना था-‘दोनों देशों के बीच बार-बार ताजा होते घृणा के जख्मों पर घी और हल्दी का लेप लगाना, ताकि आशाओं की बाती से टिमटिमाती सौहार्द्र की लौ बुझने न पाए।’

इस शो में पाकिस्तानी बच्चों की मौजूदगी पर ‘महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना(एमएनएस)’ ने घोर आपत्ति दर्ज कराई, लेकिन प्रोग्राम शुरू हुआ और खूब पसंद भी किया जा रहा है। ऐसा उदाहरण अमेरिका जैसे महाशक्तिशाली(?) मुल्क में शायद ही संभव था। यह है हमारे गांधी का भारत।

हम अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर लाख अंगुली उठाएं, सरकारों; ...और न्यायप्रणाली पर खूब कीचड़ उछालें, लेकिन ऐसा सिर्फ गांधी के देश में ही संभव है कि; जब अयोध्या जैसे पेंचीदा मसले सामने आते हैं, तब भी हम अपने मित्रों की फेहरिस्त से ‘हिंदू या मुस्लिम’ किसी का भी नाम नहीं काटते। हम अपने मित्रों को छोड़कर उनके समूचे समुदाय को शंका की निगाहों से देखते हैं, वे भी ठीक ऐसा ही करते होंगे, लेकिन जब हम दोनों साथ होते हैं, तब मंदिर-मस्जिद दोनों ही हमारे बीच की आत्मीयता/रिश्ते में आड़े नहीं आते।

दुनिया के तमाम मुल्क नस्लवाद या जातिगत हिंसा से जूझ रहे हैं, हम भी इससे अछूते नहीं है; बावजूद नक्सलियों/आतंकवादियों/सरकार-विद्रोहियों से लगातार सुलह-बातचीत की पेशकश होती रहती है। अफगानिस्तान और ईराक में शांति कायम करने अमेरिका लगातार अहिंसात्मक तौर-तरीके अपना रहा है। श्रीलंका ने दूसरे मुल्कों की फौजों की मदद से लिट्टे जैसे सर्वशक्तिमान सरकार विद्रोहियों को आखिरकार नेस्तानाबूत कर दिया, लेकिन हम कश्मीर में ऐसे ‘कुटिल प्रयोग’ नहीं करते। नक्सलियों को समूल नष्ट करने हवाई हमलों में बिलीव नहीं करते। वो इसलिए नहीं; कि सरकारें ऐसे कठिन निर्णय लेने से डरती हैं, वजह सिर्फ इतनी है कि;‘चार दोषी भले ही छूट जाएं, लेकिन एक निर्दोष न मारा जाए।’

राजनीति की छोड़िए, सिनेमा को फोकस करते हैं। क्या यह रोचक सत्य नहीं है कि भारतीय सिनेमा जितना ‘गांधी-दर्शन/वाद’ से प्रभावित रहा है, उससे कहीं ज्यादा ‘अंडरवर्ल्ड’ का विषय दर्शकों को रोमांचित करता रहा है। हमें गांधी(1982) के लिए सर्वश्रेष्ठ फिल्म का ‘अकादमी अवार्ड’ हासिल होता है, तो ठीक इसके विपरीत सलमान खान की गुंडई बोले तो; ‘दंबग(2010)’ बॉक्स आॅफिस पर संजय दत्त की गांधीगीरी ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस(2003)’ और ‘लगे रहो मुन्नाभाई (2006)’ को कमाई के मामले में बहुत पीछे छोड़ देती है।

आमिर खान की ‘थ्री इडियट्स(2009)’ भी गांधीगीरी का एक नया फार्मूला ही कही जा सकती है, जिसमें तीन बेवकूफ युवा भारतीय गांधीजी के तीन बंदरों के प्रतीक हैं, फर्क केवल नजरिये का है। हम गांधीजी के बंदरों का उपहास उड़ाते आए हैं, क्योंकि वे सुनते नहीं, देखते नहीं और बोलते नहीं। थ्री इडियट्स भी अपनी मनमर्जी के मालिक थे, जो चाहा; वो किया, फिर भी उनमें दुनिया बदलने का माद्दा था। यह सिर्फ सोच का अंतर हैं, गांधीजी के तीनों बंदर आपसी सामंजस्य के प्रतीक भी माने जा सकते हैं। एक सुनता नहीं, लेकिन देखता और बोलता तो है, दूसरा बोलता नहीं, लेकिन सुनता और देखता तो है, जबकि तीसरा आंखों पर हथेली रखे हुए है, लेकिन बोलने और सुनने की उसमें असीम क्षमता है। गांधीजी के ये थ्री इडियट्स मंकी कामकाज के सटीक बंटवारे के सूचक भी तो बोले जा सकते हैं? बोले तो; बेवजह फटे में टांग न अड़ाएं।

भौतिक सुख-सुविधाओं से सम्पन्न देशों में हमारी छवि ‘पुअर इंडिया’ की बनी हुई है। लेकिन यही पुअर मुल्क हमें वर्ष, 2009 में 8 ‘आस्कर अवार्ड (वर्ष-2008 में रिलीज हुई फिल्म-स्लम डॉग मिलियनेयर)’ दिलाता है। स्लम से भरा यही इंडिया 15 डॉलर मिलियन से निर्मित इस फिल्म से करीब 38 करोड़ डॉलर कमाता है और सारी दुनिया हमारी ‘जय हो...’ बोलती है। यह सब गांधी के भारत में ही संभव है।

और ऐसा भी सिर्फ गांधी के भारत में संभव है कि; जिस संगीतकार(एआर रहमान) की कल तक हम ‘जय हो..’ कर रहे थे, उसके माथे पर ‘कॉमनवेल्थ गेम्स’ के प्रमोशन सांग की असफलता का ‘कलंक’ लगाने से भी नहीं चूके। ऐसा केवल गांधी के भारत में ही पॉसिबल है कि; जिस फिल्म ने सरकारी व्यवस्थाओं की कलई खोलकर रख दी, वो फिल्म ‘पीपली लाइव’ आॅस्कर के लिए जाएगी।

ये तमाम उदाहरण गांधीगीरी के नये ‘फ्लेवर/कलेवर’ हैं। सार्थक फिल्मों के जनक श्याम बेनेगल ‘वेलडन अब्बा-(2010)’ के मार्फत सरकारी योजनाओं की गड़बड़िया सुधारने एक नई गांधीगीरी रचते हैं, तो प्रकाश झा ‘राजनीति-(2010)’ के जरिये गांधी के भारत का एक कड़वा सत्य दिखाते हैं। यहां भी क्लाइमेक्स में नाना पाटेकर की छवि में गांधी-दर्शन परिलक्षित होता है।

बोले तो; मामू...गांधी के भारत में; लोकतंत्र और न्यायप्रणाली में वो सब कर पाना संभव है, जिसे दूसरे मुल्कों में दुस्साहस और विद्रोह से परिभाषित किया जाता है।

शुक्रवार, 3 सितंबर 2010


छोटी सी उमर परनाई रे
बाबो सा करो थारो काई में कसूर
पल्लवी वाघेला
विवाह गीत की पक्तियां बाल सुलभ मन के भय और अचरज को व्यक्त करती हैं कि क्यों उसे इस नन्हीं सी उम्र में विवाह की बेदी के सामने बैठाया जा रहा है। आश्चर्य की बात यह कि ये पक्तियां केवल गांव तक सीमित नहीं। हाल ही में निजी कॉलेज से मास्टर्स इन सोशल वर्क करने वाले स्टूडेंट द्वारा किए सर्वे में खुलासा हुआ है कि भोपाल शहर में विवाहित महिलाओं में आधी बालिका वधू हैं। दूसरी तरफ इस सर्वे में एक अच्छी बात भी सामने आई है कि न्यू जनरेशन का प्रतिनिधित्व करने वाली अविवाहित युवतियां अब बाल विवाह को लेकर अधिक सजग हो गई हैं और वे इसका पूरजोर विरोध भी कर रही हैं। इनमें मीडिल क्लास से लेकर झुग्गी बस्तियों में रहने वाली कम उम्र की लड़कियां भी शामिल है।
भोपाल शहर जहां का साक्षरता प्रतिशत 75 से भी अधिक हैं वहां हाल ही में हुए सर्वे में बाल विवाह का प्रतिशत 53 आया है। ये वे महिलाएं हैं जिनकी शादी 18 वर्ष से पहले कर दी गई है और इनमें से ज्यादातर कई शारीरिक और मानसिक बीमारियों को झेल रही हैं। एक निजी संस्था से सोशल वर्क की स्टडीज कर रहे स्टूडेंट द्वारा अपने रिसर्च पेपर को तैयार करने के दौरान यह सर्वे किया गया। सर्वे में भोपाल शहर के अलावा इसके आस-पास के क्षेत्र का अध्ययन भी किया गया है। इस दौरान सबसे अच्छी बात जो सामने आई वो ये कि अब खुद युवतियों द्वारा बाल विवाह के विरोध में स्वर प्रबल होने लगे हैं। इनमें से कई ने तो अपने परिवार को साफ शब्दों में कह दिया है कि यदि उनका जबरन विवाह करने की कोशिश की गई तो वे अपने परिवार केखिलाफ पुलिस के पास जाने में भी पीछे नहीं रहेंगी। सर्वे में सामने आया काला पक्षबाल विवाह के के मामले में मप्र राजस्थान से ज्यादा पीछे नहीं है। नेशनल हेल्थ सर्वे रिपोर्ट के अनुसार मप्र में लड़कियों की शादी की औसत उम्र 17 वर्ष पाई गई है। स्टूडेंट द्वारा भोपाल में किए गए सर्वे में भोपाल और इसके आस-पास शादी की औसत उम्र 17.4 पाई गई है। आंकड़ों के अनुसार इनमें से दो प्रतिशत लड़कियां ऐसी भी हैं जिन्हें मात्र 12 से 14 साल की उम्र में सेक्च्युअल एसॉल्ट या नादानी के चलते प्रेगनेंसी तक झेलनी पड़ी हैं। सर्वे के दौरान स्टूडेंट ने अस्पताल में भी पड़ताल की है। इसमें डॉक्टर्स ने भी आॅफ द रिकार्ड यह माना कि अस्पताल में आने वाले डिलेवरी केसेस में 30 प्रतिशत अंडरएज मदर्स होती हैं। यहां तक कि कभी-कभी भोपाल की गरीब बस्तियों और आस-पास के रूरल एरिया से 16 साल तक की गर्भवती लड़कियां भी आती हैं। सर्वे में खुलासा हुआ कि ज्यादातर लड़कियों की शादी जबरन उनके माता-पिता द्वारा की गई है और कई केसेस में तो पैसा लेकर माता-पिता ने बेटियों की शादी दोगुना-तीगुना उम्र के पुरूष से भी की गई है। इसके अलावा जहां लड़कियां चाइल्ड लेबर के रूप में काम कर रही हैं, वहां के मालिक द्वारा शादी कर उन्हें बंदी बनाने के केस भी सामने आए। इनमें ज्यादातर रेप केस भी होते हैं। इसके अलावा 5 प्रतिशत केसेस में लड़कियां बहकावे में आकर खुद ही चली जाती हैं। रजिस्ट्रेशन न होने के पीछे भी ये कारण सर्वे में ज्यादातर लोगों ने माना कि नियम बनने के बाद भी मैरिज रजिस्ट्रेशन न होने के पीछे भी बालविवाह बड़ा कारण है। लोगों ने माना कि उनकी शादी 18 से कम उम्र में होने के कारण वे डर के मारे रजिस्ट्रेशन के लिए जाते ही नहीं। जग रही है आशा की किरण सर्वे के दौरान स्टूडेंट के सामने पिछले तीन सालों के कुछ ऐसे केसेस भी सामने आए जहां लड़कियों ने खुद बाल विवाह के खिलाफ बिगुल फूंका है। इन लड़कियों ने अपने परिवार वालों को साफ शब्दों में कहा है कि यदि वे कम उम्र में उनकी शादी तय करते हैं तो वे उसका पूरजोर विरोध करेंगी और फिर भी यदि वे नहीं मानते हैं तो वे उनके खिलाफ पुलिस के पास जाने का भी माद्दा रखती हैं। भोपाल की अन्ना नगर बस्ती, मदर इंडिया बस्ती, आदि में ऐसी कुछ साहसी लड़कियों के उदाहरण सामने आए हैं। इसमें से एक लड़की तो सीधे खुल कर मीडिया के सामने भी आई है।

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

मेरी सांसें अभी थमी नहीं...
फिर उठूंगा, चल पडूंगा
चुप हूँ लेकिन थमा नहीं...
आग हूँ, फूंको जरा...
फिर जल पडूंगा
अमिताभ

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

मैं बेरोजगार हूँ

कल तक जो जान छिड़कते थे...
वे ढूंढने से भी नहीं मिलते!
अब कोई नहीं कहता...
दोस्त! मैं अब भी तुम्हारे साथ हूँ...
यह अजीब इतेफाक नहीं...
यह वो वक़्त है...
जब मैं बेरोजगार हूँ।

अमिताभ बुधौलिया 'फरोग'

बुधवार, 7 अप्रैल 2010


एक क्रांति बनकर सारी दुनिया बदल जाऊंगा

दो-चार पंख क्या काट लिए
सोचते हो मैं उड़ना भूल जाऊंगा...
हौसलों की उड़ान अभी बाकी है...
तुम देखनाएक दिन...
आसमान छूकर आऊंगा।

अपनी हद से भी गुजरकर देख लो...
मैं नहीं डरूंगा...
तुम्हारे बीच से निकलूंगा....
और तुम्हारा गढ ढ़हा जाऊंगा।

मेरी दुम नहीं, जो हिलाता फिरूं
यहां-वहां, सबके आगे...
तुम तानाशाह बनकर देख लो...
मैं आंधियों-सा आऊंगा...
एक क्रांति बनकर..
सारी दुनिया बदल जाऊंगा।

अमिताभ बुधौलिया

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010


मेरे पिता श्री कंठमणि बुधौलिया वर्षों समाजवादी आंदोलन से जुडे रहे। मीसा के दौरान जेल यात्रा की। बीडी मजदूरों के हित में कई बडे आंदोलन किए। फिलहाल, वकालात कर रहे हैं। उनकी लिखी एक विद्रोही गजल..

बूढे दरख्त सा चरमरा रहा हूं...


क्रेता और विक्रेता का ही संबंध बचा है अब इंसान में,
अब तो मुश्किल पहचानना यारो अंतर घर और दुकान में॥

देखो खादी विचार नहीं अब लाइसेंस है आखेट का,
चित्र लगाकर बैठे हैं शिकारी गांधी का अब मचान में॥

जिसने कद बढाया अपना तोडे घुटने उसके दरवारे-आम,
आखिर अंतर होता है बुनियादी सिंहासन और पायदान में॥

भाषा, संस्कृति, धर्म-मजहब के इन बूढों को तो देखो,
आतिशबाजी का खेल-खेलते हैं आस्था के खलिहान में॥

जिनके दरवाजे बंधी हुई हैं योजना की कामधेनुएं,
यक्ष, किन्नर-वरुण देवता हैं आज के हिंदुस्तान में।

वहेलियों के सम्मेलन में अभिनंदित होती हैं गुलेलें,
जब भी परिंदे उडान भरते हैं खुलकर के आसमान में।

ये तो गलतबयानी दोस्तों इतिहास उठाकर देख लो,
मुर्दों ने कब विद्रोह किया है जाकर के श्मशान में।

बोटी देखकर दुम हिलाए वरना काटे और गुर्राए,
कुत्ते जैसी सीरत देखो दफ्तर बैठे श्रीमान में।

न वो रौनकें, न मुक्त ठहाके महफिल भी न यार की,
बूढे दरख्त सा चरमरा रहा हूं जिंदगी की दालान में।

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

अनुशासनहीनता और भ्रष्टाचार पर
काका हाथरसी के दो व्यंग्य

1

बिना टिकिट के ट्रेन में चले पुत्र बलवीर
जहाँ ‘मूड’ आया वहीं, खींच लई ज़ंजीर
खींच लई ज़ंजीर, बने गुंडों के नक्कू
पकड़ें टीटी गार्ड, उन्हें दिखलाते चक्कू
गुंडागर्दी, भ्रष्टाचार बढ़ा दिन-दूना
प्रजातंत्र की स्वतंत्रता का देख नमूना
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2

राशन की दुकान पर, देख भयंकर भीर
‘क्यू’ में धक्का मारकर, पहुँच गये बलवीर
पहुँच गये बलवीर, ले लिया नंबर पहिला
खड़े रह गये निर्बल, बूढ़े, बच्चे, महिला
कहँ ‘काका' कवि, करके बंद धरम का काँटा
लाला बोले - भागो, खत्म हो गया आटा
-----------------------------------

रविवार, 21 फ़रवरी 2010


इंडिया सीखे डांस
अमिताभ फरोग
कोरियोग्राफी के मामले में अच्छे-खासों की बोलती बंद कर देने वालीं सरोज खान के आगे ‘एंग्री-यंग जर्नलिस्ट’ भी नि:शब्द हो उठे। दरअसल, प्रेस कान्फ्रेंस में पौन घंटे विलंब होने पर कुछ जर्नलिस्ट नाराज हुए, तब सरोज खान ने जिस प्रभावी अंदाज में देर से आने का तर्क दिया, उस पर माहौल एकदम कूल हो गया। बल्कि थोड़ी देर में ठहाके भी सुनाई पड़ने लगे। कलर्स चैनल पर प्रसारित होने जा रहे बच्चों के डांस रियलिटी शो ‘चक धूम-धूम’ के फाइनल ऑडीशन लेने सरोज खान के संग विंदु दारा सिंह और प्रवेश राणा भी रविवार को भोपाल में थे।

‘बिग बॉस में होती तो सबको ठीक कर देती’ सरोज खान
सरोज खान सिर्फ नचाना नहीं जानतीं, उन्हें अक्ल ठिकाने लगाना भी आता है। यह दीगर बात है कि, उनकी समझाइश का अंदाज बड़ा प्यारा और निराला होता है। प्रेस कान्फ्रेंस में विलंब से पहुंचने पर मीडिया की नाराजगी उन्होंने कुछ यूं पिघला दी-‘आप बड़े हैं, वहां हम बच्चों के साथ थे। आपको इंतजार करा सकती हूं, लेकिन बच्चों को नहीं।’ सरोज खान बताती हैं कि उन्हें ‘बिग बॉस-तृतीय’ से आॅफर आया था। वे चुटकी लेती हैं-‘सिर्फ आॅफर नहीं, बड़ा ऑफ़र मिला था।
इसमें विनिंग प्राइज अलग थी, लेकिन मैंने वहां जाना उचित नहीं समझा। अगर जाती, तो सबको ठीक कर देती।’
उनके मुताबिक,‘हरेक चीज का एक दौर होता है। इन दिनों फिल्मों में डांस का अच्छा दौर नहीं चल रहा। बच्चे मेरे पास हिप-हॉप भी सीखने आते हैं, तो मैं मना नहीं करती। लेकिन जिस दिन इसका पन्ना भर जाएगा, हिंदुस्तानी शैली लौट आएगी। वे मीठी मुस्कान के संग वर्तमान कोरियाग्राफर्स पर व्यंग्य मारती हैं-‘अगर ढेर सारे लड़के-लड़कियां चिपके रहेंगे, तो मैं हिलूंगी कहां?’ ‘बेटा’ फिल्म के गीत ‘सैयाजी से...’ को अपना बेस्ट वर्क मानने वालीं सरोज राखी सावंत की डांस परफार्मेंस पर कुछ यूं टिप्पणी करती हैं-‘राखी को कभी नचाया नहीं, इसलिए नो कमेंट!’ सरोज खान बच्चों की बिगड़ती आदतों के लिए टेलीविजन को दोषी नहीं मानती। वे दो टूक कहती हैं-‘कुछ बच्चे मां-बाप की वजह से भी बिगड़ते हैं, तनाव में आते हैं, फिर टेलीविजन को दोष क्यों? टेलीविजन कभी नहीं कहता कि ऐसा करो, ऐसे मरो!’
उनके मुताबिक, रियलिटी शो के दौरान अब काउंसलर भी रखे जाते हैं, ताकि बच्चे तनावग्रस्त न हों। वे कहती हैं-‘हम भी बच्चों से ऐसे अलफाज कतई नहीं बोलते, जिनसे उनका दिल टूटे। हम यही बोलते हैं कि बेटे! थोड़ा वीक हो, ट्राय नेक्स्ट ईयर।’ लेखकों की तरह क्या कोरियोग्राफर्स को भी फिल्मों से रॉयल्टी नहीं मिलनी चाहिए? सरोज दो टूक जवाब देती हैं-‘यह बेहद उलझा हुआ मामला है। वैसे हम लोगो को इसकी कोई फिक्र नहीं। हमारे पास खजाना है, कमाते रहेंगे।’

लड़कियां तंग करने लगी हैं
प्रवेश राणा
कलर्स चैनल के रियलिटी शो ‘बिग-बॉस-तृतीय’ से सुर्खियों में आए प्रवेश राणा से अगर आप उनका मोबाइल नंबर मांगेंगे, तो देते वक्त यह बोलना नहीं भूलते-‘एक टेक्स्ट मैसेज अवश्य छोड़ देना!’ आखिर क्यों?
वे मुस्कराते हैं-‘अरे यार! जबसे बिग-बॉस से बाहर आया हूं, लड़कियां फोन पर तंग करने लगी हैं। घरवाले भी बहुत परेशान हैं। शादी के ढेरों प्रस्ताव आ रहे हैं।’
वर्ष, 2008 में ‘मिस्टर इंडिया’ रहे प्रवेश खुले दिल से कलर्स का शुक्रिया अदा करते हैं- ‘सिर्फ 54 दिनों में क्या कोई इतना लोकप्रिय हो सकता है? बिग-बॉस के बाद मुझे सारा इंडिया जानने लगा है। लाइफ एकदम चेंज हो गई है, ढेरों ऑफ़र्स मिल रहे हैं।’
‘बिग बॉस’ में विंदु से हुए विवाद पर प्रवेश स्पष्ट करते हैं-‘जरूरी नहीं कि दो लोगों की सोच एक-समान हो! वैसे वह झगड़ा सिर्फ शो तक ही सीमित था, अब हम अच्छे दोस्त हैं।’
प्रवेश विंदु के पिता जानेमाने पहलवान और अभिनेता दारा सिंह से मिलने को व्याकुल हैं-‘वो महान व्यक्ति हैं। मैं उनसे मिलना चाहता हूं, लेकिन वक्त नहीं निकाल पा रहा। किसी दिन विंदु से बोलूंगा, कि वो उनसे मिलाने
ले चले।’

बच्चों को देख-देखकर डांस सीख रहा हूं विंदु दारा सिंह

‘बिग बॉस-तृतीय’ के विनर विंदु बिंदास अंदाज में स्वीकारते हैं कि वे बच्चों को देख-देखकर डांसिंग स्टेप सीख रहे हैं। वे ठहाका लगाकर बोलते हैं-‘फिल्मी डांस तो खूब करता हूं, लेकिन बाकी डांस में कच्चा हूं, इसलिए सरोजजी से पूछता रहता हूं। वहीं बच्चों को देख-देखकर भी बहुत कुछ सबक ले लेता हूं।’ विंदु चाहते हैं कि डांस सारे इंडिया को आना चाहिए। क्यों? वे मजा लेते हैं-‘थोड़ा-बहुत डांस तो हम सभी को आना चाहिए। बारात-पार्टियों में भी तो कभी-कभार नाचना पड़ता है।’ हालांकि वे तर्क देते हैं-‘डांस एक अच्छी एक्सरसाइज है। आप जिम जाते हैं, तो कुछ स्पेशल एक्सरसाइज करते हैं, लेकिन डांस में पूरी बॉडी हिल जाती है, शेप में आ जाती है।’
विंदु बच्चों के डांस रियलिटी शो से जुड़कर बहुत खुश हैं। वे प्रसन्नता जाहिर करते हैं-‘सिर्फ बच्चों के रियलिटी शो ही ऐसे होते हैं, जिन्हें हर कोई देखना पसंद करता है। चैनल नहीं बदलता। मुझे बहुत मजा आ रहा है।’ विंदु मानते हैं कि देश में टैलेंट की कोई कमी नहीं है, आवश्यकता उन्हें सही मार्गदर्शन देने की है। बतौर जज विंदु के लिए कई बार दुविधा की स्थिति बन जाती है। वे उदाहरण देते हैं-‘अहमदाबाद का एक बच्चा स्नेह बार-बार मेरी नींद उड़ा देता है। आॅडिशन के दौरान उसे सिलेक्ट करें या नहीं; इसे लेकर हम सब बेहद दुविधा में थे। आखिरकार जब उसे मना किया गया, तो उसके आंसू निकल आए। ऐसी घटनाएं देखकर मन दु:खी हो जाता है।

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

विंदु दारा सिंह (बिग बॉस-तृतीय के विनर)


मुझे गुस्सा आ रहा है
गाड़ी अब तक क्यों नहीं मिली?

अमिताभ फरोग
‘बिग बॉस-तृतीय’ के विनर विंदु दारा सिंह इस ‘रियलिटी शो’ की जनक कंपनी ‘वायाकॉम-18’ से इन दिनों बेहद गुस्साए हुए हैं! कारण, बाजिव भी है-उन्हें बतौर प्राइज मिलने वाली शेवरले क्रूज गाड़ी अब तक नहीं सौंपी गई है। इस गाड़ी की कीमत करीब 12 लाख 75 हजार रुपए है।
आपने ‘बिग-बॉस-3’ के घर में विंदु दारा सिंह का गुस्सा तो देखा ही होगा? अगर आप समझते हैं कि विंदु बेवजह आगबबूला हो उठते हैं, तो यह 100 प्रतिशत सही नहीं है। दरअसल, विंदु को गुस्सा यूं ही नहीं आता? वे तब स्वयं पर काबू नहीं कर पाते, जब कुछ गलत होते देखते हैं। इन दिनों विंदु गुस्से में हैं, क्यों? विंदु मुस्कराते हुए जवाब देते हैं-‘बतौर प्राइज एक करोड़ रुपए के अलावा मुझे शेवरले क्रूज गाड़ी मिलनी थी, उसका आज तक कोई अता-पता नहीं है। समझ में नहीं आ रहा कि गाड़ी कब मिलेगी? मजेदार बात यह है कि गाड़ी की लांचिंग हो चुकी है और वह मार्केट में कई लोगों तक पहुंच भी गई होगी, लेकिन मैं अब तक उसके आनंद से वंचित हूं। अब आप ही बताइए, गुस्सा क्यों नहीं आएगा?’
विंदु प्राइज का गणित क्लियर करते हैं-‘कंपनी ने प्रतिभागियों से कान्ट्रेक्ट मनी साइन कराई थी। इसकी पैमेंट अवधि 45 दिन थी। यह पैसा तो मुझे मिल गया। बाकी प्राइज मनी एक करोड़ रुपए किश्तों में मिलनी है, जिसकी टोटल अवधि 75 डेज है।’
जैसा प्रचारित किया गया था,विंदु को पैसों की सख्त आवश्यकता थी, इसलिए वे ‘बिग बॉस’ के घर में आए? विंदु सहज भाव से बोलते हैं-‘पैसा तो हाथ का मैल है। मेरे लिए पैसा इतना महत्वपूर्ण कभी नहीं रहा, हां मैं एंजॉय करने बिग-बॉस के घर गया था।’
विंदु ने ‘बिग-बॉस’ के घर में कितना एंजॉय किया? वे हंसते हैं-‘बहुत बुरा खेल है। सारी इमेज मटियामेट कर देता है। शुरुआत में तो जैसे मेरे दिमाग ने काम करना ही बंद कर दिया था। समझ नहीं आ रहा था कि यहां क्या चल रहा है? इसलिए थोड़े बहुत झगड़े भी हुए, लेकिन उसके बाद मैंने खुद को संभाल लिया।’
विंदु ने ‘बिग-बॉस’ के घर से निकलने के बाद कैसा फील किया? वे राहतभरी सांस लेते हैं-‘84 दिनों के बाद बाहर आकर ऐसा लगा, जैसे जहन्नुम से निकलकर आया हूं। बुरे दौर से बाहर निकलने दोस्तों/परिवार के साथ खूब एंजाय किया।’
विंदु इस शो करीब 70 लाख वोटों से जीते हैं, जबकि ऐसा प्रचारित किया गया कि यह रियलिटी फिक्स था? वे दो टूक कहते हैं-‘मेरे दोस्तों की संख्या बहुत अधिक है।...और ऐसे-ऐसे यार हैं, जो मेरे लिए कुछ भी कर सकते हैं। मैं उन्हें कुत्ता-बिल्ला भी बोलूंगा, तब भी वो बुरा नहीं मानेंगे। मैं तो बोलूंगा कि पूरा देश मेरा यार है। इन्हीं दोस्तों के बूते मैं दावे से कहता हूं कि जितनी बार बिग बॉस के घर में जाऊंगा, विनर बनकर ही लौटूंगा।’
‘बिग बॉस’ के घर से अपने घर लौटने पर दारा सिंह की पहली प्रतिक्रिया क्या थी? विंदु हंसते हैं-‘वे हैरान होकर बोले थे-तू इतना रोता क्यों था? कहीं रोने की एक्टिंग तो नहीं करता था? दरअसल, उन्हें लगा था कि; शायद वहां कोई स्क्रिप्ट दी गई होगी। मैंने उनसे यही कहा था कि बिग बॉस का घर किसी जहन्नुम से कम नहीं है। फेजा फ्राई कर देता है, वहां का माहौल, बेहद डेंजर गेम है।’
विंदु को अकसर प्रॉपर्टी से बतियाते खूब पाया गया, यहां तक कि वे कमोड से तक बात करते थे? वे स्पष्ट करते हैं-‘मैं प्रॉपर्टी से नहीं; दर्शकों से बात करता था। वहां चौबीसों घंटे कुछ न कुछ अच्छा-बुरा घटता रहता था, लेकिन आप तक सिर्फ संपादित एक घंटे का एपीसोड ही पहुंचता था। ऐसे में दर्शकों में भ्रम पैदा होना स्वाभाविक है। मैं प्रॉपर्टी से बातचीत की ओट में इशारों ही इशारों में आपको 24 घंटे का हालचाल पहुंचाने का प्रयास करता था।’
विंदु बताते हैं कि शो से उन्हें काफी कुछ अनुभव मिले-‘रियली, मैं दिल से बुरा नहीं हूं। कुछ गलतियां की, लेकिन बहुत बुरा कुछ भी नहीं किया। मैंने तो शो की पूरी सीडीज तक नहीं देखीं, क्योंकि वहां मैंने जो किया, उसे देखकर मूड खराब हो जाता है।’

सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

उमा अय्यर रावला (ख्यात वायस आर्टिस्ट/एनाउंसर)


मैं प्रदेश की बेटी हूं,
बुलाएंगे, तो अवश्य माइक थामूंगी

अमिताभ फरोग
आप ही आकलन कीजिए! एक एनाउंसर/वाइस आर्टिस्ट, जिसकी लगभग हरेक कार्यक्रम में ठीक वैसी ही आव-भगत की जाती रही हो, जैसी वहां आमंत्रित अतिथियों की होती है...उसे आप कला की किस श्रेणी में रखेंगे? दरअसल, ज्वलंत मुद्दा यही है, जिसे ‘बहस’ का विषय बनाया है चर्चित एनाउंसर सेलेब्रिटी उमा अय्यर रावला ने। केंद्र सरकार के कई महत्वपूर्ण कार्यक्रमों को अपनी ‘दमखमभरी आवाज’ के बूते अविस्मरणीय बना चुकीं उमा ने मध्यप्रदेश में वायस आर्टिस्ट्स के एमपैनलमेंट की वकालत की है।

पिछले हफ्ते नई दिल्ली में आयोजित ‘राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005-नरेगा’ सम्मेलन में एनाउंसमेंट के दौरान उमा को काफी काम्पलीमेंट मिले थे। सुश्री उमा ‘नरेगा सम्मेलन’ को संदर्भित करते हुए मध्यप्रदेश पर फोकस करती हैं-‘केंद्र सरकार के लगभग सभी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीयस्तर के कार्यक्रम कराने की जिम्मेदारी इंडियन टूरिज्म डेवलपमेंट की ईवेंट विंग संभालती है। विज्ञान भवन ने देशभर के चुनिंदा एनाउंसर्स का पैनल बनाया हुआ है। इसका मकसद सिर्फ इतना है कि; इस विधा को न सिर्फ कला की हैसियत से सम्मान मिले, बल्कि एनाउसंर्स की काबिलियत को भी उचित मुकाम हासिल हो। मैं सोचती हूं कि; मध्यप्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग को भी यहां के एनाउंसर्स/वाइस आर्टिस्ट्स का एमपैनलमेंट करना चाहिए। यह तर्क संगत मुद्दा है, क्योंकि इससे न सिर्फ कुछेक एनाउंसर्स की मोनोपॉली खत्म होगी, बल्कि युवा पीढ़ी भी इस विधा को करियर बनाने में दिलचस्पी दिखाएगी।’
वे बिहार सरकार का उदाहरण देती हैं-‘एक कार्यक्रम के दौरान नीतीश कुमार ने स्वयं आकर मेरे कार्य की तारीफ की थी। गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी अपने कार्यक्रमों के दौरान एनाउंसमेंट में व्यक्तिगत दिलचस्पी लेते हैं। वहां एनाउंसर्स/ कम्पेयर्स को उचित पैसा और सम्मान मिलता है। यह व्यवस्था/माहौल मध्यप्रदेश में क्यों नहीं हो सकता? आप एनाउंसर/कम्पेयर का काम हल्केपन से क्यों तौलते हैं? एक फिल्म/टेलीविजन की सेलेब्रिटी को एंकरिंग के एवज में अच्छे होटल में ठहराया जाता है, खिलाया-पिलाया जाता है, आने-जाने के लिए गाड़ी दी जाती है और विदाई के वक्त खासा पारिश्रमिक भी दिया जाता है, लेकिन हम लोगों के लिए ऐसी भावनाएं क्यों नहीं? हमारे साथ अछूतों-सा बर्ताव किसलिए? हम सरकारी आयोजनों में प्रदेश के माउथ पीस होते हैं। एक सेलेब्रिटी का एंकर होना और एक एंकर का सेलेब्रिटी बन जाना, दोनों अलग-अगल बात हैं। जिस दिन हम अपने अंदर एंकर्स के लिए सेलेब्रिटी के भाव पैदा कर लेंगे, उसी दिन से यह फील्ड करियर का एक बेहतर विकल्प बनकर सामने आ जाएगी।’
हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर अच्छी पकड़ रखने वालीं उमा नई पीढ़Þी का संशय दूर करती हैं-‘यह सिर्फ भ्रम है कि इस फील्ड में पैसा और नाम नहीं है। आप क्रिकेट कमेंटेटर हर्षा भोंगले का उदाहरण लीजिए, अमीन सयानी को याद कीजिए या प्रदेश के सुनील वैद्य को देखिए, ये वायस आर्टिस्ट एक सेलेब्रिटी बन चुके हैं।’
सुश्री उमा ऐसी अफवाहों को विराम लगाती हैं, जिसमें अकसर कहा जाता रहा है कि; उनके पास प्रदेश सरकार के कार्यक्रमों के लिए वक्त नहीं है। वे साफगोई से बोलती हैं-‘हर व्यक्ति की ख्वाहिश होती है कि वो जिस फील्ड में भी कार्य करे; उसमें ऊंचाइयों तक पहुंचे, उसके पास पैसा और नाम दोनों बेशुमार हों। यदि मुझे आज केंद्र सरकार ससम्मान आमंत्रित करती है, राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री कार्यालयों या कार्पोरेट वर्ल्ड की बड़ी कंपनियों के अति महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में एनाउंसिंग/कम्पेयरिंग की जिम्मेदारी सौंपी जाती है, तो इसमें बुरा क्या है? इससे तो प्रदेश का गौरव ही बढ़ता है कि; देखो, फलां एनाउंसर मध्यप्रदेश की है! मैं प्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग की निंदा नहीं कर रही, लेकिन यदि वो मुझे उचित पारिश्रमिक और सम्मान के साथ आमंत्रित करेंगे, तो मैं कभी इनकार कर ही नहीं सकती।’
वे गर्मजोशी से बोलती हैं-‘उमा मध्यप्रदेश की बेटी है, उसे तो खुशी होगी।’ उमा वर्ष, 2000 में हुई ‘भोपाल कान्फ्रेंस’ का उदाहरण देते हुए अपने यादगार पल शेयर करती हैं-‘पूर्व प्रमुख सचिव राकेश साहनी, तब प्रमुख सचिव थे। यह आयोजन उनकी के नेतृत्व में हो रहा था। आपको जानकार ताज्जुब होगा कि जब उन्हें मालूम चला कि कार्यक्रम की एनाउंसिंग/कम्पेयरिंग उमा कर रही है, तो उन्होंने बेफिक्र होकर कान्फ्रेंस की जिम्मेदारी मुझे सौंप दी थी।’
उमा कुछ अनुभव बताती हैं-‘बहुत कम लोगों को पता है कि मैं करीब डेढ़ साल राष्ट्रपति भवन में बतौर वायस आर्टिस्ट रहकर आई हूं। दरअसल, पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम सेटेलाइट के माध्यम से दुनियाभर के स्टूडेंट्स को लेक्चर देते थे। मैं ठीक उसी वक्त उनके लेक्चर का हिंदी अनुवाद करती जाती थी। एक एनाउंसर को राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल अपने करीब बैठाकर हौसला अफजाई करें, सोनिया गांधी स्पेशली थैंक्स भेजें, मनमोहन सिंह मुस्कराकर अभिभावदन करें, इसे आप क्या कहेंगे? मैं सिर्फ यह कहना चाहती हूं कि इस फील्ड में भी ग्लैमर है, पैसा है और नाम है। मैं तो नॉन ग्लैमरस लेडी हूं। उसके बाद मुझे मेरी मुंहमांगी कीमत पर कार्यक्रमों के लिए बुलाया जाता है, इसलिए यह कतई मत सोचिए कि एनाउंसर मंच पर सिर्फ मेहमानों को बोलने के लिए आमंत्रित करने वाला एक सूत्रधार होता है, यह एक आर्ट है। आप अपनी वायस से फ्लर्ट करके तो देखिए, शब्दों को सहेजना तो सीखिए, उनसे खेलना तो शुरू कीजिए, पेशन तो दिखाइए; वक्ताओं के बनिस्वत आपको लोग अधिक सुनेंगे।’

उमा के अचीवमेंट
-नई दिल्ली में हुए नासा के सेमिनार-2009 मे एनाउंसिंग।
-स्वाधीनता संग्राम 1857 की 150वीं वर्षगांठ पर लाल किले पर हुए राष्ट्रीय समारोह-2008 में एनाउंसिंग।
- राष्ट्रपति भवन में आयोजित अर्जुन अवार्ड सेरेमनी-2008 में कम्पेयरिंग।
-पूर्व राष्ट्रपति डॉ. कलाम के संग मप्र के चार प्रमुख ईवेंट-2007-08 में एनाउंसिंग।
-हाल में उमा को केंद्र सरकार के फिल्म डिवीजन में हिंदी और अंग्रेजी में वायस ओवर के लिए सिलेक्ट किया गया है।
-विज्ञान भवन में केंद्र सरकार के दर्जनभर कार्यक्रमों में एनाउंसिंग।
-बैंकॉक(थाइलैंड) में आयोजित इन्वेस्टर्स सप्ताह-2009 में कम्पेयरिंग।
-मप्र इन्वेस्टर्स मीट(खजुराहो, इंदौर, जबलपुर और सागर) में कम्पेयरिंग।
-मप्र पुलिस विभाग के प्रमुख कार्यक्रमों में एंकरिंग-1995-2008 तक।

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

भोपाल में शूट होगी ‘फ्रीडम’
अमिताभ फरोग
सुपर सस्पेंस मूवी ‘चॉकलेट(2005)’ और स्थानीय फुटबाल क्लब की समस्या/संघर्ष पर ‘दे दना-दन गोल(2007)’ के निर्माता-निर्देशक विवेक अग्निहोत्री एक लंबी गुमनामी के बाद ‘फ्रीडम’ रचने जा रहे हैं। इस फिल्म की शूटिंग भोपाल में होने की संभावना है।

विवेक अग्निहोत्री वर्षों विदेश और बाद में मुंबई में रहने के बावजूद अपने शहर भोपाल को हमेशा याद रखते हैं। दिलचस्प बात यह है कि जब उनकी पहली फिल्म ‘चॉकलेट’ रिलीज हुई थी, तब उन्होंने स्वयं मीडिया को अपने घर चाय पर आमंत्रित किया था और मित्रवत वार्तालाप की थी। विवेक की दोनों फिल्मों की शूटिंग लंदन में हुई है, लेकिन उम्मीद जताई जा रही है कि ‘फ्रीडम’ भोपाल में रची जाएगी। इस फिल्म के लिए विवेक ने ‘गांधीगीरी फेम’ संजय दत्त और ‘3 इडियट्स’ के ‘1 इडियट’ आर. माधवन को साइन कर लिया है। इस फिल्म में 70 के दशक से लेकर वर्तमान भारत की तस्वीर बयां की जाएगी।
विवेक इस संभावनाओं से इनकार नहीं करते। वे कहते हैं-‘शूटिंग स्थल और सुविधाओं के लिए प्रशासनिकस्तर पर चर्चा चल रही है। हो सकता है कि मेरी अगली फिल्म भोपाल में शूट हो!’
भोपाल में अपनी फिल्म की पृष्ठभूमि तलाशने विवेक पिछले कई वर्षों से प्रयासरत हैं। उल्लेखनीय है कि विवेक के पिता जाने-माने साहित्यकार और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे हैं। उनका वर्ष, 2008(जून) में निधन हो गया है। विवेक की भोपाल में अपनी फिल्म शूट करने की दो वजहें कही जा सकती हैं-पहली; वे कई बार अपनी भावनाएं व्यक्त कर चुके हैं कि; जब भी सही वक्त मिलेगा, वे भोपाल में कोई फिल्म शूट करना अवश्य चाहेंगे, ताकि इस शहर में सिनेमाई-संस्कृति/सभ्यता के अंकुरण में उनका भी कोई सकारात्मक योगदान हो सके। दूसरा कारण, विवेक का पैत्रिक निवास ओल्ड कैम्पियन स्कूल ग्राउंड के पास स्थित है। पिता के निधन के बाद से ही घर लगभग वीरान-सी स्थिति में हैं। विवेक इच्छा जाहिर कर चुके हैं कि वे अपने पिता की अमूल्य संपत्ति यानी पुस्तकों के संग्रहण को लायब्रेरी की शक्ल देना चाहते हैं। इसके अलावा एक फैलोशिप भी प्लानिंग में है। यह उस क्रियेटिव यूथ को दी जाएगी, जो उनके पिता के व्यक्तित्व और कृतित्व पर शोध करना चाहेगा।

बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

भूपिंदर सिंह और मिताली (फिल्म और गजल गायक जोड़ी)


मेरी आवाज ही पहचान है, गर याद रहे

अमिताभ फरोग
गुलजार साहब के गीतों से सजे अलबम ‘चांद परोसा है’ को अपनी मीठी आवाज से उन्मादित करने वाली गायक जोड़ी भूपिंदर सिंह और मिताली बुधवार को एक कार्यक्रम के सिलसिले में भोपाल में थे।

बीती न बिताई रैना, दिल ढूंढता है, एक अकेला इस शहर में और मेरी आवाज ही पहचान है, गर याद रहे जैसे नग्मों को अपनी आवाज से सदाबहार बनाने वाले भूपिंदर और ‘जीवन-गायन’ में उनकी संगिनी मिताली दोनों मानते हैं कि, म्यूजिक का दौर कितना भी बदल जाए, लोग उन्हें हमेशा प्यार करते रहेंगे। भूपिंदर कहते हैं-‘मेरी आवाज ही पहचान है, गर याद रहे।’
विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘इश्किया’ के गीत ‘इब्नबतूता, बगल में जूता...’ को लेकर उठे विवाद पर भूपिंदर तल्ख लहजा अख्तियार करते हैं-‘क्या शब्द किसी की पर्सनल प्रॉपर्टी होते हैं? हम-आप जो बातें कर रहे हैं, क्या उन्हें कोई दूसरा इस्तेमाल नहीं कर सकता? मैंने भी गालिब की एक गजल दिल ढूंढता है...गाई है, तब तो कोई कुछ नहीं बोला? हमें तो गुलजार साहब का शुक्रगुजार होना चाहिए, जो उन्होंने सर्वेश्वर दयालजी की कविता को दुनियाभर में मशहूर कर दिया।’
मिताली कहती हैं-‘गुलजार साहब ग्रेट फिलास्फर हैं। वे जो सोचते हैं, उस तक शायद दूसरा शायर पहुंच तक नहीं सकता। हम बहुतों से प्रभावित होते हैं। हमारी गजलों, गायिकी और शब्दों में उस्तादों की झलक आती ही है, इसे विवाद का रूप नहीं देना चाहिए।’
भूपिंदर और मिताली दोनों गुलजार साहब से बेहद प्रभावित हैं। मिताली कहती हैं-‘वे मेरे फैमिली मेंबर की तरह हैं।’ भूपिंदर बोलते हैं-‘उनके पास बैठकर हमने बहुत कुछ सीखा है।’
उल्लेखनीय है कि भूपिंदर और गुलजार साहब ने ऐसी रचनाएं गढ़ी हैं, जो गायन की जटिल विधाओं में शुमार हैं। जैसे म्यूजिक में एक शब्द प्रचलित है-‘ब्लैक वर्स’ यानी जिसके गीतों में कोई मीटर नहीं होता। ‘ब्लैक वर्स’ कविताओं/गीतों को गाना सरल काम नहीं होता। दरअसल उन्हें गाते वक्त मीटर पर ले जाना अत्यंत जटिल प्रक्रिया है। इसके बावजूद गुलजार और भूपिंदर ने इस पर प्रयोग किए और ‘दिल ढूंढता है फिर वही, फुर्सत के रात दिन (फिल्म मौसम)’ जैसे लोकप्रिय गाने की रचना की।
भूपिंदर और मिताली को क्या पसंद है? भूपिंदर कहते हैं-‘मैं जितनी भी कम्पोजिशन करता हूं, उनमें सबके लिए कुछ न कुछ रखते हैं। बेशक संजीदा गजलें गाना मेरा सब्जेक्ट है, लेकिन महफिलों में ऐसी गजलें लोग सुनते कहां हैं, इसलिए रोमांटिक आदि गजलें भी सुनानी पड़ती हैं।’
सरहद से बाहर गजल की स्थिति पर मिताली फोकस करती हैं-‘विदेशों में हिंदुस्तानी गजलों को सुनने वाले बहुतायता में हैं। हालांकि भ्रम यह है कि वहां गजलों के श्रोता कम हैं। दरअसल, हम टेलीविजन को ही पूरा संसार समझ लेते हैं, जबकि ऐसा है नहीं। हम जब देश से बाहर प्रोग्राम्स देने जाते हैं, तो वहां हिंदुस्तानी श्रोताओं की तादाद काफी होती है और सबसे बड़ी बात; वे गजलों के परंपरागत मिजाज को ही सुनना पसंद करते हैं।’
यदि भूपिंदर का नाम हटा दिया जाए, तो मिताली की कितनी पहचान रह जाएगी? इस सवाल पर पहले भूपिंंदर बोलते हैं-‘ऐसा नहीं है, मिताली अच्छी सिंगर है, उसकी अपनी अलग पहचान है।’
मिताली हसंती हैं-‘यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे भूपिंदरजी मिले, लेकिन जहां तक मेरी व्यक्तिगत पहचान की बात है, तो मैंने सोलो परफार्मेंस भी खूब दी है। साहिल, तौबा-तौबा, आपके नाम, अर्ज किया है आदि ऐसे कई अलबम हैं, जिनमें सिर्फ मेरी आवाज है।’
म्यूजिक में तबले के कम होते प्रयोग पर भूपिंदर चिंता जाहिर करते हैं-‘अब आप कोई भी हिंदुस्तानी इंस्ट्रूमेंट्स देख लीजिए, चाहे बांसुरी हो या तबला; सभी की धुनें की-बोर्ड में सुनने को मिल जाएंगी। मेरा मानना है कि तबले का इस्तेमाल होना चाहिए, तभी इस इंस्ट्रूमेंट को बचाया जा सकता है।’

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010


पूछ बैठीं वैष्णवी ‘ये लावणी-शावणी क्या है?’
वैष्णवी तो आपको याद ही होंगी? 13 वर्ष पहले वैष्णवी ने दूरदर्शन के लोकप्रिय सीरियल ‘शक्तिमान’ में रिपोर्टर गीता का किरदार निभाया था। पिछले दिनों वैष्णवी ‘भोपा उत्सव मेला’ में अपनी नृत्य प्रस्तुति देने आई थीं। कौन-सा नृत्य? मेला समिति ने पब्लिसिटी में यही प्रचारित किया था कि; वैष्णवी महाराष्ट्र का फोक डांस लावणी प्रस्तुत करेंगी! मराठी मानुष तयशुदा समय पर दशहरा मैदान पहुंचे, तो उन्हें आश्चर्य भी हुआ और गुस्सा भी आया। वजह? दरअसल, वैष्णवी ने लावणी नहीं; फिल्मी गानों पर ठुमके लगाए थे।
वैसे इसमें वैष्णवी बेकसूर थीं, क्योंकि यह ‘मजाक’ नासमझों की देन था। वैष्णवी का लावणी नृत्य से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। मजेदार बात, वैष्णवी खुद भी हैरान थीं कि; समिति ने ऐसा कैसे प्रचारित कर दिया कि वे लावणी नृत्य पेश करेंगी?
हास्यास्पद स्थिति तब और निर्मित हो गई, जब मीडिया उनसे पूछ बैठी-‘आपने लावणी कब सीखा?’ वैष्णवी ने हैरानी से मुंह बिचकाया-‘लावणी, ये क्या होता है?’ जब उन्हें बताया गया कि वे भोपाल लावणी नृत्य करने ही तो आई हैं, तो उनका चेहरा देखने लायक था। समीप खड़े समिति के एक पदाधिकारी ने बात संभाली-‘यह पब्लिसिटी की त्रुटि है।’
रामसे ब्रदर्स की भूतिया फिल्म ‘वीराना (1985)’ से बतौर बाल कलाकार अपना फिल्मी करियर शुरू करने वालीं वैष्णवी अपने सरनेम को लेकर भी अजीब-सी हालत में रहती हैं। समस्या यह है कि; यदि वे अपने नाम के साथ सरनेम लगाती हैं, तो लोग उन्हें पहचान ही नहीं पाते। वैष्णवी पहले महंत सरनेम लिखती थीं। शादी के बाद वे ‘मैकडोनाल्ड’ हो गई हैं। दूसरों की छोड़िए, उन्हें खुद भी यह सरनेम अजीब-सा लगता है। वैसे वैष्णवी का घर का नाम भी कुछ अजीब ही है। वैष्णवी को घरवाले प्यार से रेब पुकारते हैं और वे अपनी बिटिया को मैग!
बहरहाल, वैष्णवी भोपाल की खूबसूरती से बेहद प्रभावित नजर आर्इं। उनके मुताबिक,‘ऐसे प्यारे प्राकृतिक नजारे, सुकूनभरा माहौल और हरियाली महानगरों में कहां देखने को मिलत है।’ वे दिल से बोलीं-‘मैं अपनी पूरी फैमिली के साथ एक बार भोपाल सैर करने अवश्य आऊंगी।’

रविवार, 31 जनवरी 2010

वीआईपी (विजय ईश्वरलाल पवार, कॉमेडियन)


मेरी असली आवाज जाने कहां खो गई
अमिताभ फरोग
यह सचमुच मजेदार बात है कि; जो आदमी सैकड़ाभर फिल्म कलाकारों की आवाजें निकालकर अपनी मिमिक्री से लोगों को हंसाता हो-गुदगुदाता हो, कभी-कभार उसे अपनी असली आवाज ढूंढनी पड़ जाती है। सोनी टेलीविजन के चर्चित कॉमेडी शो ‘कॉमेडी सर्कस’ में जबर्दस्त परफर्म करने वाले विजय ईश्वरलाल पवार बोले तो; वीआईपी शनिवार को भोपाल में थे।

मिमिक्री की उलझन? वीआईपी अपने अंदाज में कुछ यूं बयां करते हैं-‘आपको एक मजेदार बात बताता हूं-मेरे दोस्त बोलते हैं कि; वीआईपी एक ऐसा कैरेक्टर है, जो प्यासा भी होगा, तो भी अपनी आवाज में नहीं पुकारेगा। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि, कइयों ने मेरी असली आवाज आज तक नहीं सुनी है।’ वीआईपी मिमिक्री करते हैं-‘हाय! मेरी असली आवाज पता नहीं कहां खो गई?’
दुनिया को हंसाने वाले वीआईपी अपना मनोरंजन कैसे करते हैं? वे दिलचस्पी लेकर बोलते हैं-‘मैं अपने दोस्तों से जोक्स सुनता हूं। मूड बना तो जॉनी भाई(लीवर) के घर जाकर बैठ जाता हूं। उनसे खूब बतियाता हंूं, हंसी-मजाक करता हूं। उनसे गुफ्तगू करना अच्छा लगता है।’
वीआईपी जॉनी लीवर से इतने प्रभावित क्यो हैं? वे अपनी भावनाएं व्यक्त करते हैं-‘जॉनी भाई सिर्फ अच्छे कलाकार नहीं, भले इंसान भी हैं। मुहावरे में बोलूं तो; वे ऐसे हरे-भरे पेड़ हैं, जिनको झुकने में कोई संकोच नहीं होता।’
दुनिया को हंसाने वाले अपनी रूठी बीवी को कैसे मनाते हैं? वीआईपी मुस्कराकर बोले-‘करना क्या? बस मिमिक्री शुरू कर देता हूं। कभी हिजड़ा बन जाता हूं, तो कभी शाहरूख!’
वीआईपी कब गंभीर होते हैं? यह सवाल उनकी संवदेनाओं को झकझोर देता है-‘मैं तब बेहद गंभीर हो उठता हूं, जब देखता हूं कि कोई किसी के संग ज्यादती कर रहा है, एट्टीट्यूट दिखा रहा है।’
वीआईपी अपने बीते दिनों को याद करते हुए बताते हैं-‘मुझे अच्छी तरह याद है, जब मेरे पिताजी (ईश्वरलाल) एक आर्गनाइजर के पास मुझे लेकर गए थे। वह आदमी लगभग दुत्कारने की मुद्रा में बोला था- चलो-चलो, यहां ये क्या करेगा? उस वक्त मेरा दिल बहुत दु:खा था। मैं तड़प उठा था। मन ही मन ईश्वर से बोला था- हे भगवान मुझे कामयाब आदमी अवश्य बनाना, ताकि ये व्यक्ति मुझसे खुद आकर प्रोग्राम करने का निवेदन करे। ईश्वर ने ऐसा किया। अब वह आदमी मुझसे कई बार संपर्क करके प्रोग्राम के लिए बोलता है, लेकिन अब मेरे पास समय नहीं है। वैसे आपको बात दूं कि मुझे लाफ्टर से भी रिजेक्ट कर दिया गया था। दरअसल, किसी ने मेरा साथ नहीं दिया। लोग मेरा नंबर मांगते थे, लेकिन वे बहाना बनाकर टरका देते थे।’
...तो वीआईपी क्या अब वाकई वीआईपी हो गए हैं? वे साफगोई से जवाब देते हैं-‘नहीं, मैं आज भी पहले जैसा ही हूं। मैं कोई पीए-वीए नहीं रखता, कोई भी मुझसे सीधे कांन्टेक्ट कर सकता है।’ वीआईपी थोड़े दार्शनिक हो उठते हैं-‘मेरा मानना है कि कभी भी कोई बड़ा आदमी बन सकता है, लेकिन छोटे-बड़े का भेद नहीं रखना चाहिए। सबकी रिसपेक्ट करो।’
वीआईपी ने जब पहली बार ‘हिजड़े’ की मिमिक्री की, तब उन्हें घर से क्या रियेक्शन मिला? वीआईपी हंसते हैं-‘बच्चे बोले- क्या डैडी; स्कूल में सारे दोस्त चिढ़ाते हैं।’
वीआईपी संभवत : ऐसे पहले स्टैंडअप कॉमेडियन हैं, जो सिर्फ मिमिक्री ही नहीं करते; बल्कि तमाम फिल्म कलाकारों की हूबहू ‘बॉडी-लैंग्वेज’ कॉपी कर सकते हैं। वे कहते हैं-‘रियली! स्वप्निल और मैं आलराउंडर हूं। विश्वास न हो, तो किसी की शक्ल बनाकर दिखाऊं?’
अलवर(राजस्थान) के वीआईपी करीब 8 साल के अंतराल में दूसरी बार भोपाल आए हैं। वे शहर को लेकर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं-‘यहां सब अपने से लगते हैं।’
‘कॉमेडी सर्कस-2’ के विनर वीआईपी सुर भी खूब साधते हैं। वे किशोर स्टाइल में बोलते हैं-‘मुझे गुनगुनाना अच्छा लगता है। वैसे मेरी फैमिली में संगीत रचा-बसा है। श्रीमतीजी का नाम संगीता है। लड़का मधुर और लड़की का नाम हमने ध्वनी रखा है। यानी वीआईपी की म्यूजिक फैमिली।’
वीआईपी ‘ट्रेडमार्क मिमिक्री’ आर्टिस्ट कहे जाते हैं क्यों? वे गुदगुदाते हैं-‘शायद इसलिए, क्योंकि मेरे कुछ डायलॉग्स की टैगिंग हो गई है। जैसे-शटर अप-डाउन। दरअसल, शूटिंग के दौरान मेरे मुंह से यूं ही निकल गया था- चलो कॉमेडी की दुकान खोलते हैं? लोगों को यह सुनने में मजा आया, तो यह टैग बन गया।’
कॉमेडी में फूहड़ता के लिए वीआईपी पाकिस्तानी कलाकारों को दोषी मानते हैं, क्यों? वे गंभीरता ओढ़ते हैं-‘पाकिस्तानी कलाकारों ने ही कॉमेडी में अश्लीलता फैलाई। लोगों को चस्का लग गया, वोटिंग अच्छी होने लगी, तो प्रोड्यूसर्स भी डिमांड करने लगे।’
वीआईपी की संतुष्टि? वे यह कहते हुए बातचीत को विराम देते हैं-‘एक बारगी पैसा भले ही कम मिले, लेकिन लोगों का रिस्पांस बेहतर मिलना चाहिए।’

गुरुवार, 28 जनवरी 2010

दिव्यंका त्रिपाठी (टेलीविजन अभिनेत्री)


मैं ‘गुमनाम’ होना चाहती हूं
अमिताभ फरोग
जीटीवी के सीरियल ‘बनूं मैं तेरी दुल्हन’ के जरिये घर-घर में खासी लोकप्रिय हुर्इं दिव्यंका फिलहाल सारे बड़े ऑफर्स ठुकरा रही हैं, क्योंकि उनकी ख्वाहिश है कि लोग विद्या को अपने दिमाग से बिसरा दें। जिस दिन ऐसा हो जाएगा, दिव्यंका एक नये ‘चरित्र’ में ‘दर्शन’ देंगी! क्यों चाहती हैं, दिव्यंका ऐसा? दार्शनिक नजरिये से उन्हीं की जुबानी...

दिव्यंका सिर्फ सूरत से नहीं; दिल से भी बेहद खूबसूरत, सौम्य और सरल हैं। ऐसा उनके करीबी बोलते हैं। इसकी एकाध नहीं; तमाम वजहें हैं। इन दिनों दिव्यंका अपने घर आई हुई हैं। उन्होंने मुंबई में एक शानदार फ्लैट खरीदा है। उसके इंटीरियर पर वर्क चल रहा है। वहां उनके मित्र इसकी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं और यहां भोपाल में दिव्यंका घर सजाने शॉपिंग कर रही हैं। भला भोपाल से शॉपिंग क्यों? दिव्यंका आश्चर्य मिश्रित प्रतिक्रिया देती हैं-‘भला भोपाल से शॉपिंग क्यों नहीं? भोपाल में क्या नहीं मिलता! फ्री हूं, सोचा घर चलती हूं, वहीं से खरीदारी भी हो जाएगी।’
दिव्यंका ने मुंबई में जो फ्लैट खरीदा है, उसे वे अपनी मम्मी को बतौर सरप्राइज गिफ्ट देना चाहती हैं। यह अक्खा मुंबई और भोपाल में उनके सभी करीबी भली-भांति जानते हैं, लेकिन यह बहुतों को नहीं पता होगा कि दिव्यंका ने अभी तक नये इंटीरियर के साथ घर के फोटोग्राफ्स अपने मम्मी-पापा को नहीं दिखाए हैं, कारण? दिव्यंका एक लाड़ली बिटिया के तौर पर बोलती हैं-‘मैं उन्हें सरप्राइज देना चाहती हूं। यह उनके प्रति मेरे अपार प्यार जताने का एक जरिया है। हालांकि मम्मी-पापा ने फ्लैट देखा हुआ है, लेकिन नया इंटीरियर कैसा है, इसकी जानकारी उन्हें नहीं है।’
लंबे ब्रेक की वजह? वे साफगोई से बोलती हैं-‘मैं तीन साल लगातार काम करते-करते थक चुकी थी। सोचा थोड़ा आराम कर लूं।’
यह लंबा ब्रेक कहीं दिव्यंका को गुमनाम न कर दे? दिव्यंका दार्शनिक लहजे में धाराप्रवाह बोलती हैं-‘ऐसा बिलकुल नहीं है। फिल्म और टेलीविजन दोनों लाइनों में यही तो फर्क है। फिल्मों में आउट ऑफसाइट का मतलब आउट ऑफ माइंड भी होता है। मैं आउट ऑफ साइट अवश्य हुई हूं, लेकिन आउट ऑफ माइंड नहीं। वैसे सच कहूं तो, मैं चाहती भी हूं कि लोग विद्या को पूरी तरह से भूल जाएं। लोग यह भूल जाएं कि दिव्यंका कभी किसी सीरियल में आई थी। यदि लोग विद्या को नहीं भूलेंगे...बनूं मैं...को नहीं बिसराएंगे, तो वे मुझमें वैसी ही छवि ढूंढने की कोशिश करेंगे और न मिली; तो निराश होंगे। इसलिए मैं गुमनाम होना चाहती हूं। मीडिया से भी इसी वजह से दूरी है। मैं अकारण पब्लिसिटी नहीं चाहती। मुझे ग्लैमर की कोई भूख नहीं है। मुंबई ही क्यों, मैंने भोपाल में भी अपने बड़े-बड़े होर्डिंग देखे हैं, इन सबसे अब उकता चुकी हूं। कुछ नया करना चाहती हूं, इसलिए इन दिनों ब्रेक लिया है।’
दिव्यंका खुलासा करती हैं-‘मेरे पास लगातार बड़े ऑफर्स आते रहते हैं। बिग बॉस, नच बलिए जैसे रियलिटी शो के अलावा स्टेज प्रोग्राम्स के लिए भी मुझसे कान्टेक्ट किया जाता रहा है, लेकिन मैंने इनकार कर दिया। ऐसा नहीं है कि प्रोड्यूसर या डायरेक्टर के पास कोई दूसरी च्वाइस नहीं है या मेरे पास काम नहीं है, यहां मामला आत्मसंतुष्टि का है। हम दोनों को एक-दूसरे की आवश्यकता है। मुंबई स्वीट सिटी है। वहां लोग ईगो लेकर नहीं बैठते। इसलिए प्रॉब्लम जैसी कोई चीज नहीं है। दरअसल, मैं सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाने के लिए काम नहीं करना चाहती। कह लीजिए, मुझे अच्छे काम से संतुष्टि मिलती है।’
ब्रेक के बाद फिल्म या टेलीविजन, कहां ‘दर्शन’ देंगी दिव्यंका? दिव्यंका शब्दों को खूबसूरती से पिरोती हैं-‘मैं कुछ भी प्लान नहीं करती। बनूं मैं...अचानक मिला और आगे भी जो कुछ होगा अकस्मात ही होगा। मैं जो भी करती हूं एक झटके में करती हूं। इसलिए भविष्य के बारे में अभी से नहीं बता सकती। हां, इतना अवश्य कहूंगी कि मैं सिनेमा या टेलीविजन में भेद नहीं करती, बस काम अच्छा होना चाहिए। मैं उदाहरण देना चाहूंगी-मेरे पास लोकल से भी एक आॅफर आया है। मेरे एक बहुत करीबी हैं, जिनके साथ भोपाल में काफी काम किया है, वे एक अच्छी कहानी लिख रहे हैं। अगर उस वक्त मैं खाली रही, तो आपको भोपाल दूरदर्शन पर भी दिख सकती हूं।’

बुधवार, 27 जनवरी 2010

शालीन भनोत (एनडीटीवी इमेजिन के सीरियल ‘दो हंसों का जोड़ा’ के सूर्यकमल)


हरेक आदमी दिल से ‘सूर्यकमल’ है

अमिताभ फरोग
छह वर्ष पहले जबलपुर का एक युवक अपने फैमिली बिजनेस के सिलसिले में मुंबई जाता है। वहां एमटीवी के रियलिटी शो ‘रोडीस’ में पार्टिसिपेट करता है और विनर भी बन जाता है। बस; यही से उसकी जिंदगी एक नया मोड़ ले लेती है। वह बिजनेसमैन से एक्टर बन जाता है। यह किसी मूवी की स्टोरी नहीं है, बात शालीन भनोत की हो रही है। एनडीटीवी इमेजिन पर शुरू हुए राजश्री प्रोडक्शन के सीरियल ‘दो हंसों का जोड़ा’ में लीड कैरेक्टर सूर्यकमल बने शालीन अपने अगले-पिछले लम्हों और इस सीरियल की पृष्ठभूमि पर खूब बतियाए...

शायद आपको याद होगा कि; ‘स्टार प्लस’ के रियलिटी शो ‘नच बलिए-4’ के विनर रहे शालीन और उनकी डांस पार्टनर दलजीत कौर को जब शाहरूख खान 50 लाख रुपए कैश और एक चमचमाती कार बतौर प्राइज दे रहे थे, तब इस विजेता की बॉडी लैंग्वेज में किंग खान-सा जुनून झलक रहा था। अब जबकि; ‘दो हंसों को जोड़ा’ में शालीन की तुलना शाहरूख से की जा रही है, तो शालीन खुश तो बहुत हैं, लेकिन जवाब डिप्लोमेटिक मिलता है-‘दो हंसों का जोड़ा और शाहरूख की फिल्म रब ने बना दी जोड़ी दोनों में खासा अंतर है। यह सच है कि सूर्यकमल में शाहरूख का स्केच नजर आता है, लेकिन दोनों का बैकग्राउंड बहुत अलग है। कहानी डिफरेंट है।’
कहीं शालीन शाहरूख के फैन तो नहीं? वे शब्दों को अल्पविराम देते हैं और फिर हंसते हैं-‘मेरे फेवरेट तो अमिताभ बच्चन हैं। वैसे मैं हर उस आदमी का फैन हूं, जो कुछ हटकर करते हैं, अपनी फील्ड में बेहतर परफर्म करते हैं।’
शालीन और सूर्यकमल में कितना अंतर है? वे स्पष्ट करते हैं-‘वास्तविक जिंदगी में मैं सूर्यकमल जैसा तो कतई नहीं दिखता। हां, दिल से मैं क्या; हर आदमी सूर्यकमल जैसा होता है। दरअसल, हम अपने-अपने कामों में इतने बिजी रहते हैं कि अपने भीतर की सादगी को पहचान ही नहीं पाते। आप कभी 15-20 मिनट एकांत में बैठकर अपनी जीवनशैली का विश्लेषण कीजिए। आप खुद को अंदर से सूर्यकमल जैसा सीधा-सच्चा, इनोसेंट ही पाएंगे या बनाने की सोचेंगे। दुनियाभर के आडंबरों से पीछा छुड़ाकर आप सिम्पल लाइफ जीने की सोचेंगे। मैं भी छोटी-छोटी चीजों में खुशियां ढूंढता हूं, जैसा सूर्यकमल का नेचर है। मैं अपने नाम के अनुरूप शालीन भी हूं और थोड़ा बिंदास भी।’
क्या शालीन सचमुच एक्टर बनना चाहते थे? वे खुलासा करते हैं-‘रियली, मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं एक्टर बनूंगा। यह सब इत्तेफाकन हुआ। लेकिन मैं ईश्वर का शुक्रगुजार हूं, कि उन्होंने मुझे जीवन की सही राह दिखा दी।’
क्या शालीन को वाकई डांसिंग में रुचि है या सिर्फ ‘नच बलिये-4’ के लिए उन्होंने डांस सीखा था? वे बताते हैं-‘मेरी मां सुनीता भनोत कथक नृत्यांगना है, इसलिए बचपन से ही डांस में रुचि रही है। नच बलिये..के माध्यम से मुझे टेब, स्ट्रीट, साल्सा, इंडियन और वेस्टर्न जैसी नृत्यशैलियां भी सीखने को मिलीं। हालांकि डांस रेगुलर तो नहीं कर पाता, लेकिन अवार्ड आयोजनों में मौका मिलता रहता है। मुझे लगता है कि यह हुनर भविष्य में बहुत काम आएगा।’
‘दो हंसों का जोड़ा’ के माध्यम से अपने करियर की ‘ऊंची उड़ान’ भरने जा रहे शालीन अपना आकलन बयां करते हैं-‘मैं खुश हूं कि मुझे हर शेड निभाने का मौका मिला। संगम में मदन के कैरेक्टर में मेरा निगेटिव शेड दर्शकों को खूब पसंद आया। वहीं नागिन में मैंने कनिष्क एवं केशव के रूप में दोहरी भूमिका भी निभाई। सात फेरे, दिल मिल गए, गृहस्थी में भी आप सबका मुझे ढेर-सारा प्यार मिला।’
शालीन ने ‘प्यारे मोहन’ में एक छोटा-सा किरदार भी निभाया था। वे दो टूक कहते हैं-‘काम छोटा हो या बड़ा, उसमें आपका प्रभाव दिखाई देना चाहिए। मैं यही प्रयत्न करता हूं।’
कहते हैं कि शालीन 10-12 घंटे से ज्यादा शूटिंग नहीं करते? वे साफगोई से बोलते हैं-‘राजश्री प्रोडक्शन की विशेषता है कि वे अपने कलाकारों का पूरा ख्याल रखते हैं। इसलिए यह कह सकता हूं कि मैं ही नहीं; राजश्री भी इससे अधिक काम नहीं कराता।’
शालीन भोपाल का जिक्र छेड़ने पर हंसते हैं-‘स्कूल की पढ़ाई के वक्त भोपाल का नाम सुनकर डर-सा जाता था, क्योंकि वहां एग्जाम की कापियां चेक होने जाती थीं। हालांकि यह बचपन की बात है, भोपाल बहुत अच्छा शहर है। मैं दो-तीन बार वहां आया हूं। बहुत हेल्पफुल और प्यारे लोग हैं। मैं अपने शब्दों में कहूं, तो भोपाल सिर्फ मध्यप्रदेश की ही नहीं; प्यार की राजधानी भी है।’
15 नवंबर, 1983 को जबलपुर में जन्मे शालीन की स्कूलिंग ‘नचिकेता स्कूल’ से हुई है। वहीं उच्च शिक्षा उन्होंने मुंबई के मीठीबाई कॉलेज से कम्पलीट की है।

शुक्रवार, 22 जनवरी 2010


‘भाव’ खाने लगे हैं गजोधर भैया!
आपने अपने गजोधर भैया को ‘बाम्बे टू गोवा’ में एक खोजी लेखक की भूमिका में तो देखा ही होगा? रात में प्रोग्राम्स और दिनभर ‘कुंभकरणी नींद’ लेने वाले गजोधर भैया चुटकुले और कॉमिक आइटम लिखने के लिए कब वक्त निकालते होंगे? यहां इसकी बहस बाजिब नहीं है! प्रश्न गजोधर भैया के ‘भाव’ का है।
कानपुर के जाने माने कवि बलई काका के सुपुत्र राजू के ‘भाव’ इन दिनों आसमान पर हैं! ...और यह माइलेज मिला है उन्हें ‘बिग बॉस-तृतीय’ के बाद।
बताया जाता है कि वे अपनी पूरी टीम के साथ परफर्म करने के करीब 8 लाख रुपए वसूलते हैं। हां, यह दीगर बात है कि गुरुवार को भोपाल में एक निजी कार्यक्रम के दौरान अपनी प्रस्तुति देने आए राजू श्रीवास्तव को लगभग आधा रेट ही मिला। पूछो क्यों? यह अंदर की बात नहीं; मोल-तोल का मामला है। ‘बोलो मुंह फाड़कर, फिर जो मिले-सो भला।’ इसे मार्केटिंग का नया फंडा भी कह सकते हैं।
यह नायाब फंडा उनके नये पीए पीयूष उपाध्याय की देन हो सकता है? पीयूष बाबू अपने ‘बॉस’ को ‘सबसे महंगे, सबसे खास कॉमेडियन’ बनाने में कोई कसर छोड़ना नहीं चाहते। पीयूष ने गजोधर भैया के कानों में मंत्र फूंका है कि; ‘बंद मुट्ठी लाख की, खुल गई तो खाक की!’ बोले तो; मीडिया से मिलो, लेकिन भाव यूं दिखाओ-जैसे गजोधर भैया ने बड़ी मुश्किल से उनके लिए समय निकाला हो!
गुरुवार को भी कुछ ऐसा ही हुआ। पीयूष दिनभर मीडिया से बोलते रहे कि अभी गजोधर भैया सो रहे हैं! देर शाम जब गजोधर भैया मीडिया से मिले, तब कहीं मालूम चला कि वे तो घंटों से फालतू बैठे हैं? इस आलतू-फालतू कीफंडेबाजी का नतीजा यह हुआ कि जब गजोधर ने मंच संभाला, आधे श्रोता खा-पीकर अपने-अपने घर को रवाना हो चुके थे। इस प्रोग्राम में ज्यादातर लोग गांव से आए थे। एक ने चुटकी ली-‘लगता है गजोधर भैया की कॉमेडी गांव वालों के सिर से निकल गई?’
इस ‘भाव-ताव’ के चक्कर में गजोधर भैया अपने मित्रों को भी घास नहीं डाल रहे। उल्लेखनीय है कि हाल में सुनील पाल के प्रोडक्शन की पहली फिल्म ‘भावनाओं को समझो’ रिलीज हुई है। इस फिल्म में राजू श्रीवास्तव ने भी किरदार निभाया है। राजू इस फिल्म पर जैसे चर्चा ही नहीं करना चाहते, आखिर क्यों? एक मशहूर कॉमेडियन आश्चर्य मिश्रित शब्दों में दो टूक कहते हैं-‘शायद राजू इसलिए फिल्म की पब्लिसिटी नहीं करना चाहते, क्योंकि उन्हें लगता है कि कहीं इससे सुनील की मार्केट वैल्यू न बढ़ जाए? फिर उनके भाव का क्या होगा?’
जागो गजोधर भैया, जागो!
(यह कॉलम पीपुल्स समाचार, भोपाल में प्रकाशित होता है )

गुरुवार, 21 जनवरी 2010

राजू श्रीवास्तव (मशहूर स्टैंडअप कॉमेडियन)


(राजू और अमिताभ फरोग)
अरे भैया का बताएं! हमें तो अपनों ने ही हरा दिया
अमिताभ फरोग
कानपुरिया गजोधर भैया बोले तो; राजू श्रीवास्तव ‘बिग बॉस-तृतीय’ से एक सबक सीख कर निकले हैं, वो यह कि; कभी-कभी ख्याति भी नैया डुबा डालती है। दरअसल, ‘बिग बॉस’ में नामिनेट होने के बाद उन्हें अपने यार-दोस्तों ने भी सिर्फ यह सोचकर वोट नहीं दिए कि,‘राजू तो फेमस हैं, उन्हें दो-चार वोट से क्या फर्क पड़ेगा’? राजू ‘आकृति ग्रुप’ के स्थापना दिवस पर प्रोग्राम देने भोपाल आए हुए थे।

जब सारा मीडिया बोल रहा था कि; ‘बिग बॉस-तृतीय’ तो सिर्फ राजू ही जीतेंगे, ऐसे में पहले ही नॉमिनेशन में घर से बाहर कैसे हो गए? राजू श्रीवास्तव अपनी गजोधर स्टाइल में मजेदार खुलासा करते हैं-‘अरे भैया का बताएं? हम समझत रहे कि हमारे दोस्त-यार हमार को वोट देंगे, लेकिन वे तो बेवफा निकले। दरअसल, बिग बॉस के घर से पहले ही नॉमिनेशन में बाहर हो जाने पर मैं भी हैरान था। दोस्तों से पूछा तो उनका तर्क था कि; अबे उन 13 लोगों में सबसे ज्यादा पॉपुलर आदमी तो तू ही था! सबसे ज्यादा चर्चित चेहरा कहां बाहर आने वाला है? यह सोचकर हमने वोटिंग की तरफ ध्यान ही नहीं दिया! बस, भैया यह सोचते हुए हमारे दोस्तों ने भी हमें वोट नहीं किया, तो बाहर तो आना ही था।’
सुना है कि ‘बिग बॉस’ के बाद गजोधर भैया ‘बॉस’ हो गए हैं? राजू हंसते हुए पलटवार करते हैं-‘अरे नहीं; बॉस बनाना तो आप लोगों और पब्लिक के हाथ में है।’
‘बिग बॉस-तृतीय’ के फिक्स होने की आशंकाओं पर राजू बैकफुट पर जाते हैं-‘जिसका मेरे पास कोई सबूत नहीं, उस बारे में कोई चर्चा नहीं कर सकता। हां, इतना अवश्य मालूम चला है कि; विंदू ने अपने दोस्तों के मार्फत लाखों रुपए के एसएमएस कराए थे। वैसे विंदू की जीत से मुझे खुशी हुई है। वह मेरा अच्छा दोस्त बन गया है। मैंने कभी जीत की ओर ध्यान नहीं दिया था। अकसर जब बिग बॉस के घर में विनिंग प्राइज एक करोड़ रुपए की चर्चा होती थी, तब कहीं मैंने जीत को लेकर सोचना शुरू किया था। ओवरआॅल देखा जाए, तो 9 हफ्ते घर में रहा। उसके बाद बाहर सही सलामत निकल आया, इसकी खुशी है। वजह; वहां काफी लड़ाई-झगड़ा होना लगे थे।’
राजू कानपुर में स्टैंडअप कॉमेडियंस का एक ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट खोलने जा रहे हैं। वे इसमें आड़े आ रहे राजनीतिक पेंच पर व्यंग्य कसते हैं-‘यह पूरा फुल फ्लैश वर्क है। इसके लिए मंत्रियों के आगे-पीछे घूमना पड़ेगा। इसलिए स्लो काम चल रहा है। फिलहाल लोकल एमएलए के सहयोग से जमीन उपलब्ध होने जा रही है।’
राजू स्टैंडअप कॉमेडियंस को प्रतिष्ठित कलाकारों की श्रेणी में रखने को लेकर काफी गंभीर हैं-‘फाल्गुनी पाठक हों या अदनान; दोनों को फिल्मी गानों के अलावा एलबम्स से भी काफी लोकप्रियता मिली, इस तरह के प्रयास स्टैंडअप कॉमेडियंस को लेकर भी होने चाहिए। हमारा अपना उद्योग होना चाहिए।’
सुनील पाल के प्रोडक्शन की पहली फिल्म ‘भावनाओं को समझो’ पर राजू अपनी भावनाओं को फुल रफ्तार से बाहर नहीं निकलने देते। फिल्म को मिले रिस्पांस पर वे सिर्फ इतना कहते हैं-‘सुनील मेरे भाई हैं। हमसब बगैर किसी डिमांड के उनके साथ खड़े हुए।’
राजू इस सवाल पर चुप्पी साध गए कि; उनकी फिल्म को मध्यप्रदेश में वितरक क्यों नहीं मिले?
राजू की फ्यूचर प्लानिंग? वे बताते हैं-‘एक नए चैनल मस्ती की लांचिंग करनी है। कलर्स के साथ कुछ प्रोग्राम्स पर चर्चा चल रही है। फरवरी में बिग एफएम के साथ भी एक कार्यक्रम शुरू हो रहा है।’

रविवार, 17 जनवरी 2010

यूटीवी बिंदास का रियलिटी शो बतौर विनर मिले 10 लाख रुपए


सिद्धार्था के जरिये समीर का ‘बिग स्विच’
अमिताभ फरोग
दिल्ली की जानीमानी रईस फैमिली ‘खन्ना बिल्डर्स’ के वारिस सिद्धार्था खन्ना ‘आधुनिक रॉबिनहुड’ बनकर उभरे हैं। उनकी और ‘स्लम बॉय’ समीर की जोड़ी नेयूटीवी बिंदास के रियलिटी शो ‘बिग स्विच’ का खिताब अपने नाम कर लिया है। उन्हें बतौर प्राइज 10 लाख रुपए कैश मिले हैं।

एक कहावत है-‘मुंह में चांदी की चम्मच लेकर पैदा होना!’ सिद्धार्था पर यह 100 प्रतिशत फिट बैठती है। उन्होंने अपने माता-पिता के सामने कभी भी; कोई भी बड़ी से बड़ी ख्वाहिश पेश की, वह तुरंत पूरी की जाती रही है। अगर सिद्धार्था का मूड विदेश में वीकेंड मनाने का हुआ, तो उन्हें ‘मनी-अरैंजमेंट’ जैसी प्रॉब्लम्स का कभी भी सामना नहीं करना पड़ा, लेकिन ‘बिग स्विच’ के बाद जैसे उनकी जिंदगी में आमूल-चूल परिवर्तन आया है। वे सिर्फ पैसे ही नहीं; हर चीज का महत्व बखूबी समझ गए हैं।
हाई क्लास सोसायटी की लग्जरियस लाइफ से अचानक ‘मलिन बस्ती’ में जाना, कैसा अनुभव रहा? सिद्धार्था दार्शनिक शैली में बोलते हैं-‘सबसे पहले तो मैं यूटीवी बिंदास का थैंक्स कहना चाहूंगा, जिन्होंने मुझे जीने का मकसद सिखाया/बताया। सच कहूं, तो मैंने ऐसी लाइफ के बारे में सपने में भी नहीं सोचा था। मैंने जिस फैमिली में जन्म लिया, वहां ऐशो-आराम की रत्तीभर भी कमी नहीं है। इस शो में आकर मैंने अपनी मातृभूमि से असली जुड़ाव महसूस किया। यहां आकर मालूम हुआ कि अपने हक के लिए कैसे लड़ा जाता है, पैसे की अहमियत क्या होती! दरअसल, शो में टॉस्क दिए जाते थे, जिनमें दो-दो रुपए तक जीत में हासिल होते थे। यह जीत मुझे भीतर से संतोष देती थी। मैंने महसूस किया, कि गरीब लोगों के लिए दो-चार रुपए भी कितनी बड़ी कीमत रखते हैं।’ आस्ट्रेलिया से ‘हॉस्पिटिलिटी मैनेजमेंट’ से ग्रेजुएट सिद्धार्था अपनी जीत को कुछ यूं शेयर करते हैं-‘मैं बयां नहीं कर सकता कि; इस शो ने मुझे कितना आत्मीय सुख दिया है। मैं तो तभी खुद को धन्य महसूस करने लगा था, जब यूटीवी ने शो में आने का ऑफ़र दिया था। चूंकि यह रियलिटी शो टोटली सोशल वर्क पर बेस्ड था, इसलिए सोचा कि; देखता हूं कि मैं किसी गरीब लड़के का सपना साकार कर पाता हूं कि नहीं!’ बिंदास लाइफ जीने में बिलीव करने वाले सिद्धार्था खुलासा करते हैं-‘मालूम था कि वहां लग्जरी लाइफ बहुत याद आएगी। स्लम एरिया की लाइफ में स्वयं को एडजेस्ट कर पाना अत्यंत मुश्किल होगा, लेकिन मैंने इसे चुनौती के रूप में स्वीकार किया। इसलिए पहले ही दिन से स्वयं की आदतें बदलीं और वहां के माहौल में खुद को ढालना शुरू कर दिया। हालांकि ऐसा नहीं कह सकता कि सारे अनुभव सुखद रहे, लेकिन जिंदगी में कड़वे अनुभव से ही सही रास्ता मिलता है।’
25 वर्षीय सिद्धार्था स्वीकारते हैं कि ‘बिग स्विच’ के बाद जैसे उनकी लाइफ ही बदल गई है-‘मैं लग्जीरियस लाइफ जीने में अभ्यस्त रहा हूं, लेकिन अब महसूस हो गया है कि देश और समाज की तरक्की तभी संभव है, जब सारे लोग बराबरी से आगे बढ़ें। मैं समीर का सपना पूरा करने का जरियाभर बने रहना नहीं चाहूंगा; अपनी माटी, अपनी सोसायटी के लिए भी बहुत कुछ करने का मन बना लिया है। सबकुछ ठीक रहा तो मैं गरीब बच्चों की एजुकेशन, खान-पान और जनसुविधाओं की दिशा में कुछ सार्थक प्रयास अवश्य करूंगा। मैं अपने हिंदुस्तान को हर मायने में सबसे आगे देखना चाहूंगा।’
मैं अपने जैसे ख्वाहिशमंद लोगों के काम आऊं, तो खुशी होगी
‘बिग स्विच’ के विनर के तौर पर समीर को 10 लाख रुपए मिले हैं। इस पैसे से वे अपना सपना साकार करेंगे। समीर खुलासा करते हैं-‘मैं एक ईवेंट मैनेजमेंट कंपनी शुरू करना चाहता हूं। हालांकि मैं जानता हूं कि यह राशि बहुत कम है, लेकिन कोशिशें ही रंग लाती हैं। मुझे यकीन है कि यह छोटा-सा प्रयास एक दिन बड़ी कंपनी में अवश्य तब्दील होगा।’ इस जीत से समीर बहुत रोमांचित हैं-‘मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि मैं बहुत लोकप्रिय हो गया हूं। मैंने सिर्फ पैसा ही नहीं कमाया, अपने परिवार के लिए सम्मान और ख्याति भी अर्जित की है। मेरे परिजन बहुत खुश हैं।’ समीर हंसते हैं-‘जब से मैं इस शो के मार्फत प्रसिद्ध और अमीर हुआ हूं, कुछ दोस्तों को जलन होने लगी है। खैर, मैंने इस शो में कई अच्छे दोस्त भी बनाए हैं।’ समीर सिद्धार्था की तारीफ करना नहीं भूलते-‘मैंने उसके रूप में एक अच्छा दोस्त पाया है। हमारी ट्यूनिंग अच्छी थी।’

मंगलवार, 12 जनवरी 2010

उदय दाहिया (स्टैंडअप कॉमेडियन और अभिनेता)


मैं तो शक्ल से ही छटा बदमाश दिखता हूं

अमिताभ फरोग
स्टैंडअप कॉमेडियन’ उदय दाहिया अब ‘भाईगीरी’ पर उतर आए हैं। लेकिन एक कहावत है कि;‘शादी की घोड़ी डांस देखे बगैर एक इंच भी नहीं हिलती-डुलती’...ठीक यही स्थिति उदय की है। वे डॉन बनकर भी लोगों को हंसाना नहीं छोड़ेंगे! सिर मत खुजलाइए! दरअसल, उदय दाहिया सुनील पाल के प्रोडक्शन की पहली फिल्म ‘भावनाओं को समझो’ में डॉन के किरदार में दिखाई देंगे। यह फिल्म 15 जनवरी को रिलीज हो रही है। फिल्म के प्रमोशन बाबत उदय सोमवार को भोपाल में थे।

‘भावनाओं को समझो’ उदय की भी पहली फिल्म है। इसमें वे डॉन छोटू छटेला का रोल निभा रहे हैं। उदय चहकते हैं-‘13 जनवरी को मुंबई में फिल्म का प्रीमियर हो रहा है। इसमें गिनीज बुक आॅफ वर्ल्ड रिकार्ड के रिप्रजेंटेटिव भी शामिल हो रहे हैं। यह फिल्म एक रिकार्ड गढ़ने जा रही है। यह इसलिए; क्योंकि इसमें भारत, पाकिस्तान, आस्ट्रेलिया और दूसरे अन्य देशों के 51 स्टैंडअप कॉमेडियंस शामिल हैं। गिनीज बुक के सामने अपना दावा पेश करने हमें बहुत मेहनत करनी पड़ी। सभी कॉमेडियंस को अखबारों की कटिंग्स आदि जैसे पुख्ता सबूत पेश करने पड़े।’
क्या यह ‘बाम्बे टू गोवा’ का सेकेंड पार्ट तो नहीं? उदय दाहिया तर्क देते हैं-‘वो फिल्म अच्छी थी और यह बहुत बेहतर। अगर आपके दिमाग में यह बात बैठी है कि इसमें स्टैंडअप कॉमेडियंस बेशुमार हैं, तो निश्चय ही इसमें फूहड़ता/अश्लीलता होगी, तो आप भ्रम पाले हुए हैं। इस फिल्म को आप दादा-दादी और पोतों सभी के संग बैठकर देख सकते हैं। मेरा दावा है कि सिनेमा हॉल में कोई बगैर हंसे नहीं रह पाएगा।’
क्या उदय डॉन की भूमिका में लोगों को प्रभावित कर पाएंगे? वे मुस्कराते हैं-‘लोग कहते हैं कि; मैं तो शक्ल से ही छटा बदमाश दिखता हूं। वैसे भी मैं डॉन के रूप में लोगों को डराऊंगा नहीं, हंसा-हंसाकर लोटपोट कर दूंगा।’
दर्शक आप लोगों की भावनाओं को क्यों समझें? उदय अपने चुटीले अंदाज में बोलते हैं-‘अरे भाई, समझना ही होगा! आपको शायद पता नहीं होगा कि मैं भोपाल कैसे गिरते-पड़ते पहुंचा हूं। परसों अंडमान में शो था। वहां से मुझे चेन्नई होते हुए मुंबई और फिर ट्रेन से इटारसी पहुंचना था। लेकिन चेन्नई फ्लाइट लेट हो गई और मैं रविवार को करीब 9.30 बजे मुंबई पहुंचा। तक तक ट्रेन रवाना हो चुकी थी। मैंने तत्काल में रिजर्वेशन लिया था। पैसे तो गए ही, मैं भोपाल न पहुंच पाने को लेकर चिंतित था। फिर सोचा प्लेन से भोपाल चलते हैं, तो फ्लाइट सारी बुक मिलीं। मैंने हार नहीं मानी और इंदौर तक फ्लाइट से आया और वहां से टैक्सी से भोपाल पहुंचा। अब तो आप समझ ही गए होंगे कि मैं अपने प्रदेश को लेकर कितना भावुक हूं। इसलिए यहां के लोगों को मेरी भावनाएं समझते हुए फिल्म देखनी ही होगी, क्योंकि मैं उनका अपना हूं।’
कॉमेडी के बदलते तेवर-रंग पर उदय प्रतिक्रया देते हैं-‘कॉमेडी दो तरह की होती है। पहली वो, जिसे सबके बीच बैठकर सुना/देखा जा सके। यह विशुद्ध कॉमेडी है। इसमें लोग खुलकर यानी ठहाका मारकर हंसते हैं। दूसरी वो; जिसमें लोग शर्मनाक हंसी हंसते हैं। इसे फूहड़ कॉमेडी कहते हैं। सबका अपना-अपना टैलेंट और अपने-अपने दर्शक। हां, जिस कॉमेडियन की रचना/प्रस्तुति पर लोग घरों पर चर्चा करें, उसे दुहराएं वो आर्टिस्ट सदैव याद किया जाता है।’
क्या कॉमेडियंस के बुरे दिन आने वाले हैं? उदय दो टूक कहते हैं-‘मुझे नहीं लगता कि कॉमेडी के कभी बुरे दिन आएंगे। दरअसल, कॉमेडी भी म्यूजिक की भांति है। क्लासिकल, सुगम संगीत और वेस्टर्न म्यूजिक सबका अपना-अपना श्रोता वर्ग होता है, ठीक वैसी ही स्थिति कॉमेडी की है। किसी को साफ-सुथरे पंच सुहाते हैं, तो किसी को फूहड़ता में आनंद मिलता है। सबकी अपनी-अपनी पसंद है।’
अपने आसपास के वातावरण से कॉमेडी के पंच चुनने वाले उदय कहते हैं-‘मैं शक्ल से कॉमेडियन कतई नहीं लगता। इसलिए मैं अपनी रचनाओं पर अधिक मेहनत करता हूं।’ उदय कॉमेडी को सबसे टफ टैलेंट मानते हैं-’एक्टिंग हो या सिंगिंग या डांसिंग सबकी कार्यशालाएं होती हैं, लेकिन कॉमेडी नेचुरल टैलेंट है। इसकी कोई ट्रेनिंग नहीं होती। आपको स्वयं अपना मूल्यांकन करना होगा। यदि आपको लगता है कि आपमें लोगों को हंसाने का हुनर है, तो आप शुरू हो जाइए।’
उदय की क्या ख्वाहिशें हैं? वे साफगोई से बोलते हैं-‘इनसान की ख्वाहिशें अनंत होती हैं।...और होनी भी चाहिए, क्योंकि जिस दिन आप संतुष्ट हो गए, उसी दिन से खुद को खत्म समझ लीजिए।’

सोमवार, 11 जनवरी 2010

पीपुल्स सेलेब्रिटी/वैष्णवी (फिल्म/टेलीविजन अभिनेत्री)



ईशु ने सच्चा रास्ता दिखा दिया है
अमिताभ फरोग
यह सचमुच किसी चमत्कार जैसा है कि; एक लड़की जिसने 8 वर्ष की उम्र में रामसे ब्रदर्स की सबसे चर्चित भूतिया फिल्म ‘वीराना(1985)’ से डरते-डरते अपना सिनेमाई सफर शुरू किया, उसके दिल से स्वयं प्रभु ईशु ने दुनियाभर के तमाम ‘डर’ निकाल दिए हैं। करियर के कई उतार-चढ़ाव के बाद अचानक वैष्णवी की जिंदगी में कुछ ऐसा घटित हुआ कि; वे आध्यात्मिक हो गर्इं। वे अपना जीवन दार्शनिक अंदाज में जीती हैं-फिल्में करती हैं, सीरियल करती हैं और इन सबके बीच से अच्छा-खासा वक्त निकालकर प्रभु ईशु के सुझाए रास्ते पर चलकर सोशल वर्क भी करती हैं। ‘भोपाल उत्सव मेले’ में आयोजित सांस्कृतिक संध्या में अपनी डांस/सिंगिंग प्रस्तुति देने आर्इं वैष्णवी ने खोलीं अपने जीवन में आए बदलाव की परतें...

‘थैंक्स टू क्राइस्ट! उन्होंने मुझे जीवन का उचित रास्ता दिखाया। प्रभु ईशु के प्रति मेरी आस्था हालांकि 17 वर्ष पहले जागृत हुई थी। उस वक्त मेरी फिल्मों में एंट्री ही हुई थी। तब कुछ ऐसा घटित हुआ कि; मैं उन्हीं के बताए रास्ते पर चल पड़ी, लेकिन करीब साढ़े तीन साल पहले मैं पूरी तरह से उनकी भक्त हो गई। मुझे लगता है कि; परमेश्वर ही मुझे अब मेरी मंजिल की ओर ले जा रहा है। मुझमें आत्मविश्वास जागृत हो गया है। अब कह सकती हूं कि मेरे लिए अब कुछ भी असंभव नहीं है।’
वैष्णवी जीसस और अपने बीच में किसी को नहीं आने देतीं। वे बताती हैं-‘इसी 31 दिसंबर को मेरे पास न्यू ईयर सेलिबे्रशन के ढेरों ऑफ़र आए, लेकिन मैंने साफ मना कर दिया, क्योंकि वह समय मैं जीसस की प्रेयर में बिताना चाहती थी। इसे आप संयोग कहें या चमत्कार; इस एक हफ्ते में मुझे दो फिल्मों के आफर्स मिले हैं। यही नहीं, लंबे समय से अटका पड़ा डीडी चैनल के मेरे एक शो का पायलट भी पास हो गया है। इसमें मैं लीड कैरेक्टर में हूं। इसकी शूटिंग फरवरी में शुरू होगी।’
वैष्णवी धर्मशास्त्रों के अलावा ‘दर्शन’ में भी रुचि रखती हैं। क्या वे दार्शनिक हो चुकी हैं? वैष्णवी उपदेशमयी शैली में बोलती हैं-‘हो सकता है कि मेरी बातें सुनकर लोगों सोचते हों कि; यह बहुत फिलॉस्फी झाड़ रही है, लेकिन सत्य यही है कि; जो लोग स्प्रीचुअल होते हैं, वे फिलास्फर हो ही जाते हैं।’
तमाम व्यस्तताओं के बावजूद वैष्णवी सोशल एक्टिविटी के लिए वक्त अवश्य निकालती हैं। वे बताती हैं-‘मुझे लगता है कि; हमें कभी यह नहीं’ सोचना चाहिए कि अकेले हम क्या कर सकते हैं? मैं अपनी ओर से कोशिश रही हूं। मेरी एजुकेशन कम्प्लीट नहीं हो सकी, इसलिए मैं बच्चों की एजुकेशन पर अधिक वर्क कर रही हूं। मेरा मानना है कि यदि देश को आगे ले जाना है, तो बच्चों का पढ़ा-लिखा होना बेहद जरूरी है। मैं हेल्पस ऑफ जीसस संस्था से जुड़ी हुई हूं। यह ओल्ड एज होम और अनाथ आश्रम संचालित करती है। हम वर्सोवा(मुंबई) में एक बालवाड़ी खोलने जा रहे हैं, जिसमें 200 बच्चों की परवरिश और एजुकेशन होगी। आपको जानकर हैरानी होगी कि ये बच्चे बिलकुल भी पढ़ना-लिखना नहीं जानते। भोपाल की एक संस्था बेटी बचाओ आंदोलन के रूप में अच्छा कार्य कर रही है। मेरा मानना है बेटियां भी बेटों से कम नहीं होतीं। ऐसे तमाम मुद्दे हैं, जिन पर काम करना मुझे सुकुन देता है। मैंने न्यूट्रिशियन का कोर्स किया है। इसलिए संभव है कि सोशल सर्विस के रूप में इस योग्यता का इस्तेमाल भी करूं।’
13 वर्ष पहले दूरदर्शन के सीरियल ‘शक्तिमान’ में रिपोर्टर गीता विश्वास के रूप में बच्चों में लोकप्रिय हुर्इं वैष्णवी अनुपम खेर और रघुवीर यादव जैसे मझे हुए कलाकारों के साथ फिल्म ‘सांचा’ में बेहद गंभीर रोल में नजर आएंगीं। वे उल्लासित होकर बोलती हैं-‘यह रोल मिर्च-मसाला की स्मिता पाटिल-सरीखा है, बस टेक्सचर, लुक डिफरेंट है। यह मूवी यूपी के र्इंट भट्टों में कार्य करने वाले मजदूरों की जिंदगी पर बन बनी है। फिल्म बहुत अच्छी है। इसके लिए मुझे बहुत मेहनत करनी पड़ी। कई दिनों वर्कशॉप हुई, जिसमें कैरेक्टर की खूबियां सिखाई गर्इं।’

वैष्णवी सबटीवी के लिए एक कॉमेडी शो भी कर रही हैं। वे दार्शनिक लहजे में बोलती हैं-‘वैसे हरेक किरदार एक चैलेंज होता है, यदि उसे आप शिद्दत से निभाएं। फिर भी कॉमेडी करना बेहद टफ है। इसमें टाइमिंग का खासा महत्व होता है। यह शो बहुत जल्द आपको देखने को मिलेगा।’
वैष्णवी आमिर खान से बहुत प्रभावित हैं-‘ही इज माई रोल मॉडल। वे वाकई में हिस्ट्री मेकर हैं।’
मूलत: मध्यप्रदेश की वैष्णवी हैदराबाद में पली-बढ़ी हैं। वे चहकती हैं-‘मेरे पिता ईश्वर महंत दुर्ग में रहे हैं। मैं भोपाल की खूबसूरती देखकर बहुत खुश हूं। सोच रही हूं कि किसी दिन फैमिली के साथ यहां कुछ दिनों के लिए घूमने-फिरने आऊं।’ वैष्णवी का अंतिम लक्ष्य क्या है? वे फिर दार्शनिक शैली अपनाती हैं-‘मैं तो बस परमेश्वर के बताए रास्ते को फॉलो कर रही हूं। उनकी कृपा रही तो अच्छी मूवी भी मिलेंगी और अवार्ड भी।’

वैष्णवी ने ‘सहारा वन’ के रियलिटी शो ‘सास वर्सेज बहू’ में ‘बेस्ट डांस सीरिज’ का खिताब जीता था। -वैष्णवी को बचपन में बेबी स्वाती के नाम से जाना जाता था। -वैष्णवी ने सीरियल छोटी मां और भास्कर भारती जैसे सीरियल भी किए हैं।

गुरुवार, 7 जनवरी 2010

शुभांगी अत्रे (लीड एक्ट्रेस ‘दो हंसों का जोड़ा’)


मुझे राजश्री की हर बात अच्छी लगती है
अमिताभ फरोग मार्केटिंग से ‘एमबीए’ शुभांगी अत्रे बखूबी जानती हैं कि सक्सेस होने के लिए ‘रिलेशंस और इमोशंस दोनों’ की अहमियत समझना बेहद जरूरी होता है। दरअसल, तमाम आर्टिस्ट स्वयं की मार्केटिंग करते-करते रिश्ते/नातों को बिसरा देते हैं। शुभांगी ने खुद को इस अहंकार/स्वार्थ से बचाए रखा है। वे आज भी एकता कपूर की चहेती हैं और ‘राजश्री’ जैसे प्रतिष्ठित प्रोडक्शन में भी अपनी एंट्री कराने में सफल रही हैं। शुभांगी ‘एनडीटीवी इमेजिन’ पर शुरू होने जा रहे सीरियल ‘दो हंसों का जोड़ा’ में लीड एक्ट्रेस ‘प्रीति’ का रोल निभा रही हैं।

‘बालाजी टेलीफिल्म’ के सीरियल ‘कस्तूरी’ में लीड रोल कर चुकीं शुभांगी अत्रे ‘दो हंसों का जोड़ा’ को लेकर बेहद उत्साहित हैं। वे बताती हैं-‘यह कंसेप्ट मेरे दिल के बहुत करीब है। मेरे भी बड़े-बड़े ड्रीम रहे हैं, जो धीरे-धीरे साकार हो रहे हैं। ठीक ऐसी ही स्थिति इस सीरियल की एक्ट्रेस प्रीति की है। सपनों में जीने वाली 22 वर्षीय प्रीति संस्कारों की नगरी वृंदावन में रहती है। उसकी अपनी एक अलग ही दुनिया है। उसके कुछ रंगीले ख्वाब हैं, जिन्हें वह अपनी झोली में समेटना चाहती है। वह उन्मुक्त परिंदे की भांति खुले आसमान में उड़ना चाहती है। प्रीति को कुछ-कुछ फिल्मी बोल सकते हैं। हां, इसके बावजूद वह संस्कारित है, भारतीय संस्कृति/सभ्यता और घर-परिवार के आदर्शों की उसे फिक्र है।’
टेलीविजन पर लंबे ब्रेक की वजह? शुभांगी कहती हैं-‘कस्तूरी के बाद मुझे ऐसे ही किसी अच्छे रोल का इंतजार था। हालांकि इस बीच ढेरों आॅफर मिले, लेकिन मैं कुछ ऐसा चाहती थी, ताकि लोग मुझे हमेशा याद रखें। राजश्री ने मेरी यह ख्वाहिश पूरी कर दी है।’
शुभांगी अपने कैरेक्टर को लेकर क्या फीलिंग कर रही हैं? वे मुस्करा उठती हैं-‘थोड़ा नर्वस हूं, क्योंकि मुझे राजश्री ने बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। उन्होंने मुझ पर लीड रोल के लिए भरोसा किया है। उस पर मुझे खरा उतरना है। हां, मैं एक्साइट भी हूं, क्योंकि कस्तूरी के बाद मुझे ऐसे ही कैरेक्टर की तलाश थी।’
‘राजश्री प्रोडक्शन’ में ऐसा क्या है? शुभांगी तारीफों के पुल बांधना शुरू करती हैं-‘राजश्री के बारे में जितना बोला जाए, कम है। मुझे राजश्री की हर बात अच्छी लगती है, चाहे वो कहानी हो या डायलॉग। राजश्री की फिल्में हों या सीरियल, सब भारतीय संस्कारों से जुड़े होते हैं। उनकी क्रियेटिविटी में सोसायटी के लिए कोई न कोई लेशन निहित होता है। दरअसल, बहुत ज्यादा एक्सपेरिमेंट के चलते ज्यादातर सीरियल्स आधुनिकता के ढोंग में भारतीय संस्कृति/संस्कार और सभ्यता की छीछालेदर करने से भी बाज नहीं आते। राजश्री में ऐसा नहीं है। यही एकमात्र ऐसा प्रोडक्शन हाउस है, जिसने भारतीय परंपराओं और संस्कारों को पकड़कर रखा है।’
एक अच्छे कलाकार की खूबी? शुभांगी दार्शनिक शैली में बतियाती हैं-‘जो भी कैरेक्टर मिले, उसे डूबकर निभाया जाए। मैं भी यही कोशिश करती हूं। हालांकि मैंने एक्टिंग की कोई फॉर्मल ट्रेनिंग नहीं ली है और न ही थियेटर किया है, लेकिन मेरा मानना है कि अगर आपमें टैलेंट है, तो आपको कोई इगनोर नहीं कर सकता।’
शुभांगी रिलेशंस को शिद्दत से निभाती हैं। जब वे कस्तूरी कर रही थीं, तब साथी कलाकार रूपा गांगुली(महाभारत की द्रोपदी) से उनका गहरा लगाव हो गया था। इस रिश्ते में आज भी उतनी ही गर्माहट है। रूपा गांगुली तो आज भी उन्हें अपनी बेटी के समान मानती हैं।
शुभांगी मध्यप्रदेश को बिलांग करती हैं। उनकी ससुराल इंदौर में है, जबकि ननिहाल भोपाल में। भोपाल कैसा लगता है? इस सवाल पर शुभांगी जैसे चहक-सी उठती हैं-‘ब्यूटीफुल, वंडरफुल, ग्रेट...! भोपाल में मेरा मायका है। मेरी दीदी भी रहती हैं। इसलिए अकसर वहां जाना होता है। बहुत खूबसूरत शहर है-भोपाल। मुहावरे में बोलूं तो, मैंने तो पूरा-पूरा भोपाल छाना हुआ है।’

बुधवार, 6 जनवरी 2010

सुनील पाल (फिल्म निर्माता और निर्देशक ‘भावनाओं को समझो’)


‘भावनाओं को समझो’ मूवी देखिए, मजा आएगा
अमिताभ फरोग
‘स्टैंडअप कॉमेडियन’ से फिल्ममेकर बने सुनील पाल अपने प्रोडक्शन की पहली फिल्म ‘भावनाओं को समझो’ को लेकर काफी उत्साहित हैं। वे देशभर में फिल्म के प्रमोशन बाबत विजिट कर रहे हैं और सिने प्रेमियों से अपनी गुदगुदाने वाली शैली में आग्रह कर रहे हैं कि; हमारी ‘भावनाओं को समझो’ मूवी देखिए, बहुत मजा आएगा।

महाराष्ट्र के चंदनपुर में जन्मे सुनील पाल संभवत: ऐसे पहले स्टैंडअप कॉमेडियन हैं, जिन्होंने मंच से ऊंची छलांग मारते हुए फिल्म प्रोडक्शन में कदम रखा है। वे अपने ‘मल्टीपरपज टैलेंट’ की उपज ‘भावनाओं को समझो’ को लेकर अपनी भावनाएं व्यक्त करते हैं-‘वाकई यह बहुत अच्छी मूवी बन पड़ी है। मैं यह इसलिए नहीं कह रहा, क्योंकि मैं इसका प्रोड्यूसर/डायरेक्टर और राइटर हूं; आप मूवी देखना, बहुत मजा आएगा।’
सुनील की भावनाएं दर्शकों को कितना गुदगुदाएंगी? वे मूवी की खासियत बयां करते हैं-‘यह बेहद अनूठी फिल्म है। इसमें सिर्फ कॉमिक टच भर नहीं है, इसमें इमोशन है, ड्रामा है, एक्शन है...यानी आर्ट/क्राफ्ट एंड टेक्निक; हर पहलू से मूवी की बेहतर बुनावट हुई है। इसमें हमने मधुर संगीत भी संजोया है। श्रेया घोषाल, सोनू निगम, शान और सुनिधि चौहान जैसे फेमस सिंगर्स के नग्मे आपके कानों में रस घोल देंगे। यह बॉलीवुड की ऐसी इकलौती मूवी है, जिसमें एक-दो नहीं, 51 स्टैंडअप कॉमेडियंस आपको हंसा-हंसाकर लोटपोट कर देंगे। इसी विशेषता के कारण गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड के प्रतिनिधियों को मूवी के प्रीमियर पर आमंत्रित किया गया है। मुझे यकीन है कि; वो लोग हमसब की भावनाओं को समझेंगे और मूवी को गिनीज बुक में जगह मिलेगी।’
इससे पहले पाल वर्ष, 2007 में आई ‘बाम्बे टू गोवा’ में बस मालिक लाल का कैरेक्टर निभा चुके हैं। इस फिल्म में कॉमेडियन एहसान कुरैशी और राजू श्रीवास्तव भी मौजूद थे। स्क्रिप्ट की बेसिक थीम धन के पीछे भागभमभाग थी। फिर ‘भावनाओं को समझो’ में नया क्या है? सुनील दोनों फिल्मों का विश्लेषण करते हैं-‘बाम्बे टू गोवा भी अच्छी फिल्म थी। वह कितना चली, नहीं चली...यह दीगर बात है। भावनाओं...की कहानी अवश्य 1000 करोड़ की प्रापर्टी के इर्द-गिर्द रची गई है, लेकिन इसका ट्रैक बाम्बे टू...से डिफरेंट है। इसमें राजू, एहसान, जॉनी लीवर, नवीन प्रभाकर, उदय दाहिया आदि सबने अपने टैलेंट का 100 परसेंट आउटपुट देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।’
सुनील अपनी भावनाओं को सिनेप्रेमियों तक पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। वे उत्साह से बोलते हैं-‘पब्लिसिटी को नजरअंदाज कतई नहीं किया जा सकता। मैं दिल्ली और मुंबई के अलावा जहां भी शो करने गया या जाता हूं, वहां के लोगों को अपनी फिल्म देखने के लिए आमंत्रित करना नहीं भूलता। वहीं कई चैनल्स के प्रोग्रामों में भी हमें आमंत्रित किया गया है, जिनमें आप समय-समय पर हमारी टीम के फन का आनंद उठा सकेंगे। मैं तो अपनी ओर से अच्छी पब्लिसिटी कर रहा हूं, भगवान ने चाहा तो सबकुछ बेहतर होगा।’
‘द ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज प्रथम’ के बाद कॉमेडी शोज में ‘अभद्र भाषा और फूहड़ शैली’ के घालमेल पर सुनील एकदम दो टूक बोलते हैं-‘इसके लिए अकेले चैनलों पर दोष मढ़ना गलत है।...और इस बुराई के लिए कॉमेडियंस तो कतई जिम्मेदार नहीं। अगर दर्शक ऐसे प्रोग्राम्स को नकार देंगे, तो चैनलों की क्या मजाल, जो वे दुबारा ऐसे प्रोग्राम्स बनाएं? कहते हैं न कि कसाई से ज्यादा मांस का सेवन करने वाला जिम्मेदार होता है।’
सुनील कहां से ढूंढते हैं कॉमिक पंच? वे दार्शनिक लहजे में बोलते हैं-‘आपका सेंस आॅफ ह्यूमर लाजवाब होना चाहिए, हर चीज को देखकर, महसूस करके या उसके संपर्क में आकर आप आनंदित हो सकते हैं। मैं भी रोजमर्रा की चीजों, आप और हमलोगों से जुड़ीं बातों को ही चुटकुलों/कविताओं में इस्तेमाल करता हूं। बस उनमें थोड़ा मिर्च-मसाला डाल देता हूं, ताकि वे श्रोताओं को भीतर तक गुदगुदा दें।’
सुनील पाकिस्तानी कॉमेडियंस की बढ़ती लोकप्रियता से कतई आशंकित नहीं है। वे बिंदास बोलते हैं-‘अगर वे यहां आकर अपनी कला का प्रदर्शन करके कमा-खा रहे हैं, तो इसमें बुराई क्या है? वे भी हमारी तरह कलाकार हैं और कला सियासी सरहदों से परे है।’
अपने जन्मस्थली चंदनपुर के प्रति अटूट प्रेम रखने वाले सुनील कहते हैं-‘कर्मभूमि और जन्मभूमि; हमें दोनों का बराबर सम्मान करना चाहिए। हम जिधर भी जाएं, उस जमीं का सम्मान भी हमें करना आना चाहिए।’
सुनील ने ‘फिर हेराफेरी(2006)’ और ‘अपना सपना मनी-मनी(2006) जैसी हिट फिल्मों में मामूली किरदार भी निभाया है। हालांकि इसके बाद उन्हें ‘फूल एन फाइनल(2007)’ और ‘क्रेजी-4(2008)’ में अपना टैलेंट दिखाने का ठीक मौका मिला। सुनील दार्शनिक लहजा अख्तियार करते हैं-‘उन्हीं छोटे-छोटे कामों ने मुझे इस मुकाम पर पहुंचाया कि; मैं आज फिल्म प्रोड्यूस कर रहा हूं, लिख रहा हूं और उसे डायरेक्टर भी कर रहा हूं। आप छोटे-बड़े के फेर में न पड़ते हुए निरंतर अच्छा कार्य करते जाइए, रिजल्ट बेहतर मिलता रहेगा।’
सुनील का सूत्रवाक्य है-‘जहां माल, वहां पाल!’ इसका क्या आशय है? सुनील दो टूक कहते हैं-‘मुझे ईश्वर ने लोगों को हंसाने का हुनर दिया है, सो मैं उससे अपना घर-परिवार चला रहा हूं। वैसे यह वाक्य मैंने चुनावी प्रचार के लिए तैयार किया हुआ है। दरअसल, चुनाव के बाद नेता और जनता दोनों अपने-अपने कामों में व्यस्त हो जाते हैं। ऐसे में यदि कोई पार्टी सभाओं में भीड़ जुटाने हमारे फन को इस्तेमाल करती है, तो हम पैसा क्यों न कमाएं?’

फिल्म में मेरा किरदार है सबसे निराला, बना हूं मैं इसमें एडवोकेट बाबूलाल फांसीवाला! मुझे यह फिल्म करते वक्त खूब मजा आया। शूट करते वक्त हम खुद भी हंस-हंसकर लोटपोट हो जाते थे। इससे आप आकलन कर सकते हैं कि मूवी आपको कितना गुदगुदाएगी। एहसान कुरैशी, फिल्म के मुख्य कलाकार
यकीन मानिए, मूवी आपका भरपूर मनोरंजन करेगी। यह मेरे करियर की पहली मूवी है। इसमें मैंने छोटू छटेला का किरदार निभाया है, जो डॉन है। सुनील सिर्फ अच्छे कॉमेडियन ही नहीं है, इस फिल्म के माध्यम से उन्होंने साबित कर दिया है कि वे डायरेक्टर भी बेहतर हैं। उदय दहिया, फिल्म के मुख्य कलाकार

-मूवी में मध्यप्रदेश के तीन मशहूर कॉमेडियंस एहसान कुरैशी, उदय दाहिया और केके नायकर भी महत्वपूर्ण रोल में हैं-13 जनवरी को मुंबई में गिनीज बुक के रिप्रजेंटेटिव के समक्ष होगा मूवी का प्रीमियर-सुनील ‘द ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज-2005’ के विनर रहे हैं। यह कॉमेडी शो स्टार वन पर प्रसारित हुआ था।

रविवार, 3 जनवरी 2010

चेतन भगत की तरह आफाक अलमास हुसैन भी छले गए हैं


‘इडियट्स’ ही नहीं, ‘मुन्नाभाई‘ भी छलिया!
अमिताभ फरोग
यह सिर्फ चिकोटीभर काटने का मामला नहीं है, विधु विनोद चोपड़ा पर एक नहीं; दो बार छल-कपट का आरोप लगा है। ‘3 इडियट्स’ चेतन भगत; तो ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ आफाक अलमास हुसैन के लिए ‘छलिया’ साबित हुई है। हालांकि दोनों ही लेखकों ने ‘फिल्म लेखक संघ’ में अपनी शिकायत न ले जाकर सीधे मीडिया के सामने भड़ास निकाली है, इसलिए ‘संघ’ चुप्पी साधे हुए है।

यह सफलता के ‘रंग में भंग’ पड़ने-सरीखा मामला है। ...और ऐसा दूसरी बार हुआ है। चेतन भगत ने सिर्फ ‘3 इडियट्स’ के प्रोड्यूसर विधु विनोद चोपड़ा और निर्देशक राजकुमार हीरानी पर ‘श्रेय छीनने’ का आरोप मढ़ा है, आफाक अलमास हुसैन ने तो ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ की स्क्रिप्ट पर चोरी का इल्जाम लगाते हुए लीगल नोटिस तक भेजा था। यह दीगर बात है कि; यह कदम थोड़ी देर से उठाया गया, इसलिए विवाद तूल नहीं पकड़ सका।
विधु और राजकुमार ने ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ के माध्यम से भले ही दुनियाभर को नैतिकता का पाठ पढ़ाया हो, लेकिन वे स्वयं दूध के धुले नहीं है। कुछ महीने पहले ‘भोपाल ग्रुप आॅफ गांधी स्टार्स’ ने आरोप लगाया था कि; ‘लगे रहो...’ का सेंट्रल आइडिया और कहानी का मूलभूत ढांचा जानेमाने लेखक और निर्देशक आफाक अलमास हुसैन की पुस्तक ‘महात्मा’ से चुराया गया है। पिछले वर्ष ग्रुप ने इस बाबत आगरा में प्रेस कान्फेंस भी आयोजित की थी।
मूलत : लखनऊ के श्री आफाक मायूसी भरे शब्दों में बोलते हैं-‘यह पुस्तक मैंने 12 वर्ष पहले लिखी थी। इसी विषय पर वर्ष 1994 में महात्मा की वापसी नाम से नाटक का मंचन भी किया गया था। इसका निर्देशन मैंने स्वयं किया था। जिन लोगों ने यह पुस्तक पढ़ी है या फिर इस नाटक के दर्शक रहे हैं, वे बेहतर समझ सकते हैं कि लगे रहो...की स्क्रिप्ट का बेसिक कन्सेप्ट कहां से उठाया गया?’
उल्लेखनीय है कि यह पुस्तक उप्र सरकार के संस्थान ‘फखरुद्दीन अली अहमद मेमोरियल कमेटी’ के आर्थिक सहयोग से 1998 में उर्दू भाषा में प्रकाशित हुई थी।
आफाक दु:खी मन से कहते हैं-‘सितंबर 2006 में लगे रहो.. रिलीज हुई थी। मैंने तत्काल विधु विनोद और राजकुमार हीरानी से मिलने की कोशिश की, लेकिन वे कोई न कोई बहाना बनाकर मुझे टालते रहे। मैंने उन्हें एसएमएस भी भेजा, लेकिन जवाब नहीं मिला। मेरे पास इतना पैसा नहीं था कि, इतने अमीर लोगों से टक्कर ले सकूं। इस ऊहापोह में करीब 8-9 महीने निकल गए। इस दौरान जब मैं मुंबई से लखनऊ आया, तब अपने वकील आदित्य तिवारी की मदद से निर्माता और लेखक दोनों को नोटिस पहुंचाया। उनकी तरफ से कोई जवाब न मिलने पर उन्हें रिमाइंडर भी पहुंचाया। इस बीच मेरी कुछ पर्सनल प्रॉब्लम भी रही, जिनके कारण मुझे अपने इस कदम पीछे लेने पड़े।’
‘3 इडियट्स’ को लेकर उठे ताजा विवाद पर आफाक कहते हैं-‘चेतन को उनका प्रॉपर क्रेडिट मिलना ही चाहिए था। चेतन चर्चित लेखक हैं, इसलिए मीडिया का भी उन्हें बहुत सपोर्ट मिल रहा है, लेकिन मैं अकेले जूझता रहा। मेरी लड़ाई भले ही अधूरी रही गई हो, लेकिन इससे गुनाह तो कम नहीं हो जाता?
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मैं आज भी अपनी बात पर अडिग हूं, कि लगे रहो मुन्नाभाई की कहानी मेरी पुस्तक महात्मा से प्रेरित है। मैंने इस फिल्म के रिलीज होने के बाद विधु विनोद चोपड़ा को अपने वकील के माध्यम से नोटिस भी भेजा था, लेकिन उन्होंने खामोशी ओढ़े रखी। आर्थिक परिस्थिति बोलो या कुछ और; मैं सही वक्त पर लीगल एक्शन नहीं ले सका। जहां तक फिल्म लेखक संघ में शिकायत दर्ज कराने का मामला है, तो पुस्तक कॉपीराइट थी, इसलिए वहां जाने की जरूरत क्या थी? वैसे भी संघ निर्माता/निर्देशकों के विरुद्ध कभी एक्शन नहीं लेता। विवाद ज्यादा तूल पकड़ने लगे, तो वह बैठाकर समझौता करा देते हैं। भले ही अब मैं कुछ लीगल एक्शन नहीं ले सकता, लेकिन जो सच है, वो तो सच ही रहेगा।
आफाक अलमास हुसैन लेखक, महात्मा (लगे रहो मुन्नाभाई इस किताब से प्रेरित बताई जाती है)

‘यदि कोई लेखक एसोसिएशन में आकर कम्प्लेन करता है, तो हम मामले को सुलटाने का प्रयास करते हैं। चेतन भगत सीधे मीडिया के पास चले गए, इसलिए मैं इस बारे में कोई कमेंट नहीं कर सकता। फिल्म इंडस्ट्री एक फैमिली की तरह है, इसमें विवाद भी होते हैं और उनका निपटारा भी किया जाता है। न तो चेतन भगत और न ही आफाक अलमास एसोसिएशन के पास शिकायत लेकर आए, इसलिए इस बारे में हम कुछ नहीं कर सकते।’
जलीश शेरवानी अध्यक्ष, फिल्म लेखक संघ
फैक्ट
-करीब 35 करोड़ के बजट की ‘3 इडियट्स’ ने 2 अरब का बिजनेस कर चुकी है -करीब 15 करोड़ लागत की ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ ने करीब 56 करोड़ का बिजनेस किया था। -अभिजात जोशी हैं ‘3 इडियट्स’ और ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ के लेखक -आफाक अलमास दुनिया के दूसरे बड़े प्ले ‘मोहब्बत द ताज’ के निर्देशक रहे हैं और इन दिनों मुंबई में कई सीरियल लिख रहे हैं।