शुक्रवार, 26 दिसंबर 2008


ये युद्ध नहीं आसां

इन दिनों समूचे हिंदुस्तान में एक जंगी माहौल है। पड़ौसी मुल्क पाकिस्तान को मटियामेट करने का जोश और जुनून बच्चे-बच्चे में तूफान बरपा रहा है। युद्ध और क्रिकेट के उन्माद में जैसे बहुत ज्यादा फर्क नजर नहीं आ रहा। क्रिकेट में हर बॉल पर चिल्लाते दर्शकों की भांति युद्ध के प्रति भी लोगों में ऐसी ही भावना और जोश दिखाई दे रहा है। इसे पड़ौसी मुल्क के प्रति नफरत का नतीजा कह सकते हैं, जो इस्लामिक आतंकवाद की उपज है।
पाकिस्तान के प्रति इतनी घृणा शायद पहले कभी नहीं देखी गई। इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि कुछ साल पहले तक आतंकवाद सिर्फ कश्मीर घाटी तक ही सीमित था। आम भारतीय इसे कश्मीरी अवाम की राजनीतिक और सामाजिक समस्या ही मानता रहा है, लेकिन अब स्थितियां बदल चुकी हैं। मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले के बाद पाकिस्तान के प्रति समूचे हिंदुस्तान में गुस्से को जो व्यापक रूप देखा जा रहा है, उसे ठंडा करने के लिए यूपीए सरकार के पास सिवाय युद्ध के जैसे कोई विकल्प ही नहीं बचा है। लेकिन क्या युद्ध से आतंकवाद को जड़ से मिटाया जा सकता है? इस मुद्दे को नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। खासकर तब, जब दुनियाभर में हुए तमाम युद्धों के बावजूद परेशानियां और अधिक बढ़ी हैं।
11 सितंबर, 2001 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आतंकी हमले के बाद अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की सेनाओं ने 7 अक्टूबर, 2००1 में अफगानिस्तान पर चढ़ाई कर दी थी। यह लड़ाई अब भी जारी है। इस जंग में सैकड़ों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। अमेरिका की तमाम कोशिशों के बाद भी अफगानिस्तान में लोकतंत्र अपनी जड़ें नहीं जमा सका है और न ही तालिबान का पूरी तरह से सफाया हो पाया है। सद्दाम हुसैन की तानाशाही खत्म करने अमेरिका ने 2० मार्च, 2००3 में ईराक के विरुद्ध युद्ध का आगाज किया था, जिस पर अभी तक पूर्णविराम नहीं लग पाया है। बुश पर एक पत्रकार द्वारा जूता फेंकने की घटना स्पष्ट इशारा करती है कि जिस समस्या के समाधान के लिए अमेरिका ने सद्दाम की सल्तनत ढहाई, वो अब भी सिरदर्द बनी हुई है।
मुझे एक घटना याद आ रही है। यह मई, 1999 में हुए कारगिल युद्ध के करीब दो साल बाद की बात है। सीमा पर तनाव बना हुआ था। मैं उस वक्त नवभारत, भोपाल में रिपोर्टर था। मुझे एक असाइनमेंट दिया गया, जिसमें सीमा पर तैनात फौजियों के माता-पिता की मनोस्थिति का आकलन करना था। कोई लाख कहे, लेकिन कोई भी मां नहीं चाहती थी कि लड़ाई छिड़े। उन्हें अपने बेटों की वीरता पर पूरा भरोसा था, लेकिन भीतर से वे बेहद व्याकुल थीं। मैंने हैडिंग लगाई थी-सरहद पर हो बेटा, तो क्यों न रोये मां का दिल....दरअसल, शहीद हिन्दुस्तानी हों या पाकिस्तानी, अपनों को खोने का दर्द सबका एक-सरीखा होता है। यह दर्द कसाब की मां को भी महसूस होता होगा...और उन मांओं को भी रुला रहा होगा, जिनके बच्चे युद्ध के लिए सीमाओं पर डेरा डाल चुके हैं। युद्ध करना भारत सरकार की विवशता हो सकती है, लेकिन उन परिवारों के बारे में कौन सोचेगा, जिनका कोई न कोई इस युद्ध में अपनी जान गंवाएगा? काश युद्ध न हो, क्योंकि अपनों को कोई खोना नहीं चाहता। जिन्होंने अपनों को खोया या जो खोएंगे, उनकी पीड़ा दुश्मन फिल्म के इस गीत में स्पष्ट महसूस की जा सकती है...
चिठ्ठी न कोई संदेश...
हूँ, चिठ्ठी न कोई संदेश...
जाने वो कौन सा देश...
जहाँ तुम चले गए।
चिठ्ठी न कोई संदेश...
जाने वो कौन सा देश...
जहाँ तुम चले गए।
जहाँ तुम चले गए।
इस दिल को लगा के ठेस...
जाने वो कौन सा देश...
जहाँ तुम चले गए।
एक आह भरी होगी...
हमने न सुनी होगी...
जाते-जाते तुमने...
आवाज तो दी होगी...
हर वक्त यही है गम...
उस वक्त कहाँ थे हम...
कहाँ तुम चले गए।
चिठ्ठी न कोई संदेश...
जाने वो कौन सा देश...
जहां तुम चले गए
जहाँ तुम चले गए।
इस दिल को लगा के ठेस...
जाने वो कौन सा देश...
जहाँ तुम चले गए।
हर चीज पे अश्कों से...
लिखा है तुम्हारा नाम...
ये रस्ते, घर, गलियां...
तुम्हें कर न सके सलाम...
यही दिल में रह गयी बात...
जल्दी से छुडाकर हाथ...
कहाँ तुम चले गए।
चिठ्ठी न कोई संदेश...
जाने वो कौन सा देश...
जहाँ तुम चले गए।
जहाँ तुम चले गए।
इस दिल को लगा के ठेस...
जाने वो कौन सा देश...
जहाँ तुम चले गए।
अब यादों के कांटे...
इस दिल में चुभते हैं...
न दर्द ठहरता है...
न आँसू रुकते हैं...
तुम्हें ढूँढ रहा है प्यार...
हम कैसे करें इकरार...
के हाँ तुम चले गए।
चिठ्ठी न कोई संदेश...
जाने वो कौन सा देश...
जहाँ तुम चले गए।
जहाँ तुम चले गए।
इस दिल को लगा के ठेस...
जाने वो कौन सा देश...
जहाँ तुम चले गए।
हाँ जहाँ तुम चले गए।

अमिताभ बुधौलिया 'फरोग'

बुधवार, 17 दिसंबर 2008

ईशिता पंचाल : बेस्ट चाइल्ड अवार्ड के लिए नामांकित

नटखट छोरी का गंभीर अभिनय
6 दिसंबर को रात 7:11 बजे मोबाइल पर एक एसएमएस आता है, जो चर्चित चाइल्ड एक्ट्रेस ईशिता पंचाल की मां ने भेजा था। करीब 9-10 साल की ईशिता सहारा वन पर प्रसारित हो रहे राजश्री प्रोडक्शन के धारावाहिक 'वो रहने वाली महलों की' के लिए 'इंडियन टेली अवार्ड' में 'बेस्ट चाइल्ड कैटेगरी' में नामांकित हुई है।एसएमएस ने पिछले साल की याद दिला दी, जब ईशिता राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म 'एक विवाह ऐसा भी' की शूटिंग के लिए भोपाल आई हुई थी।यह पिछली जनवरी, 08 की बात है। इस फिल्म में एक खास किरदार निभा रहे कुनाल कुमार से मेरा उस वक्त ठीक-ठाक परिचय था। मैं सर्द रात में उनसे मिलने होटल पलाश पहुंचा। मेरे साथ सीरियल लेखक राज शांडिल्य भी थे। हम जब होटल पहुंचे, तो फिल्म के तमाम कलाकार रिसेप्शन हाल में रखे सोफे पर गपशप में व्यस्त थे। दिनभर की शूटिंग की थकावट उन सभी के चेहरे पर स्पष्ट देखी जा सकती थी। इस शांत माहौल में दो बच्चे खूब हुड़दंग मचा रहे थे। चूंकि होटल में किसी की शादी का रिसेप्शन चल रहा था, इसलिए लगा कि ये बच्चे वहां मेहमान होंगे। तभी राज 8-9 साल के एक लड़के को अपने समीप बुलाता है। बातचीत के दौरान मालूम चला कि वो छोरा चर्चित बाल कलाकार है। उसके साथ एक लड़की भी खेल रही थी, उसे परिचय हुआ, वह ईशिता थी। ईशिता से बतियाते हुए महसूस हुआ कि बच्ची वाकई कमाल की है।दरअसल, हर बच्चा जन्मजात नटखट होता है। उनकी बालसुलभ क्रीड़ाएं देखकर कोई भी आकलन नहीं कर सकता कि बच्चा कितना प्रतिभाशाली है। खेलती-कूदती ईशिता भी अन्य बच्चों की तरह की खूब हुड़दंग मचा रही थी, लेकिन जब उसको मैंने बतौर एक जर्नलिस्ट परिचय दिया, तो उसके हावभाव ही बदल गए। यूं लगा कि उस बच्ची में अचानक बड़ों-सी गंभीरता आ गई हो। पूरी बातचीत के दौरान उसने जिस अंदाज और नपे-तुले शब्दों का इस्तेमाल किया, वो किसी को भी कायल कर सकता था। इन दिनों ईशिता कलर पर प्रसारित उतरन में एक अमीर फैमिली की लड़की तपस्या का किरदार निभाते देखी जा सकती है।बहरहाल, ईशिता की प्रतिभा को प्रोत्साहित करने के लिए उसे www.indiantellyawards.com पर खूब वोट करें, यही कामना है।
अमिताभ बुधौलिया 'फरोग'

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2008


किसी से मत पूछो

कैसे हैं हालात देश के मत पूछो।
सभी हुए गद्दार किसी से मत पूछो।।
मिटता है मिट जाए वतन से क्या लेना।
सर्वोपरी है स्वार्थ किसी से मत पूछो।।
मरता है कोई भूख से हमको क्या लेना।
हम हों मालामाल किसी से मत पूछो।।
बच्चे थे मायूस, हे भगवन कौन सुने।
गायब था प्रसाद किसी से मत पूछो।।
न समझे हम ताकत अपनी यकीं करो...
क्या होगा अंजाम, किसी से मत पूछो॥
अमिताभ बुधौलिया 'फरोग'

मंगलवार, 18 नवंबर 2008

पहचान कौन

1
ऋषिदेव दंडित हुए, नायक दिया खदेड़।
नौजवान हैरान हैं, सहमे सभी अधेड़।।
सहमे सभी अधेड़, घात है अब भी जारी।
देख प्रताप मित्र का, सबने मानी हारी।।
किसे नहीं है नौकरी प्यारी...

2
10करोड़ का लक्ष्य जुटाने निकले सारे बॉस ।
मरो-खपो पर करो उगाही, मालिक ने दी है धौंस।।
मालिक ने दी है धौंस, बहुत हो गई मक्कारी।
इससे भला परचून का धंधा, आत्मा फिर धिक्कारी।।
पर, आराम की नौकरी किसे नहीं प्यारी...

3
हाथों में है कौशल फिर भी खिंचते रहते कान।
मिला दुबारा देश निकाला, आफत में है जान।।
आफत में है जान, अगर हो इज्जत प्यारी।
दूजी नौकरी ढूंढने की कर लो तैयारी।।
हुनरमंद हो, मत बनो भिखारी।।
(भोपाल संस्करण)
अमिताभ बुधौलिया 'फरोग'

गुरुवार, 13 नवंबर 2008

बाल दिवस

चक दे बच्चे...
ये बचपन ऊटपटांगा...
न डालें फटे में टांगा...
चक दे बच्चे
न भेदभाव, न झगड़ा...
न दुश्मन कोई तगड़ा...
चक दे बच्चे।
दिल में है उजियारा...
घर-संसार है सारा...
चक दे बच्चे।
न झूठ-कपट न पंगा...
न आपस में कोई दंगा...
चक दे बच्चे।
न सरहद का घेरा...
न गुटबाजी न डेरा...
चक दे बच्चे।
मन मैला न कुचैला...
न भरें लूट से थैला...
चक दे बच्चे।
बडे सभी हैं नंगे...
बस, मुन्ने सारे चंगे...
चक दे बच्चे।
ये भोले-भोले चेहरे...
समझें कोई पहरे..
चक दे बच्चे।
न कोई इनकी जाति...
सब इनके संगी-साथी...
चक दे बच्चे।
न धरम-करम की बातें...
न डरी-डरी-सी रातें...
चक दे बच्चे।
कोई इनसे सीखे जीना...
सो, झुके कभी न सीना...
चक दे बच्चे।
चक दे..चक दे..चक दे..चक दे...चक दे बच्चे।
अमिताभ फरोग

सोमवार, 10 नवंबर 2008

क्योंकि ये है बिग बॉस का घर

डायना ऐसी नहीं है...

अमिताभ बुधौलिया 'फरोग'
चूंकि बिग बॉस का घर एक खेल है, ऐसे में स्वाभाविक है कि घरवाले अपनी जीत के लिए तमाम हथकंडे अपनाएंगे। डायना को लेकर मोनिका और दूसरे अन्य लोगों की प्रतिक्रियाएँ सुनने के बाद संभव है कि दर्शकों के मन में इस पूर्व विश्व सुंदरी के प्रति कुछ नकारात्मक सोच जन्म ले, लेकिन ऐसी नहीं हैं डायना। वे बेशक अब बिग बॉस के घर से बाहर हो चुकी हैं, लेकिन यह जानकारी इसलिए देना जरूरी है, ताकि लोग उनके दूसरे अच्छे पहलुओं से अवगत हो सकें।
दरअसल, मुझे डायना के बारे में मशहूर माडल और फिल्म अभिनेता शाहवर अली ने बताया था। शाहवर भोपाल के रहने वाले हैं और मेरे बहुत अच्छे दोस्त हैं। डायना ने उनके साथ फिल्म अब बस की थी। पिछले साल जब वे भोपाल आई थीं, तब शाहवर ने उनकी खूबियों से अवगत कराया था। डायना हेडन ऐसी अकेली मिस वर्ल्ड हैं, जिन्होंने इस काम्पटिशन में खिताबों की हेट्रिक हासिल की थी। उन्हें 'मिस 1997' के अलावा 'मिस फोटोजेनिक' का खिताब भी दिया गया था। शाहवर के मुताबिक, वो जैसी दिखती हैं, वैसी हैं नहीं। आन स्क्रीन पर डायना बेहद माडर्न और थोडी रूड नजर आती हैं, लेकिन वास्तव में वे बेहद सिंपल और डाउन टू अर्थ हैं। उन्होंने बेहद स्ट्रगल किया है। वे सेल्फमेड हैं और आज उन्होंने जो मुकाम पाया है, उसके पीछे खूब सारी मेहनत छिपी हुई है। डायना की बोली और रहन-सहन जरूर इंग्लिश है, लेकिन दिल पूरी तरह हिंदुस्तानी है । वह बेहद ही सेंसेटिव और इमोशनल हैं। हां, एक बात उसकी पर्सनालिटी की जो मुझे सबसे अच्छी लगती है, वह है डायना का करेज। उसे किसी चीज से डर नहीं लगता। वह लाइफ के हर एक पल को इंज्वाय करती हैं।
शाहवर ने बताय था-अपनी खूबसूरती, अदाकारी और हंसमुख स्वभाव के लिए जानी जाने वालीं डायना के जीवन का एक सकारात्मक पक्ष और है-गरीबों के लिए उनका प्यार'। डायना हेडन ने लास एंजिल्स में गरीब और जरूरतमंद अमेरिकियों के लिए घर बनवाने की मुहिम शुरू की है। इसके लिए वे 'हैविट फार हयूमेनिटी चैरिटेबल आर्गेनाईजेशन' के साथ काम कर रही हैं। इसके अलावा वह अन्य चैरेटिबल ट्रस्ट से भी जुडी हैं।
अब बस नहीं:
शाहवर के मुताबिक, डायना ने फिल्मों से अलविदा नहीं कहा। हां, अब वह ज्यादातर समय लास एंजिल्स में रह रही हैं और हालीवुड फिल्मों से जुडने का प्लान कर रही हैं। फिल्म 'अब बस' की शूटिंग के दौरान के खट्टे-मीठे पलों को याद कर शाहवर बताते हैं- 'बैंकाक में शूटिंग के दौरान मैं वहां मनीष मल्होत्रा का फैशन शो करने चला गया था। डायना घूमने के लिए वहां के एक बीच पर चली गईं। इसी बीच उनका सारा सामान चोरी हो गया। इसमें उनका सारा पैसा, क्रेडिट कार्ड और बाकी सारे जरूरी कागजात भी शामिल थे। उस वक्त डायना मुझे पागलों की तरह ढूंढ रही थीं, और मुझे उनकी इस हालत पर हंसी भी आ रही थी।

शुक्रवार, 7 नवंबर 2008


बातों से नहीं होती बगावत कभी...
वक्त पल-पल बदलता है,
गिरगिट की तरह रंग बदलता है।
पैरों में नहीं होती ताकत उठाने की,
इंसान खुद-ब-खुद संभलता है।
कौन स्वार्थी नहीं इस दुनिया में...
कोई रिश्ते तो, कोई औकात बदलता है।
मां से महान नहीं है अगर कोई...
कृष्ण यशोदा के घर क्यों पलता है।
विवशता तो नाम है सिर्फ कहने की...
आस्तीन अपनी है, तो सांप क्यों पलता है।
बहुत ढूंढा हर तरफ एक बदनाम आदमी...
जो मिला, वही खुद को शरीफ समझता है।
परिवर्तन प्रकृति का नियम है, तो फिर...
सूर्य सदियों से पश्चिम में ही क्यों ढलता है।
बातों से नहीं होती बगावत कभी...
उठा पत्थर, खड़े-खड़े हाथ क्यों मलता है।
  • अमिताभ बुधौलिया 'फरोग'

बुधवार, 5 नवंबर 2008

क्या किसी पार्टी की ऐसी वेबसाइट देखी है?


हे माया! आह कहूं या वाह माया! ...

किसी राजनीतिक पार्टी की वेबसाइट पर आप किन चीजों की उम्मीद करते हैं! जाहिर है पार्टी एजेंडा, पार्टी के कार्य, पार्टी नेताओं का विवरण और लंबे चौडे वायदे, लेकिन बहुजन समाज पार्टी की वेबसाइट http://www.bahujansamajp.com/ देखकर एक बार तो आपको विश्वास ही नहीं होगा कि यह किसी राजनीतिक पार्टी की वेबसाइट है। इस वेबसाइट पर फिल्म और बोल्ड वालपेपर से लेकर हर तरह के गेम, मेट्रीमोनियल व नौकरी साइट्स और इसी से मिलता-जुलता हर तरह का मसाला मौजूद है। हालाँकि साफतौर से यह नहीं कहा जा सकता कि यह बसपा कि ऑफिशियल साईट है या किसी की शरारत।
वेबसाइट को खोलते ही इसके होम पेज दर्जन भर आप्शन नजर आते हैं। इसमें पार्टी संबंधित जानकारी तो कम ही नजर आती है, लेकिन इसका इंटरटेनमेंट सेक्शन काफी तगडा है। अंतिम बार इसी वर्ष 2 अगस्त को अपडेट हुई वेबसाइट पर गेम और वालपेपर्स की भरमार है। इसके इंटरटेनमेंट सेक्शन को क्लिक करते ही आपको गेम्स, पजल्स, कार्टून, स्टोरी, ई-ग्रिटिंग, हर किस्म के जोक्स आदि के आप्शन मिलते हैं।
बोल्ड व बिकनी फोटोग्राफ
होम पेज पर नीचे दी गई लिंक फोटो गैलरी पर क्लिक करते ही न्यूरी फोटोगैलरी की लिंक खुलती है। इसके प्रोग्राम में बोल्ड फोटो का आप्शन भी मौजूद है। यही नहीं इसके इंटरटेनमेंट सेक्शन को खोलते ही 42357 वालपेपर की लिस्ट आती है, जिसमें बडी मुश्किल से खोजने पर इक्का-दुक्का धार्मिक वालपेपर नजर आते हैं। इसके अलावा वालपेपर या तो नेशनल, इंटरनेशनल फिल्म स्टार और माडल्स के हैं या फिर लव-रोमांस के।
भाषा का फेर
होम पेज पर ही एनएमएल सेक्स न्यूज नाम की लिंक भी नजर आती है। इस आप्शन को देखकर आश्चर्य होता है। आप्शन को खोलने पर वीडियो की विंडो ओपन होती है, जो किसी की भी जिज्ञासा बढाने के लिए काफी है। हालांकि जब विंडो पूरी तरह ओपन होती है, तो इसमें एड्स और रेप केसेस से संबंधित नेशनल न्यूज नजर आती है, लेकिन वेबसाइट में इस तरह की भाषा का प्रयोग भी इस पर सवालिया निशान लगाता है। वेबसाइट में मसाला वेबसाइट खोलते ही सबसे ऊपर न्यूज और इसके बाद बीएसपी का आप्शन नजर आता है। पार्टी के बारे में जानने की इच्छा से यदि आप इस आप्शन पर क्लिक करते हैं, तो यह खाली नजर आता है। इसके नीचे मौजूद एडिटोरियल और कालमिस्ट आप्शन में डाटा शीघ्र अपडेट करने की सूचना मिलती है। यही नहीं होमपेज पर मायावती और काशीराम के भाषण का वीडियो आप्शन नजर आता है, लेकिन इसे क्लिक करने पर भी डाटा शीघ्र अपडेट करने की जानकारी मिलती है। हां, जैसे ही इंटरटेनमेंट आप्शन पर पहुंचते हैं यहां दुनिया भर का मसाला नजर आता है। इसके अलावा वेबसाइट से जुडी लिंक में एनएमएल सेक्स न्यूज, होरस्कोप, मेट्रीमोनियल वेबसाइट, नौकरी स्टार, सेल्स एंड परचेज, याहू एक्स, जनरेशन एक्स, जैसी लगभग 37 लिंक जुडी हैं।

सोमवार, 3 नवंबर 2008

महिला नेत्रियों ने उठाई एक ही सीट पर दो-तीन बार आरक्षण की मांग


आरक्षण कोटा, लगने लगा छोटा
पल्लवी वाघेला
आरक्षण के चलते पंचायत चुनावों में हाथ आजमा चुकी महिला नेत्रियों में अब एक नई चाह ने जन्म लिया है। वे मुखर होकर कहती हैं कि उन्हें दो से तीन बार एक ही सीट में महिला आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए। इसके पीछे उनका तर्क है कि घूंघट में पहली बार घर की दहलीज पार कर पंचायत का काम-काज समझने में ही वक्त निकल जाता है और जब वह काम शुरू करती हैं, तब तक उनका कार्यकाल ही खत्म हो जाता है। दूसरी बार आरक्षण न होने के कारण उन्हें चुनाव लडवाने कोई तैयार नहीं होता। इस तरह अधिकांश महिला प्रतिनिधियों का राजनैतिक सफर ठीक से शुरू होने के पहले ही खत्म हो जाता है। महिला प्रतिनिधियों की इस चाह ने एक नई बहस को जन्म दिया है, जिसका समर्थन केन्द्रीय पंचायत मंत्री मणीशंकर अय्यर भी कर रहे हैं।
पुरुष प्रधान समाज में आरक्षण के कारण मजबूरी में मिले अधिकार से चुन कर आई महिला प्रतिनिधि यह बात बेहद अच्छे से जानती थीं कि उनके इस सफर में दुश्वारियां कम नहीं। बावजूद उन्होंने खुद को बेहतर साबित किया है। फिलहाल देश में पंचायत, ब्लाक चुनाव में चुनी जाने वाली पंच-सरपंच, ब्लाक सदस्य और ब्लाक प्रमुखों की संख्या 10 लाख से अधिक है और यह विश्व की कुल चुनी जाने वाली महिलाओं की संख्या से ज्यादा बैठती है। लेकिन उनके साथ समस्या यह है कि उन्हें बिना आरक्षण यह मौका दिया ही नहीं जाता। यही वजह है कि वह खुद को साबित करने के लिए दो या तीन बार एक ही सीट पर आरक्षण की मांग उठा रही हैं। उनका यह प्रयास रंग भी ला रहा है और महिला आरक्षण की अवधि बढ़ाकर 10-15 साल करने पर कमोबेश सहमति बन गई है। केन्द्रीय पंचायती राज मंत्रालय द्वारा दर्जनभर से अधिक राज्यों की पंचायतों में महिला आरक्षित सीटों को एक बार से अधिक आरक्षित करने की तैयारी हो रही है। लेकिन यह कोई आसान काम नहीं है, क्योंकि इसके लिए फिर से संविधान में संशोधन करना पड़ेगा और राज्य सरकारों को इसके लिए तैयार करना पड़ेगा।
सर्वे का खुलासा
इस परिदृश्य में महिलाओं की स्थिति का आकलन करें तो अभी भी कई महिलाएं ऐसी हैं, जो पहली बार महिला आरक्षित सीट से लड़कर दूसरी बार सामान्य सीटों से जीत कर आई और अच्छा काम कर रही हैं। हालांकि इनकी संख्या अभी बेहद कम है, क्योंकि गांवों में मौजूद पुरुष प्रधान समाज इतनी आसानी से उनके नेतृत्व को स्वीकार नहीं कर रहा। हाल में पंचायती राज मंत्रालय द्वारा एक निजी संस्था की मदद से कराए गए सर्वे में भी यह सामने आया था कि देश से सिर्फ 15 प्रतिशत महिला प्रधान ही दोबारा चुनकर आती हैं। पुरुषों में यह प्रतिशत 37 के करीब है। सर्वे के दौरान 39 फीसदी पूर्व महिला प्रतिनिधियों ने माना कि वे चाहकर भी दोबारा चुनाव नहीं लड़ पाई, क्योंकि उनकी सीट महिला के लिए आरक्षित नहीं थी। सतना जिले की ग्राम पंचायत करमई की ऊषा साकेत कहती हैं-पहले आरक्षण के कारण मुझे लड़वाया गया, जब मैंने गांव के विकास के लिए दबंगों का विरोध किया तो मेरे साथ मार-पीट हुई, लेकिन मैंने हार नहीं मानी। दूसरी बार विरोध के बाद भी लड़ी, जीत मुश्किल थी, लेकिन हालात ऐसे बने कि जीत मेरी हुई। हमें पहला मौका तो मजबूरी में ही मिलता है, इसलिए इस मजबूरी का समय लंबा होना चाहिए ताकि हम व्यवस्था और अपनी ताकत को जांच पाए और उसे साबित कर सकें। ऊषा को दूसरा मौका मिला है और वह पहले से अच्छा काम कर रही हैं। हरदा जिले के खिरकिया ब्लाक की सरपंच धापूबाई भी इसी तरह के एक मौके की तलाश में है। वे कहती हैं-पहले सरकारी कामकाज के बारे में नासमझ थी, अब सबकुछ पता है और काम करने का मन भी है, लेकिन समय नहीं। दरअसल पंचायतों में महिला प्रतिनिधियों के संदर्भ में अक्सर दो तरह की बातें की जाती हैं या तो उन्हें सरपंचपति के हाथों की कठपुतली माना जाता है या फिर खूब नेतागिरी चढ़ी है जैसी उलाहना दी जाती है। भांडेर (जिला दतिया) की जनपद सदस्य प्रतिभा शर्मा कहती हैं-महिलाओं से चमत्कार की उम्मीद की जाती है। यदि वह किसी काम में असफल हो जाएं, तो इसका दोष उसका महिला होना माना जाता है, जबकि जरूरी नहीं पुरूष उस काम में सफल ही हों। जब लंबे समय तक सारा काम हमारे नाम से चलेगा तब खुद-ब-खुद गांववालों और अधिकारियों को हमारी ताकत और काम करने की क्षमता का पता चल जाएगा। इस तरह की लाखों महिला प्रतिनिधि राजनीति की पथरीली जमीन पर पत्थर तोड़ रही हैं। दरअसल भ्रष्टाचार, पुरुष सत्ता के चौतरफा दबाव के बावजूद राजनीति दखल का अंकुर जन्म ले चुका है और अब वह एक सीट पर दोबारा आरक्षण की शक्ल में स्थायित्व की मांग भी कर रहा है।
कई हैं सफल उदाहरण
महिला नेत्रियों के सफल कामकाज के कई उदाहरण हैं। इनमें वह महिलाएं भी शामिल हैं, जो बिना आरक्षण दूसरी बार चुन कर आई हैं। वे यह भी मानती हैं कि दूसरे कार्यकाल में इन्हें काम करने में अधिक आसानी हुई और यह अधिक बेहतर काम कर पाई। मप्र के पिछड़े इलाके अलीराजपुर के ग्राम खेरवड़ की सरपंच राधा रावत ने इस इलाके की तस्वीर बदलने में सार्थक भूमिका निभाई है। अब तक इस इलाके को अपराधिक प्रवृत्ति के लिए ही जाना जाता था, लेकिन अब यह ग्राम विवादहीन पंचायत का पुरस्कार हासिल कर चुका है। सरपंच राधा शिक्षित हैं और इसका उन्हें खूब लाभ मिला है। इस पंचायत में 8 स्कूल हैं और गांव की लड़कियां भी शिक्षा पा रही हैं। वहीं रोजगार की तलाश में होने वाले पलायन का प्रतिशत भी कम हुआ है। इन दिनों राधा इस क्षेत्र में स्वास्थ्य केन्द्र की मांग के लिए लड़ रही हैं और उन्हें सफलता की पूरी उम्मीद है। राधा कहती हैं-मैं नहीं चाहती कि कोई गर्भवती महिला इलाज के अभाव में दम तोड़े, कोई बीमार बच्चा इलाज न पा सके। जो भी काम पिछले कार्यकाल में नहीं कर पाई थी, अब वह सब जल्दी-जल्दी हो रहे हैं। सिवनी जिले की ग्राम पंचायत चमारीखुर्द की सरपंच राधाबाई भलावी तो अपने ही परिवार के लोगों को टक्कर देकर दूसरी बार भी विजेता चुन कर आई। वह कहती हैं-पहला कार्यकाल खुद समझने और लोगों को समझाने में बीता, इसलिए इस बार पूरा ध्यान गांव की सुविधाओं पर दिया है।
केन्द्रीय पंचायत मंत्री मणिशंकर अय्यर कहते हैं-'महिलाओं की यह मांग जोर पकड रही है और जायज भी है। सीट एक से अधिक बार आरक्षित होने पर महिलाएं मुखर होकर अपने क्षेत्र की तस्वीर बदल पाएंगी। मुझे लगता है घर की चारदीवारी से निकल दुनिया और पंचायत के काम-काज को समझने के लिए उन्हें ज्यादा समय की जरूरत होती है, जो उन्हें मिलना चाहिए।'
( यह रपट दैनिक जागरण के भोपाल संस्करण में प्रकाशित हुई है। देवी अहिल्याबाई यूनिवर्सिटी, इंदौर से पत्रकारिता की डिग्री लेने वालीं पल्लवी इन दिनों संवाद फेलोशिप के तहत पंचायतीराज में महिला जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर काम कर रही हैं)

शुक्रवार, 31 अक्तूबर 2008


ये किसने लगाई आग...
ये किसने लगाई आग, कोई तो बताए।
जो सच्चा है मजहबी, वो सामने आए।।
आग उगलता हूं, मेरा धर्म यही है।
जो देता न हो हवा, वो सामने आए।।
फूंकता हूं, बस्तियां मेरा कर्म यही है।
जो कहे-मैं हूं नापाक, वो सामने आए।।
बकता हूं गालियां मैं सरेआम-सरेराह।
जो हो कोई मर्यादित, वो सामने आए।।
ईद मनाता हूं, मैं मुसलमान नहीं हूं।
जो भी हो शर्मसार वो सामने आए।।
हिंदू हूँ-मुसलमान हूँ, गर्व से कहो।
साचा हो जो इंसान, वो सामने आए॥
अमिताभ बुधौलिया 'फरोग'

सोमवार, 27 अक्तूबर 2008

ऐसा दीप जलाइए...

दो आंगन के बीच में न बने कभी दीवार...
मन मैला न तेरा-मेरा, निर्मल रहें विचार।।
सबकी झोली में खुशियां हों, ऐसी सोच जगाइए...
मिटा सके जो हर अंधियारा , ऐसा दीप जलाइए।।
दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं

अमिताभ बुधौलिया 'फरोग'

शनिवार, 25 अक्तूबर 2008

ग़ज़ल

मत पूछिए हाल शहर का...
जैसे इन्तजार हो कहर का।

खून पीकर मुसंडे हो रहे हैं खटमल...
असर नहीं होता उन पर जहर का।

ठूंठों के बीच खड़े हैं बिजूका...
सूखा पड़ा है कंठ नहर का।

कब चल जायें छुरियां पता नहीं...
उजड्ड है मूड चुनावी लहर का।

कत्ल हुई इंसानियत बीच चौराहे पर...
सड़कें सुनसान थीं, वक्त था दोपहर का।
अमिताभ बुधौलिया 'फरोग'

गुरुवार, 16 अक्तूबर 2008

पुरस्कारों का सच!

क्यों दिए जाते हैं पुरस्कार?

इक्के-दुक्के पुरस्कारों को छोड़ दिया जाए, तो शायद ही कोई पुरस्कृत व्यक्ति दूध का धुला निकला हो। पुरस्कृत होना भी एक कला है,...और इसमें वही माहिर होता है, जो सत्ताई मठ में कुंडली मारकर बैठे धीशों को सदैव खुश रखने का हुनर रखता हो। पुरस्कारों के पीछे का सच सब जानते-समझते हैं, लेकिन कौन मुंह खोलेगा? खासकर तब, जब सब एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हों! बहरहाल, ब्लाग की दुनिया घूमते-घामते मेरी दृष्टि ब्लॉग निर्मल आनंद पर पड़ी । यह ब्लाग अभय तिवारी संचालित करते हैं। अभयजी के बारे में पढ़ने के बाद इतना जान सका हूं कि वे इन दिनों मुंबई में रहकर फिल्म और टेलीविजन दोनों में अपने बहुआयामी व्यक्तित्व का प्रभाव छोड़ रहे हैं। बहरहाल, उन्होंने अरविंद अडिगा के पहले उपन्यास द व्हाइट टाइगर को मैन बुकर प्राइज मिलने पर घोर आश्चर्य व्यक्त किया है। देश-दुनिया के लोग पुरस्कारों के पीछे की कहानी जान सकें, इस मकसद से उनका वैचारिक कम विश्लेषणात्मक लेख हम गिद्द पर प्रकाशित कर रहे हैं...
अरविन्द अडिगा की पहले उपन्यास दि व्हाईट टाइगर को बुकर प्राईज़ मिल गया है। उनके नामाकंन मैं इतना हैरान नहीं हुआ था, मगर उनकी इस जीत के बाद मैं वाक़ई हतप्रभ रह गया। दुनिया भर में पुरस्कार एक निश्चित राजनीति के तहत दिए जाते हैं, इस तथ्य से मैं अनजान नहीं रहा हूँ मगर आप सब की तरह कहीं न कहीं मेरे भीतर भी एक सहज-विश्वासी मानुस जीवित है जो चीज़ों की सतही सच्चाई पर यकी़न करके ज़िन्दगी से गुज़रते हैं।अरविन्द अडिगा के साथ अमिताव घोष के साथ की किताब सी ऑफ़ पॉपीज़ भी नामांकित थी, मैंने वो किताब नहीं पढ़ी है, पर अमिताव घोष की पिछली किताबों के आधार पर यह मेरा आकलन है कि सी ऑफ़ पॉपीज़ कितनी भी बुरी हो दि व्हाईट टाइगर से बेहतर होगी। पर मुद्दा यहाँ दो किताबों की तुलना नहीं है, मुद्दा दि व्हाईट टाईगर की अपनी गुणवत्ता है।लगभग तीन-चार मास पहले एच टी में एक रिव्यू पढ़ने के बाद मैं इस किताब को दो दुकानों में खोजने और तीसरे में पाने के बाद हासिल किया और पढ़ने लगा। कहानी की ज़मीन बेहद आकर्षक है; बलराम नाम का एक भारतीय चीन के प्रधानमंत्री को लिखे गए पत्रों में अपने जीवन और उसके निचोड़ों की कथा कह रहा है। बलराम की खासियत यह है कि वो एक रिक्शेवाले का बेटा है और एक बड़े ज़मीन्दार के बेटे का ड्राईवर है जिसे मारकर वो अपने सफल जीवन की नीँव रखता है।अडिगा तहलका में लिखे अपने लेख में बताते हैं कि कैसे कलकत्ता के रिक्शेवालो से कुछ दिन बात-चीत कर के उन्हे अपने फँसे हुए उपन्यास का उद्धार करने की प्रेरणा मिली। यह पूरा डिज़ाइन पश्चिम में बैठे उन उपभोक्ताओं के लिए ज़रूर कारगर और आकर्षक होगा जो भारत की साँपों, राजपूतों और राज वाली छवि से ऊब चुके हैं और भारत में अमीर और ग़रीब के बीच फैलते हुए अन्तराल में रुचि दिखा रहे हैं।मगर मेरे लिए इस किताब को पढ़ना इतना उबाऊ अनुभव रहा कि पचासेक पन्ने के बाद मैं अपने आप से सवाल करने लगा कि मैं ऐसे वाहियात किताब पर क्यों अपना समय नष्ट कर रहा हूँ, जिसे कु़छ वैसे ही चालाकी से लिखा गया है जैसे मैं कभी टीवी सीरियल लिखा करता था। जो मुझे मेरे भारत के बारे में जो कुछ बताती है वो मुझे उस विवरण से कहीं बेहतर मालूम है। और जिन चरित्रों के जरिये बताती है वो न तो सहानुभूति करने योग्य बनाए गए हैं और न ही किसी मानवीय तरलता में डूब के बनाए गए हैं। मुझे अफ़सोस है कि मैं एक उपन्यास से कहीं अधिक उम्मीद करता हूँ।मैं नहीं जानता कि अडिगा को बुकर पुरस्कार दिए जाने के पीछे क्या मानक रहे होंगे? मैं जान भी कैसे सकता हूँ.. पश्चिम के नज़रिये से भारतीय सच्चाई को देखने की तरकीब कुछ और ही होती है? तभी तो ग्यारह बार नामांकित होने के बाद भी नेहरू को कभी नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिला; गाँधी जी की तो बात छोड़ ही दीजिये। लेकिन कलकत्ता के पेगन नरक में बीमारों की सुश्रूषा करने वाली एक नन, मदर टेरेसा को शांति पुरस्कार के योग्य माना गया।

मंगलवार, 14 अक्तूबर 2008

क्योंकि ये है बिग बॉस का घर!

क्या है मोनिका के दिल में?

अमिताभ फरोग
रियलिटी शो की टीआरपी विवादों पर निर्भर करती है। यह पहला मौका नहीं है, जब कलर्स चैनल के चर्चित शो बिग बॉस को लेकर देशभर से प्रतिक्रियाएं आई हैं। इससे पहले भी बिग बॉस राखी सावंत की उलूल-जुलूल हरकतों के कारण आलोचना का शिकार बना था। आलोचनाएं और विवाद कार्यक्रम निर्माताओं के लिए मुनाफे का सौदा होते हैं। येन-केन प्रकारेण रियलिटी शो को विवादों में बनाए रखने स्क्रिप्ट तक लिखी जाती हैं। यह निश्चय ही आश्चर्य की बात है कि दो-तीन महीने में ही कलर्स चैनल की टीआरपी जबर्दस्त हो गई है। प्राइम टाइम के दौरान तो जैसे दूसरे चैनल गौण-से साबित हुए हैं।
बहरहाल, यहां मुद्दा बिग बॉस के विवादों में आने का है। समूचा विवाद राहुल, मोनिका, पाय रोहतगी और कुछ हद तक संभावना सेठ के इर्द-गिर्द ही घूमता देखा जा सकता है। संभावना सेठ उतनी प्रतिभाशाली कभी नहीं रहीं, जितना वो जताती हैं। बिग बॉस के घर में पायल रोहतगी, राहुल महाजन, सैयद जुल्फी, केतकी दवे जैसी चर्चित हस्तियों के बीच रहते हुए वे सदैव कुंठाओं में जीती रहीं। शायद यही वजह रही उन्होंने 50 लाख रुपए के मोह में सारे आचारिक और वैचारिक बंधन तोड़ डाले। पिछले साल जब संभावना पहली बार रीमिक्स म्यूजिक वीडियो आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे में अपने अनाकर्षक तन की नुमाइश करती नजर आईं, तो फिल्म पंडितों ने उन्हें बॉलीवुड की नई सेक्स बम तक कह डाला था।...और जब वे सुभाष घई कृत 36 चाइना टाउन में उपेन पटेल के संग आशिकी में तेरी...गीत पर ठुमके लगाती देखी गईं, तो उनकी तुलना मल्लिका शेहरावत से तक कर दी गई। यह दीगर बात है कि अगर संभावना बिग बॉस के घर की मेहमान न बनतीं, तो शायद उन्हें मुट्ठीभर से ज्यादा लोग नहीं जान पाते। संभावना छोटे कद के बड़े स्टार राजपाल यादव की अंडरट्राइल में भी मौजूद थीं, लेकिन यह फिल्म भी संभावना को आइटम डांसर की छवि से छुटकारा नहीं दिला सकी। संभावना ने भोजपुरी फिल्मों में भी खूब ठुमके लगाए हैं। जाहिर है कि बिग बॉस के घर में आने का उनका मकसद एकदम स्पष्ट था कि वे घर-घर पहचानी जाएं और उनकी ब्रांड वैल्यू में कुछ हद तक ईजाफा हो। यह कड़वा सच है कि जब कुछ लोग स्वार्थ और लालचवश एक जगह इकट्ठा होते हैं, तो शनैः-शनैः उनके होंठों पर खेलती मुस्कान व्यंग्यात्मक और उपहासमयी होती चली जाती है। रियलिटी शो बिग बॉस भी इसी परिपाटी से बंधा हुआ है। यहां भी माया का जाल घर में फूट डाल रहा है। निश्चय है कि यह खेल इस घर के ज्यादातर लोगों के भीतर एक-दूसरे के प्रति कड़वाहट भर देगा...और यह भी संभव है कि शो की समाप्ति पर ये एक-दूसरे का मुंह तक देखना पसंद न करें!
यहां यह प्रश्न भी उठना बाजिव है कि जब भी कोई सदस्य घर से बेघर होता है, तो शुक्रवार को शिल्पा शेट्टी उसे विदा करती हैं और शनिवार को पूजा बेदी विशेष साक्षात्कार के तहत उसके अनुभव शेयर करती हैं, लेकिन संभावना सेठ की सूखी विदाई हुई, क्यों? आखिर ऐसी क्या वजह रही कि संभावना को इस सम्मान का हकदार नहीं समझा गया?
उधर, पायल, राहुल और मोनिका का त्रिकोणीय प्रेम प्रसंग भी नए मोड़ पर आ गया है। यह भी संभव था कि अगर राहुल और पायल बिग बॉस के घर में न आते तो उनके रिश्ते मधुर बने रहते। मोनिका की घर से विदाई और फिर वापसी राहुल के चाल-चरित्र की त्रुटियों को उभार दिया है। जिस मकसद को लेकर राहुल बिग बॉस के मेहमान बने थे, वे उससे भटक चुके हैं। राहुल का बिग बॉस के घर आना महाजन परिवार के लिए निश्चय ही दुःखद साबित होगा। भाजपा के कद्दावर नेता दिवंगत प्रमोद महाजन के लिए इससे बडी विडंबना और क्या होगी, कि उनकी सांसें उनके भाई ने छीनीं और बेटा टेलीविजन पर उनकी इज्जत की छीछालेदर करा रहा है। 3 मई, 2006 को प्रमोद महाजन ने इस दुनिया को अलविदा बोला था, उसके ठीक एक महीने बाद यानी 3 जून, 2006 को राहुल कोकीन को ओवरडोज के चलते अस्पताल में भर्ती कराए गए थे। संभव है कि राहुल की हरकतों से प्रमोद भली-भांति वाकिफ रहे हों, लेकिन एक जननायक के लिए अपने बेटे की करतूत छिपाना मजबूरी होती है, खासकर तब, जब विरोधी पार्टी चौकन्नी होकर उसकी हर हरकत पर नजर रख रही हो। प्रमोद की मुस्कराहट के पीछे का दर्द शायद किसी को नजर नहीं आया। क्योंकि क्या यह संभव है कि किसी पिता का बेटा कोकीन जैसे घातक नशे का आदी हो और उसे पता तक न चले? प्रमोद महाजन भाजपा के नींव के पत्थर थे, लेकिन यह अंदर से कितना कमजोर रहा होगा, इसे कभी नहीं समझा जा सकेगा।
राहुल का चाल-चरित्र शायद ही कभी ठीक-ठाक रहा हो, क्योंकि बिग बॉस के घर में वे जैसा बर्ताव कर रहे हैं, वह दो-चार दिन में तो कभी नहीं पनप सकता। विशेषकर तब, जब राहुल को पता है कि उनकी हर हरकत टेलीविजन के माध्यम से घर-घर दिखाई जा रही है। यकीनन अगर राहुल के परिजन उनसे संपर्क कर पाते, तो वे उन्हें फौरन वापस बुला लेते, लेकिन शो की शर्तों और नियम के चलते ऐसा संभव नहीं है। राहुल कितने बडे दिलफेंक हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि श्वेता सिंह से उनका ब्याह दो-ढाई साल में ही टूट गया। 29 अगस्त, 2006 को राहुल की शादी हुई थी। ऐसा कहा जा रहा था कि राहुल और श्वेता एक-दूसरे को करीब 13 साल से जानते हैं। बचपन के इस प्यार में दरार क्यों आई, बिग बॉस देखकर स्पष्ट हो जाता है। पायल रोहतगी राहुल को प्यार करती थीं, उनकी आंखें इसे कभी छिपा नहीं पाईं। राहुल भी इस सच को कभी ठुकरा नहीं पाए। इसी पहली अगस्त को राहुल और श्वेता के बीच तलाक हुआ है। संभावना जताई जा रही थी कि इस शो से निकलने के बाद राहुल और पायल शादी कर लेते, लेकिन मोनिका इस रिश्ते में आड़े आ गईं। हालांकि यह जगजाहिर हो चुका है कि राहुल के दिल में अब पायल के बजाय मोनिका बसेरा कर चुकी हैं, लेकिन क्या यह प्यार परवान चढेगा, इसे लेकर भी किसी को कोई भरोसा नहीं है। इस अविश्वास की वजहें स्प्ष्ट हैं। अब सवाल यह उठता है कि जब मोनिका को मालूम है कि राहुल दिलफेंक आशिक हैं, तो फिर उन्होंने राहुल को नॉमिनेट क्यों नहीं किया?
एक कहावत है-चोर चोरी से जाए, हेराफेरी से नहीं! यह कहावत मोनिक पर सटीक बैठती है। दरअसल, हाल में अबू सलेम ने मोनिका को नोटिस भेजा है। मोनिका सलेम की ब्याहता हैं या नहीं, इसे लेकर संशय हो सकता है, लेकिन प्रेमी युगल रहे हैं, यह जगजाहिर है। संभव है कि अब मोनिका सलेम से अपना पिंड छुडाना चाहती हों और राहुल जैसा ऊंची पहुंच वाला लड़का दूसरा उन्हें कोई नजर नहीं आया हो? संविधान में भले ही अपने स्वार्थ के लिए किसी मूर्ख की भावनाओं का फायदा उठाना गुनाह न हो, लेकिन सामाजिक तौर पर यह निंदनीय है। शायद मोनिका इस योजना के तहत राहुल को झेल रही हों?

गुरुवार, 9 अक्तूबर 2008

तो फिर क्यों न बने अफजल आतंकवादियों का आदर्श!

भगतसिंह देशभक्त और गुरु गद्दार!'

अमिताभ बुधौलिया 'फरोग'

जब आतंकवादियों की तुलना भगतसिंह जैसे देशभक्तों से होगी, तो सिमी जैसे संगठन सिर उठाएंगे ही?' पिछले दिनों देशभर में हुए बम धमाके आतंकवादियों के बढ़ते हौसले की ओर इंगित करते हैं। दरअसल, लोगों में भय बैठने की सबसे बड़ी वजह आतंकवादियों को 'तथाकथित भारतवासियों' से शह मिलना है। 13 दिसंबर, 2001 में भारतीय संसद भवन पर हुए हमले के मुख्य आरोपी अफजल गुरु के बचाव में आंदोलन छेडऩा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। गुरु के फेवर में एक बड़ी लॉबी ने मुहिम चला रखी है। 20 अक्टूबर,2006 को सुबह 6 बजे अफजल को फांसी दी जानी थी, लेकिन भारतीय लोकतंत्र का दुर्भाग्य गुरु जिंदा है और अब वह आतंकवादियों का आदर्श बन गया है।
अफजल गुरु के फेवर में 'साइबर वार' ने स्पष्ट कर दिया है कि गद्दार कहीं और नहीं, हमारे बीच ही मौजूद हैं। गुरु के फेवर में कूदे संगठन वेबसाईटस की हेल्प से दुनियाभर में समर्थन जुटाने में लगे हुए हैं। एक 'वेब फोरम' में लोगों ने अपने व्यूज देते हुए लिखा है कि गुरु और भगत सिंह की मुहिम एक सरीखी थी, फिर एक फ्रीडम फाइटर और दूसरा आतंकवादी कैसे हो सकता है?
June 21st, 2007 at 8:18 pm Nisar Deen said:
You have our full support for Afzal, hope and pray that the British govt will be able to help।
सिर्फ एक उदाहरण है, जिसे 'इस्लामिक ह्यूमन राइट मिशन' की वेबसाइट ihrc.org.uk पर पढ़ा जा सकता है। यह एक एनजीओ है, जिसका हेड आफिस वेम्बले(लंदन) में है। 1997 में शुरू हुआ यह एनजीओ मानवाधिकार खासकर 'पुलिस कस्टडी' से संबंधित मामलों में हस्तक्षेप करता है। saveafzalguru.org और justiceforafzalguru.org वेबसाइट भी मानवाधिकार की दुहाई देते हुए गुरु के फेवर में समर्थन हासिल करने की मुहिम छेड़े हुए हैं। justiceforafzalguru.org वेबसाइट के पीछे तीन संगठन काम कर रहे हैं, जिनके मुखिया तीन अलग-अलग देशों में बैठे हुए हैं। इंडिया सॉलिडरिटी ग्रुप आयरलैंड, चिराग फॉर हयूमन राइट अमेरिका जबकि एकता(कमेटी फार कम्युनल एमिटी) मुंबई(इंडिया) से संचालित हो रहा है। इस वेबसाइट पर अफजल और उसकी पत्नी की चिट्ठी के अलावा विभिन्न बुद्धिजीवियों के कथन पढ़े जा सकते हैं। इनमें प्रसिद्ध वकील राम जेठमलानी और लेखिका अरुंधति राय जैसी शख्सियतों के लेख/ साक्षात्कार भी शामिल किए गए हैं। अफजल के फेवर में ऑनलाइन पिटीशन दाखिल करने की विश्वव्यापी अपील की गई है। इन वेबसाइटस पर बकायदा फार्मेट दिए गए हैं, जिन्हें सिर्फ फिल करना है। वहीं भारत के राष्ट्रपति का फैक्स नंबर आदि गाइडलाइन दी गई है। जो संगठन गुरु के फेवर में कैम्पेन संचालित कर रहे हैं, उनसे जुड़े कर्ताधर्ताओं के ईमेल, फोन और पते भी वेबसाइट पर दिए गए हैं। इसे petitiononline.com से लिंक किया गया है। कश्मीर की तमाम वेबसाइट्स में अफजल को 'फ्रीडम फाइटर' जैसी श्रेणी में शामिल किया गया है। इन लोगों ने एक नई बहस को जन्म दिया है-'अफजल आतंकवादी या फ्रीडम फाइटर, कौन करेगा तय?'इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा कि गुरु के सपोर्ट में गुलाब नबी आजाद, कम्युनिस्ट और वहां के तमाम ग्रुप अभियान चलाए हुए हैं। जम्मू एंड कश्मीर कोलिएशन आफ सिविल सोसायटी(जेकेसीसीएस) भी हस्ताक्षर अभियान छेड़े हुए है। बहरहाल, सच तो यह है कि इस देश के लिए संकट जितने आतंकवादी नहीं, उससे कहीं ज्यादा आस्तीन के सांप हैं।

बुधवार, 8 अक्तूबर 2008

प्ले 'मोहब्बत द ताज' की कहानी

वाह ताज!

(गौरव गौतम ने यह लेख विशेषतौर पर गिद्ध के लिए लिखा है। भोपाल के रहने वाले गौरव अंतरराष्ट्रीय ताज महोत्सव के तहत तैयार हुए संभवतः दुनिया के सबसे महंगे प्ले 'मोहब्बत द ताज' में जय सिंह का किरदार निभा रहे हैं। प्ले का निर्देशन कर रहे हैं मशहूर फ़िल्मकार मोहन सिंह राठोर। इसे लिखा है फ़िल्म लेखक और गीतकार जलीश शरवानी ने)
हर कलाकार की ख्वाहिश होती है कि वो अपने कर्मक्षेत्र में कुछ हटकर कर गुजरे। इसे मेरी किस्मत भी कह सकते हैं कि मुझे दुनिया के संभवतः सबसे महंगे प्ले 'मोहब्बत द ताज' का हिस्सा बनने का सौभाग्य नसीब हुआ। वाकई मेरे लिए यह ग्रेट अचीवमेंट है। मैं कितना खुश हूं, इसकी अभिव्यक्ति शब्दों से नहीं की जा सकती। मैं अभी बहुत छोटा हूं, लेकिन जिन बड़ी शख्सियतों के साथ मुझे काम करने, सीखने और अपना हुनर माजने का मौका मिला है, इसके लिए मैं ईश्वर के अलावा अपने परिजनों, मित्रों और इस प्ले से जुड़े लोगों का ताउम्र शुक्रगुजार रहूंगा।
यह प्ले इन दिनों अजूबे ताजमहल की स्थली आगरा में नियमित खेला जा रहा है। हमारा ड्रामा न सिर्फ पूरे हिंदुस्तान, बल्कि बाकी छह अजूबों के देशों में भी मंचित होगा। इसके लिए विश्व की दस विभिन्न भाषाओं में 6 माह रिहर्सल की है। मैं इसमें राजा जयसिंह का किरदार निभा रहा हूं । पूरे प्ले में यह एक मात्र हिंदू कैरेक्टर है। यह दुनिया का पहला ऐसा थिएटर प्ले है, जिसके लिए 80 करोड़ रुपए का प्रोजेक्ट रखा गया। इस एक घंटे 20 मिनट के प्ले का मुख्य आकर्षण ताजमहल की प्रतिकृति है। लगभग 4 करोड़ की लागत वाली इस प्रतिकृति को तैयार करने के लिए राजस्थान स्थित मकराना से विशेषतौर पर संगमरमर मंगवाया गया था। इसे बनाने में दस साल का समय लगा है। विश्व में जहां-जहां भी यह प्ले होगा, ताज की इस प्रतिकृति को वहां ले जाया जाएगा।
देश में पहली बार किसी प्ले में हाई लेजर और हाइड्रोलिक बैकड्राप स्क्रीन का इस्तेमाल किया जा रहा है। बहती यमुना नदी की प्रतिकृति से धीरे-धीरे निकलता ताजमहल देखने वालों को अपने पहले ही दृश्य में रोमांचित कर देगा। एक तरह से यह विश्व में थिएटर के रसिकों के लिए लाइव ताज को देखने का अनोखा अनुभव होगा। इस प्ले में गीत भी शुमार है, जिसे अपनी आवाज से सजाया है अलका याग्निक, उदित नारायण, सुरेश वाडेकर, कविता कृष्णमूर्ति और कुमार सानू ने। गीत लिखा है जाने-माने फ़िल्म गीतकार सुधाकर शर्मा ने। प्ले के कलाकारों में नए उभरते कलाकारों के साथ नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा के सीनियर आर्टिस्ट भी शामिल हैं।
इस अनोखे प्ले की मुमताज़ बनी हैं इंदौर की 21 वर्षीया संचिता चौधरी। संचिता ने हाल एक म्यूजिक एल्बम किया है 'बदरा'। इसमें आवाज़ दी है "रब्बी' ने। संचिता ने फिल्म 'सिंह इस किंग' में सुधांशु शर्मा की गर्ल फ्रेंड का किरदार निभाया है। इन्होंने एक हॉलीवुड फिल्म भी की है, जिसका नाम 'स्लम डॉग मिल्लिईर' है। संचिता को लाइट म्यूजिक सुनना बहुत पसंद है। ये कत्थक की बेहतर कलाकार भी हैं।
मैं और मेरा बचपन
मैं बचपन से ही रामानंद सागरजी के सीरियल रामायण, अलिफ-लैला, हातिमताई आदि से बहुत प्रभावित रहा हूं। मैं इनके किरदारों में खुद की छवि देखा करता था। भगवान ने मेरी इच्छा पूरी की और मैं आज 'सागर प्रोडक्शन' का एक अभिन्न हिस्सा हूं। सबसे पहला मौका मुझे स्टार प्लस के सीरियल 'लकी' में मिला था। इसमें मैं जादूगर बना था। सच कहूं, तो मुझे 'स्टार' बनाने में 'स्टार प्लस चैनल' की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसी चैनल के 'पृथ्वीराज' और 'साईं बाबा' सीरियल में भी मुझे काम करने का मौका मिला था।
मैं 6वीं क्लास से थिऐटर कर रहा हूं, जब मैं भोपाल के कैम्ब्रिज स्कूल में पढता था। वार्षिकोत्सव के दौरान खुद के निर्देशन में महाराजा शिवाजी पर केंद्रित एक नाटक खेला था। इसमें मैं ही शिवाजी बना था। नाटक सबको खूब पसंद आया। पापा ने प्रोत्साहित किया और मैं ’जवाहरबाल भवन‘ से जुड़ गया। यहां बाल रंगकर्म के लिए ख्यात केजी त्रिवेदी के सानिध्य में 'समर कैम्प' के दौरान थिऐटर की बारीकियां सीखीं। वे मेरे गुरु हैं। बहरहाल, मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि 'मोहब्बत द ताज' मेरे लिए किसी ताज से कम नहीं है।

शनिवार, 4 अक्तूबर 2008

आजमगढ़ की रोजा

अमिताभ बुधौलिया 'फरोग'

आजमगढ़ इन दिनों सुर्खियों में है, आतंकवाद की वजह से। निःसंदेह यह कलंक उन लोगों को ठेस ही पहुंचाता होगा, जिनकी पैदाइश आजमगढ़ में हुई है...और जिन्होंने विविध क्षेत्रों में खासी पहचान स्थापित की है। ईद के ठीक एक दिन पहले सीमा मलिक का फोन आता है। उन्होंने ईद के दिन मुझे अपने घर पर आमंत्रित किया था। भोपाल की रहने वाली सीमा चर्चित और प्रतिभाशाली अभिनेत्री हैं। हाल में रिलीज 'ए वेन्ज्डे' में उन्होंने छोटा, किंतु प्रभावी किरदार निभाया है। सहारा वन पर प्रसारित सीरियल 'माता की चौकी' में भी वे अभिनय कर रही हैं। वे कुछ बड़े बैनरों की फिल्में भी कर रही हैं।
सीमा के बारे में इतना कुछ बताने का मकसद सिर्फ इतना है कि लोग जाने कि अभिनेत्रियों को अभिनय के अलावा घर-परिवार की जिम्मेदारी भी संभालनी पड़ती है। खैर, ईद के दिन दोपहर के वक्त हम उनके घर पहुंचते हैं। मेरा सीमा के पिताजी से एक दिली रिश्ता है। उनका अपनापन और बातचीत के सलीके ने मुझे खासा प्रभावित किया है। सीमा, उनकी मम्मी और पापा की मेहमाननवाजी वाकई लाजवाब है। सीमा ईद के ठीक एक दिन पहले ही भोपाल पहुंचीं थीं, वाबजूद उन्होंने स्वयं अपने हाथों से दही बड़े, सिवइयां, छोले तैयार किए। सचमुच पहली बार लगा कि सीमा जितनी अच्छी अभिनेत्री हैं, उतनी ही संस्कारित लड़की भी। उनके बनाए गए व्यंजन बेहद स्वादिष्ट थे।
बहरहाल, मैं वापस आजमगढ़ की बात पर आता हूं। देशभर में आतंकी घटनाओं के बाद आजमगढ़ का नाम सुनते ही कान खड़े हो उठते हैं। सीमा के साथ मुंबई से उनकी हम उम्र सहेली रोजा भी आई हुई थीं। सीमा ने उनका परिचय कराया, तब मालूम चला कि वो साधारण नैन-नक्श वाली लड़की भोजपुरी की लोकप्रिय अभिनेत्री और निर्देशक है। रोजा हिंदी सिनेमा में भी खूब काम रही हैं। वे बोनी कपूर के प्रोडक्शन हाउस से जुडी हुई हैं। बहुत जल्द उनकी फिल्म 'हैलो हम लल्लन बोल रहे हैं' रिलीज होने जा रही है। इसमें रोजा राजपाल यादव की हीरोइन बनी हुई हैं। रोजा रंगमंच को भी उतना समय देती हैं, जितना फिल्मों को। वे भोपाल में अपने नए प्ले की संभावनाएं तलाशने आई थीं। रोजा मूलतः आजमगढ़ की हैं, लेकिन वर्षों दिल्ली में रहीं और उसके बाद मुंबई आ गईं।
रोजा ने जब बताया कि वे मूल रूप से आजमगढ़ की हैं, तो मैं चौंक-सा गया। सच कहूं, तो भीतर से बेहद पीडा-सी हुई। दरअसल, कुछ फिरकापरस्त युवाओं की करतूतों ने आजमगढ़ पर जो कलंक पोता है, उसका दर्द हर उस शख्स के चेहरे पर साफ पढा जा सकता है, जो थोड़ा-बहुत भी इस शहर से जुडा रहा है। रोजा अत्यंत प्रतिभाशाली लड़की हैं, लेकिन उनके व्यक्तित्व में सफलता का सुरूर ढूंढें से भी नहीं मिलेगा। सफलता का मापदंड प्रतिभा के अलावा निष्ठा, परिश्रम और संयमित बर्ताव आदि के आधार पर तय होता है...और रोजा इन सबमें सौ टका खरी उतरती हैं। यह इसलिए कहना उचित होगा क्योंकि आमतौर पर यही प्रचारित किया जाता रहा है कि ग्लैमर अच्छे-खासे व्यक्ति का मिजाज और दिमाग बिगाड़ देता है। फिल्मी इंडस्ट्री के लोग इस मामले में खासे बदनाम है। रोजा ने दर्जनभर सफल भोजपुरी फिल्में की हैं और कई नामी-गिरामी निर्देशकों की सहायक रही हैं, फिर भी वे हर बार एक नई शुरुआत करती हैं। यह जीवन की सच्चाई भी है, क्योंकि हर नया कार्य एक नई चुनौती लाता है, जिसकी कसौटी पर तभी खरा उतरा जा सकता है, जब पुरानी सफलताओं का मद सिर पर न बैठा हो।
रोजा का आजमगढ़ से जुडा होना शर्म की बात कतई नहीं है, बल्कि धिक्कार उन्हें हैं, जो अपनी मातृभूमि की जगहंसाई करा रहे हैं। रोजा रचनात्मक रूप से अत्यंत दक्ष हैं और व्यावहारिक भी। उनके भीतर भोपाल में सुषुप्त पड़ीं रचनात्मक गतिविधियों की तड़प स्प्ष्ट दिखाई दी। चूंकि जितनी देर भी उनसे चर्चा हुई विषय रचनात्मक मुद्दे ही रहे, इसलिए आजमगढ़ पर बात करना उचित नहीं लगा, लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि रोजा से मिलकर मेरे अंदर उनके शहर के प्रति प्यार और पीड़ा घुमड-सी पड़ी। प्यार इसलिए क्योंकि मुझे आजमगढ़ की सुसंस्कारित लड़की और चर्चित अभिनेत्री से अनौपचारिक चर्चा करने का अवसर मिला...और पीड़ा यह कि कुछ लोगों की वजह से शहर क्यों बदनाम होते हैं?
ईद के दो दिन बाद मैंने रोजा से आजमगढ़ का जिक्र किया तो उनका कहना था-कुछ लोगों के कारण पूरे शहर पर अंगुली उठाना ठीक बात नहीं है, हाँ, जो गलत हैं, उन्हें सजा जरूर मिलनी चाहिए.

रोजा का विस्तृत साक्षात्कार दैनिक जागरण के भोपाल संस्करण में प्रकाशित हुआ था, जिसे पल्लवी वाघेला ने लिया था। जानिए रोजा के बारे में...

भोजपुरी और हिंदी दोनों साथ-साथ
मैं भोजपुरी और हिंदी दोनों मीडिया में बराबर काम कर रही हूं। भोजपुरी में मेरी 12-13 फिल्में आ चुकी हैं, जिनमें मैंने अभिनय किया है। कई भोजपुरी फिल्मों का निर्देशन भी किया है।

फिल्मी सफर
परिवार से कोई इस फील्ड में नहीं था, इसलिए दिक्कतें भी आई। ग्रेजुएशन के बाद थिएटर से जुड़ाव हुआ। दिल्ली में दिल लगाकर थिएटर किया। एनएसडी से जुड़ी यहां सतीश(कौशिक)जी के साथ भी काम किया। जब बांबे गई तो उनसे मुलाकात हुई। मैंने कहा अब यहां कुछ करना है। उन्होंने डायरेक्शन में असिस्ट करने का ऑफर दिया। मेरी पहली फिल्म उनके साथ आई कोई मेरे दिल से पूछे। इस फिल्म से ईशा देओल लांच हुई थीं। इसके बाद क्यूं हो गया न, रन, नो इंट्री और इसी तरह की कई और अच्छी फिल्में बनाई।

निर्देशन से अभिनय
डायरेक्शन के दौरान में पांच साल तक बोनी कपूर के प्रोडक्शन हाउस से जुड़ी रही। इसमें सहारा वन के लिए एक सीरियल तैयार हो रहा था मालिनी अय्यर। सीरियल में मालिनी का लीड रोल श्रीदेवी जी कर रही थीं और उनकी देवरानी के रोल के लिए लड़की की तलाश थी। मैं इस सीरियल में असिस्ट भी कर रही थी। मुझे यह रोल दिया गया और बस डायरेक्शन के साथ परदे पर भी वापस एक्टिंग शुरू हो गई। वर्तमान में महुआ चैनल पर एक सीरियल चल रहा है आंचरा के मोती इसके अलावा जल्द ही मेरी हिंदी फिल्म हैलो हम लल्लन बोल रहे हैं रिलीज होने वाली है। इसमें मैं राजपाल यादव की प्रेमिका जिन्की का किरदार कर रही हूं। इसके अलावा सीरियल धर्मवीर के डायरेक्टर आलोक कुमार जी के साथ एक प्रोजेक्ट चल रहा है। कलर्स चैनल पर आने वाले इनके सीरियल श्रीकृष्णा में भी मैं नजर आ सकती हूं।
एक्टिंग संग डायरेक्शन
सच कहूं, बेहद मजा आता है। मालिनी अय्यर की शूटिंग के दौरान मैं अपने गेटअप में ही डायरेक्शन करती थी। कई बार मेरा ही शूट होता था और डायरेक्शन में खो जाने के कारण मैं चिल्लाती रहती -किसका शूट है भई जल्दी आओ। इस स्थिति को बेहद इंज्वाय किया है।

थिएटर से लगाव
थिएटर मेरा पहला प्यार है। जब तक जिंदा रहूंगी थिएटर करूंगी। आज भी दिल्ली फेस्टिवल का बेसब्री से इंतजार करती हूं। मेरा सपना यहीं है कि अच्छा थिएटर हमेशा जिंदा रहे और उसमें मैं योगदान कर सकूं। हमारा थिएटर ग्रुप है पुनर्नवा। हम इंडिया के बाहर भी कई प्ले करते हैं। इनमें भोजपुरी नाटक बिदेसिया तो व‌र्ल्ड में फेमस है। भोपाल आने का मकसद भी थिएटर ही था। यह हबीब तनवीर साहब का शहर है, इसलिए यहां प्ले करने का बड़ा मन है और भी कई लोगों से भोपाल की तारीफ सुनी थी। अब इरादा पक्का हो गया है।

भोपाल में होंगे प्ले
मैंने भोपाल में दो प्ले करने का प्लान किया है। पहला तो ऑल टाइम हिट बिदेसिया और दूसरा कॉमेडी प्ले होगा। दोनों प्ले भारत भवन में होंगे और इनमें भोपाल की कलाकार सीमा मलिक भी शामिल होंगी।
अफसोस हुआ
सच कहूं भोपाल की खूबसूरती देखकर जितनी खुश हुई, भारत भवन की वीरानी देखकर उतना ही अफसोस हुआ। वह इतनी खूबसूरत जगह है उसे बनाने वाले व्यक्ति ने कई सपने देखे होंगे, वहां वीरानी चुभती है। मेरा भोपाल थिएटर ग्रुप्स से कहना है कि थिएटर के लिए फेस्टिवल का रास्ता न देखे इसे निरंतर रखें। इसके लिए गवर्नमेंट द्वारा दी जाने वाली फंडिंग का लगातार पता लगाए और इसे जिंदा रखे।

शुक्रवार, 3 अक्तूबर 2008

महानगर
घर तक ही बची है पहचान मेरी...
यहां तो बस गुमनाम रहता हूं।
बैचेनी-सी बसी रहती है भीतर...
मुस्कुराता हूं,मिलनसार रहता हूं।
भागता रहता हूं, यहां से वहां...
थका हूं, लेकिन शांत रहता हूं।
मन कहता है चीख पडूं सब पर..
घर-परिवार वाला हूं....
सो...चुपचाप रहता हूं।

ईश्वर!
हे ईश्वर!
तुम कहां हो....
सुना था कि
कण-कण में बसे हो तुम...
हे ईश्वर!
मैंने तो कण-कण छान मारा!

पत्रकार
रातभर नींद नहीं आई...
क्या लिखूंगा आज...
कल वो बच्चा भूख से न मरता तो...
हे ईश्वर! 
मेरा तो मरण हो जाता!

नेता

सब एक थाली के चट्टे-बट्टे हैं...
इसलिए हट्टे-कट्टे हैं।
 
अमिताभ बुधौलिया 'फरोग'

बुधवार, 1 अक्तूबर 2008

देवी
साझ ढले मंदिर को निकली थी...
जब गुंडे उसे उठा ले गए...
मंदिर के पीछे पड़ी मिली...
वह अर्धनग्न हालत में...
समीप पड़ी थी पूजा की थाली और फूल...
देवी दर्शन की चाह थी...
बस इतनी-सी थी उसकी भूल।
भगदड़
भागे जा रहे थे भक्त...
एक-दूसरे के ऊपर...
दबे-कुचले लोग...
चीख रहे थे...
कौन बचाता उन्हें...
ईश्वर भी तो असहाय खड़ा था...
निःभाव सब देख रहा था!
दंगा
बहुत खटखटाया उसने दरवाजा...
चीखता रहा, चिल्लाता रहा...
लेकिन मैंने ठूंस ली थीं अंगुलियाँ अपने कानों में...
और जोर-जोर से पढने लगा गीता/कुरान/ बाइबिल...
ताकि बचा रहूं अ-धर्मी होने से...
बचा रहूं उसे बचाने के पाप से।
आँचल
कहाँ छिपाती...
अपने बेटे को...
दरिंदों ने आंचल भी कर दिया था तार-तार...
न बचा सकी बेटे को...
और न ही बच सकी लाज।
अमिताभ बुधौलिया 'फरोग'

मंगलवार, 30 सितंबर 2008

संदर्भ: फिल्म 'एक विवाह ऐसा भी' और अभिनेता कुनाल कुमार


रियल लाइफ में अभिनय से कोसों दूर

संयम न खोना कभी...
बहते रहो, न ठहरो कभी...
लगे रहो लक्ष्य पर...
सपने होंगे पूरे सभी।

मेरे एक मित्र हैं राज शांडिल्य। फिलहाल, राज मुंबई में रहते हैं और स्क्रिप्ट राइटर हैं। इन्होंने टेलीविजन के कई चर्चित कार्यक्रमों की स्क्रिप्ट राइटिंग की है। इन दिनों वे कुछ फिल्मी विषयों पर भी काम कर रहे हैं। बहरहाल, इनका यहां जिक्र इसलिए लाजिमी है, क्योंकि मैं अब जिनके बारे में बताने जा रहा हूं, उनसे मेरी मुलाकात इन्हीं के माध्यम से हुई थी। जनवरी की सर्द रात थी। राज मुझे मोबाइल पर फोन करके पलाश होटल पहुंचने को कहते हैं। वे मुझे अपने एक मित्र से मिलाना चाहते थे, जो 'राजश्री प्रोडक्शन' की फिल्म 'एक विवाह ऐसा भी' की शूटिंग के सिलसिले में भोपाल आए हुए थे। उस समय मैं दैनिक जागरण से जुड़ा हुआ था। रात करीब 8-9 बजे मैं पलाश होटल पहुंचता हूं। राज पहले से ही वहां मौजूद थे। मैं कमरे का दरवाजा खटखटाता हूं, तो सामने एक मुस्कराता हुआ चेहरा नजर आता है। मैं कमरे में पहुंचकर राज से कहता हूं कि इन महोदय की सूरत कुछ जानी-पहचानी है। उस वक्त मुझे नहीं मालूम था कि राज इन्हीं शख्स से मिलवाना चाहते थे। तब राज हंसते हुए बताते हैं कि ये कुनाल कुमार हैं और टेलीविजन-फिल्म दोनों क्षेत्रों में काफी बेहतर काम कर रहे हैं।
फिल्मी कलाकारों के बारे में आम धारणा यही है कि वे बहुत घमंडी होते हैं, ग्लैमर का रंग उनका दिमाग और मिजाज दोनों बिगाड़ देता है, लेकिन सब एक थाली के चट्टे-बट्टे नहीं कहे जा सकते। हालांकि यह भी सच है कि मीडिया से इनका बर्ताव काफी मीठा और संयमित रहता है, बनिस्बत आम लोगों के, लेकिन ऐसे कड़वे लोग फिल्म इंडस्ट्री में 1 या 2 प्रतिशत ही होंगे। बाकी लोग ऊंचाइयों के साथ और भी विनम्र होते चले जाते हैं। फिल्मी कलाकारों के व्यवहार का जिक्र यहां इसलिए किया जा रहा है क्योंकि कुनाल जितने मझे हुए अभिनेता हैं, उतने ही अच्छे इनसान भी।
कुनाल कुमार के बारे में लिखते वक्त उनकी मुस्कराहट और बातचीत का सलीका स्मरण में आ जाता है। दरअसल, यहां कुनाल को संदर्भित बनाते हुए मैंने यह बताने का प्रयास किया है, कि एक सफल हीरो और हीराइन के पीछे कितना परिश्रम और निष्ठा छिपी होती है। हुनर भी तभी निखरता है, जब हम उसे निरंतर कसौटी पर परखते रहें। स्वाभाविक है इसके लिए हमें अपने कार्यों के प्रति पूरी निष्ठा, समर्पण और ईमानदारी बरतनी होगी।
कुनाल करीब एक महीने से अधिक समय तक भोपाल में रहे। इस दौरान कई मर्तबा हमारी मुलाकात हुई। एक रोज रात को जब मैं उनसे मिलने होटल पहुंचा, तो वे फिल्म की स्क्रिप्ट पढ़ रहे थे। समीप ही पठानी कुर्ता-पजाम टंगा हुआ था। मेरे पूछने पर वे हंसते हुए बोले- सुबह-सुबह रेलवे स्टेशन पर शूट है, इसलिए यहीं से तैयार होकर निकलूंगा। कुनाल उस दिन देर रात तक अपने संवादों काम करते रहे। दरअसल, आम फिल्म दर्शक यही मानते हैं कि अभिनेता और अभिनेताओं की जिंदगी ऐशभरी होती है, लेकिन यह अधूरा सच है। उन्हें अपने करियर में आम नौकरीपेशा व्यक्तियों से कहीं अधिक परिश्रम और समय देना पड़ता है। एक दिन रात के वक्त मैं राज और कुनाल लेक व्यू (भोपाल की बडी झील) पर सैर-सपाटे को निकले। बातचीत के दौरान कुनाल बार-बार अपनी हथेलियों को मल रहे थे। पूछने पर ज्ञात हुआ कि दिन में फिल्म के गाने की शूटिंग थी, जिसमें उन्हें तबला बजाना था। सही शूट के लिए जरूरी था कि रिदम के साथ-साथ उनके हाथ तबले पर चलें। इसलिए एक तबलावादक ने उन्हें तबले पर सही तौर-तरीके से हाथ चलाने का प्रशिक्षण दिया था। कुनाल अपने अभिनय के साथ पूरा न्याय चाहते थे, इसलिए उन्होंने करीब दो-ढाई घंटे तबले पर हाथ साधे। इस वजह से उनकी हथेलियां छिल-सी गई थीं। कुनाल और हम जब भी मिलते वे फिल्म के अपने संवादों पर गहरी गुफ्तगू जरूर करते थे, शायद कुछ इनोवेटिव आइडियाज निकल आएं।
कुनाल इन दिनों कई बड़े बैनरों की फिल्म कर रहे हैं, लेकिन स्टार होने का अहम उन्हें छू तक नहीं पाया है। बहरहाल, तब कुनाल का दैनिक जागरण में एक साक्षात्कार भी प्रकाशित हुआ था, जिसके कुछ अंश यहां प्रस्तुत किए जा रहे हैं-
फरीदाबाद से मुंबई का सफर
एक्टिंग का तो बचपन में ही चस्का लग गया था। दरअसल जब सातवीं कक्षा में था दूरदर्शन के सीरियल में नेहरूजी के बचपन का किरदार निभाया था। हां, इसके बाद पढ़ाई के दौरान पूरा फोकस इंजीनियरिंग पर हो गया। रूढकी की एग्जाम देने के लिए दिल्ली गया। वहां पेपर खत्म होने पर यूं ही घूम रहा था कि बिड़ला मंदिर के पास लंबी लाइन नजर आई। पता चला कि यह लाइन एक्टर बनने के लिए लगी है। बचपन का शौक जाग गया। पास में और कोई फोटो तो था नहीं, एक्जाम का स्टाम्प लगा फोटो ही जमा करवा दिया। मुझे सीरियल 'स्वीकार है मुझे' के लिए सिलेक्ट कर लिया गया। बस स्टीयरिंग इंजीनियरिंग से एक्टिंग की ओर घूम गया।
मुंबई नगरिया का स्ट्रगल
काफी सारे एड किए। एड करते-करते कई सीरियल जैसे कुसुम, कुमकुम, भाभी, शाकालाका बूम-बूम आदि किए। इसके बाद फिल्मों में आया। (हंसते हुए) बर्दाश्त फिल्म आई, जिसे दर्शकों ने बर्दाश्त नहीं किया। इसके बाद साथिया, मैं हूँ न और बंटी-बबली फिल्में करते हुए लगा कि कही बेस्ट फ्रेंड का अवार्ड लेकर ही न रह जाऊं। लेकिन मालिक की जब जो मर्जी होती है वही होता है। यूं कहूं कि मैंने खुद केवल प्रयास किए, बाकि जो सफलता मिली वह तो ऊपर वाले की देन है।
भविष्य की योजनाएं
मैं हमेशा सरेंडर वाली अवस्था में रहता हूं। कभी प्लानिंग नहीं करता, जो करवाता है मेरा भगवान करवाता है। मैं अपनी अभी चल रही जिंदगी से बेहद खुश हूं। मुझे हमेशा से एक्टर बनने की चाह थी, स्टार नहीं। (मजाकिया लहजे में) मैं क्रीज पर खड़ा रहकर धीरे-धीरे रन बनाने में विश्वास रखता हूं। चौके-छक्के मारने में नहीं।
शौक
फोनेटोग्राफी करता हूं। मैंने अपने मोबाइल से खींची तस्वीरों का 4 मिनट का वीडियो तैयार किया है 'लाइफ एन एब्सट्रेक्ट'। यह दुनिया का पहला मोबाइल से बना म्यूजिक वीडियो है। इसके अलावा कई लघु फिल्में भी बनाई हैं। इनमें 'टाइम लेस लाइफ' को न्यूयार्क फिल्म फेस्टिवल में 'बेस्ट डिजिटली शार्ट फीचर फिल्म' का अवार्ड मिला है। इसी तरह 'लेट्स स्माइल' भी ब्रिटिश काउंसिल डिजीटल फिल्म फेस्टिवल में प्राइज जीत चुकी है। इसके अलावा ह्यूमेनिटी एट इट्स बेस्ट और वाटर बाटल ने भी विभिन्न फेस्टिवल में प्रशंसा पाई है।
( खिलखिलाता बचपन : कुनाल के फोनेटोग्राफी हुनर की एक तस्वीर )
(राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म-एक विवाह ऐसा भी बहुत जल्द रिलीज होने जा रही है। इसमें सोनू सूद और ईशा कोप्पिकर के साथ कुनाल कुमार बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।)

  • अमिताभ बुधौलिया 'फरोग'

सोमवार, 29 सितंबर 2008


1
ईश्वर भी न बचा सका उसे....
कत्ल कर दिया गया...
मंदिर की चौखट पर...
उस पर यह इल्जाम था...
वो एक मुसलमान था।

2
अपनों ने ही झोंक दिया आग में...
हिंदू होकर भी उसने एक मुस्लिम लड़की की इज्जत बचाई थी...
बस इतना-सा गुनाह था...
प्यार उससे बेपनाह था।

3
कृष्ण भी न रोक सके उसका चीरहरण...
ईश्वर देखता रहा और वो बेलाज हो गई...
वे कौरव नहीं थे...
...और न उसे जुए में हारा गया था...
दोष इतना था...
उसके मोहल्ले में एक मुसलमान मारा गया था।

4
मुझे न राम कहो, न रहीम कहो...
मैं बेनाम रहना चाहता हूं...
क्योंकि नामों से भी आती है अब साम्प्रदायिकता की बू।

5
जब मैं जन्म लूं तेरी कोख से ओ मां... मुझे कोई नाम न देना।
न मुझे हिंदू बनाना, न मुसलमान बनाना...
हर दिल में समा जाऊं... ऐसा इनसान बनेगा।

अमिताभ बुधौलिया 'फरोग'

शुक्रवार, 26 सितंबर 2008

अराजकता के विरुद्ध नया इंकलाब

गांधीगीरी से भाईगीरी तक...
  • अमिताभ बुधौलिया 'फरोग '
हिंदुस्तान की आजादी में जितना बड़ा योगदान गांधीजी का रहा, उतना ही क्रांतिकारियों का भी। स्वाभाविक-सी बात है कि कहीं हिंसा का प्रतिकार अहिंसा से करना मुनासिब होता है, तो कई मामलों में कांटे से भी कांटा निकालना पड़ता है। यह मौके की नजाकत पर निर्भर करता है कि कब और कहां कौन सा आचरण अपनाया जाए। फिलहाल, इसे भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की चूक कहें या असफलता, भारतीय जनमानस तीसरे रास्ते पर भी चल पड़ा है। हालिया रिलीज फिल्म 'सी कंपनी' इसी मार्ग की विचारधारा की उपज है। मतलब, गुंडा का मुकाबला गुंडई तरीके से करना। इसे आतंकवाद का 'गांधीगीरी संस्करण' भी कह सकते हैं। भ्रष्ट तंत्र के प्रति विरोध जताने के इस तौर-तरीके पर चिंतन बेहद जरूरी है। दरअसल, प्रतिरोध का भाव कब प्रतिशोध में बदल जाए, कह पाना मुश्किल है।
रील की कहानी कहीं न कहीं रियल लाइफ से ही रचती है। फलने-फूलने के हिसाब से मुंबई अंडरवर्ल्ड के लिए सबसे मुनासिब जगह रही है। भारतभर के छोटे-मोटे गुंडा-भाई और चोर-उचक्के मुंबइया अंडरवर्ल्ड को अपना आदर्श मानते रहे हैं। उन्हें अपराध करने और धन उगाही के नवीनतम तौर-तरीके मुंबइछाप अंडरवर्ल्ड से ही सीखने-समझने को मिलते हैं। भारतीय सिनेमा इस प्रशिक्षण को मनोरंजक तरीके से उपलब्ध कराता रहा है।
खैर, यहां बात भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की खामियों के विरोध में जनमानस में पनप रहे आक्रोश की हो रही है, जिसमें भ्रष्टाचार से लेकर आतंकवाद और गुंडागर्दी जैसे सभी विषय शामिल हैं। कानून और प्रशासनिक तंत्र की लचरता ने जन- मानस पर गहरा असर डाला है। वर्ष 2003 में आई 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' और हाल में रिलीज हुई 'सी कंपनी''अ वेन्ज्डे' में फर्क देखिए, जनमानस के बदलते भावों का स्पष्ट आकलन किया जा सकेगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था दिनों-दिनों खराब होती जा रही है। भ्रष्टाचार और निजी हित देश को दीमक की तरह चट करने में लगे हैं।
बहरहाल जितनी तालियां मुन्नाभाई के ह्दय परिवर्तन पर बजी होंगी, उतना ही उल्लास 'अ वेन्ज्डे' और 'सी कंपनी' के दर्शकों में देखने को मिल रहा है। फिल्म समीक्षा के नजरिये से यह विश्लेषण उत्तेजक भले न हो, लेकिन सामाजिक पहलुओं के हिसाब से यह चिंताजनक स्थिति की ओर इंगित करता है।
गुलामी के काल में सिर्फ दो सिद्धांत काम करते थे, पहला अंग्रेजों को खदेड़ना और दूसरा लोकतंत्र की स्थापना। संभवतः ऐसा किसी ने भी नहीं सोचा होगा कि 'नेता' इस देश में गाली का पर्याय बन जाएगा, वर्ना सुभाष चंद बोस कभी भी खुद को नेताजी कहलाना पसंद नहीं करते! चूंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था की बागडोर राजनीतिक हाथों में है, इसलिए भ्रष्टाचार और अव्यवस्थाओं का 80 प्रतिशत दोष इन्हीं के मत्थे मढा जाएगा। बाकी 20 प्रतिशत भारतीय जनता दोषी है, जो भ्रष्ट नेताओं को वोट देती है या रिश्वत, अन्याय और अन्य अव्यवस्थाओं पर चुप्पी साधे बैठी रहती है।
आतंकवाद, अंडरवर्ल्ड, रिश्वतखोरी, अन्याय-अत्याचार जैसे मसले भारतीय न्यायप्रणाली और राजनीति के दूषित होने का ही नतीजा हैं। चिंताजनक बात यह है कि इनका विरोध करने का तरीका धीरे-धीरे गांधीगीरी के इतर दूसरे रूप अख्तियार कर रहा है। 2006 में आई 'लगे रहो मुन्नाभाई' की गांधीगीरी से प्रेरित भारतीय जनमानस धीरे-धीरे दूसरे तौर-तरीके भी अपना रहा है। इसी साल आई 'अपरचित' में नायक विक्रम और 1996 में रिलीज हुई 'हिंदुस्तानी' में कमल हासन के चरित्र ने प्रतिरोध की नई परिभाषा रची थी। यहां विरोध के भाव में प्रतिशोध की झलक भी स्पष्ट देखी गई। हाल में आईं 'अ वेन्ज्डे' और 'सी कंपनी' देश और समाज के हित में एक नई लड़ाई की शुरुआत कही जा सकती हैं। इसे अरब मुल्कों की न्याय प्रणाली का देसी संस्करण माना जा सकता है। मतलब-खून का बदला खून और लूट का बदला लूट....!
हर कला के पीछे कुछ उद्देश्य निहित होते हैं। यह उद्देश्य क्या हैं, यह फिल्म के जनक के दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। सिनेमा रामगोपाल वर्मा भी रचते हैं और विधु विनोद चोपड़ा भी। यह जरूरी नहीं कि हरेक फिल्म में शत-प्रतिशत मनोरंजन का मसाला ही इस्तेमाल किया गया हो? 'अ वेन्ज्डे' की रचना करते समय नीरज पांडे की सोच अलग रही होगी और 'सी कंपनी' तैयार करते समय एकता कपूर की अलग। दरअसल, पिछले कुछ सालों में भारतीय सिनेमा यथार्थ को जीने लगा है...और 'द वेन्ज्डे' एवं 'सी कंपनी' ने जनमानस के भीतर की अकुलाहट और आग को ही बाहर निकाला है। यह गंभीर विषय है, जिस पर सामूहिक चिंतन अत्यंत जरूरी है।

बुधवार, 24 सितंबर 2008

आगे की सुधि लेहु...
  • पंकज शुक्ल
मुझसे अक्सर लोग ये पूछते हैं कि मैंने भोजपुरी भाषी ना होने के बावजूद पहली फिल्म भोजपुरी में ही क्यो बनाई? सच मानें तो इस सवाल का जवाब खुद मुझे भी अब तक समझ नहीं आया। जितने बजट में भोले शंकर बनी है, उतने बजट में खोसला का घोसला और भेजा फ्राई जैसी फिल्में आसानी से बन जाती हैं। फिर, भोले शंकर ही क्यों? शायद इसलिए कि जब मैंने फिल्म मेकिंग का फाइनल फैसला लिया तो उस समय मनोज तिवारी ही मुझे सबसे सुलभ और सस्ते सुपर स्टार नज़र आए। पहली ही फिल्म अगर बिना किसी सितारे के बना दी जाए तो फिल्मी दुनिया में पहचान हो पानी मुश्किल होती है। ये अलग बात है कि जब से भोले शंकर की मेकिंग के दौरान मनोज तिवारी की एक के बाद एक लगातार कोई नौ फिल्में लाइन से फ्लॉप हो गईं, और भोले शंकर में अगर मिथुन चक्रवर्ती ना होते तो शायद भोले शंकर भी मनोज तिवारी की दो और फिल्मों ए भौजी के सिस्टर और छुटका भइया ज़िंदाबाद की तरह रिलीज़ की ही राह तक रही होती। ये दोनों फिल्में भोले शंकर के पहले से बन रही हैं और अब तक सिनेमाघरों तक नहीं पहुंच पा रही हैं, तो बस इसी वजह से कि मनोज तिवारी को टक्कर देने अब केवल रविकिशन ही नहीं बल्कि तीन चार और तीसमारखां भोजपुरी सिनेमा में आ पहुंचे हैं। ख़ैर, मैं तो यही चाहता हूं कि मनोज तिवारी दिन दूनी और रात चौगुनी तरक्की करें (शोहरत में, सेहत में नहीं)। बस वक्त आ गया है कि वो अब सोलो हीरो फिल्में करने की ज़िद छोड़ें, अपनी फीस में कम से कम 50 फीसदी की कटौती करें और भोजपुरी सिनेमा को फिर से वैसा ही सहारा दें, जैसा कि फिल्म ससुरा बड़ा पइसा वाला से उन्होंने दिया था। भोले शंकर की चर्चा को यहीं पर विराम और अब आगे की बात...।भोले शंकर जब से बन कर तैयार हुई है और टी सीरीज़ की मार्फत इसके प्रोमोज़ और गाने टीवी चैनलों तक पहुंचे हैं, मुझे कम से चार भोजपुरी फिल्मों के ऑफर मिल चुके हैं। कम से कम दो निर्माताओं ने मिथुन चक्रवर्ती के साथ एक और भोजपुरी फिल्म बनाने की गुजारिश की। दिल्ली के एक निर्माता मनोज तिवारी और निरहुआ को लेकर एक कॉमेडी फिल्म बनाना चाहते हैं। लेकिन, मैंने अभी तक ना तो किसी को ना किया है और ना ही हां। भोजपुरी सिनेमा चाहे तो अपने कील कांटे दुरुस्त कर जल्द ही दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों की तरह सम्मानित सिनेमा की श्रेणी में आ सकता है। इस बात में दम बना रहेगा तभी मुंबई मंत्रा जैसी और कंपनियां इस भाषा में पैसा लगाने की हिम्मत जुटा पाएंगी। अभय सिन्हा जी की फिल्म हम बाहुबली के रशेज मैंने देखे हैं। रवि किशन ने इसमें मंटू गोप के तौर पर कमाल का काम किया है। फिल्म का फोटोग्राफी काबिले तारीफ है और संगीत में भोले शंकर के बाद धनंजय मिश्रा ने फिर कमाल किया है।भोले शंकर और हम बाहुबली दोनों की मेकिंग किसी हिंदी फिल्म से कम नहीं है। निर्माण की लागत भी कमोबेश बराबर ही है। भोले शंकर की कीमत वैसे बाज़ार की दरों पर लगाई जाए तो दो करोड़ से कम नहीं बैठती, लेकिन अपने व्यवहार के चलते मैंने अपने निर्माता के कम से कम तीस चालीस लाख रुपये इस फिल्म की मेकिंग में बचाए। वैसे सच पूछें तो भोजपुरी सिनेमा के दर्शकों को भी अब अच्छे और बुरे का फर्क समझ आने लगा है। ये अलग बात है कि बिहार के निर्माताओं के बही खाते अब भी पुराने ढर्रे पर ही चलते हों और उनसे निकलकर निर्माताओं की झोली तक पैसा पहुंचना अब भी दूर की कौड़ी लगता हो। पूरी फिल्मी दुनिया बिहार के वितरकों के नाम पर जो बातें कहती है, वो पूरी तरह गलत नहीं होतीं, ये अब कुछ कुछ मुझे भी लगने लगा है। मुंबई में हिंदी फिल्मों पर चर्चा होते समय बात जब इनकी लागत की रिकवरी की होती है तो कोई भी निर्माता बिहार से आमदनी की बात सोचता तक नही है। ये इसके बावजूद कि बिहार में कोई 600 थिएटर हैं और इनमें से कोई 450 थिएटर्स में अब भी नियमित तौर पर फिल्में देखी जाती हैं।यानी कि एक ढंग की भोजपुरी फिल्म मरी से मरी हालत में बिहार में छह महीने के भीतर कम से कम साठ से लेकर सत्तर लाख का कारोबार करती है। हां, शुरू के चार छह हफ्तों के बाद ऐसी किसी फिल्म के बिहार के किसी थिएटर में चलने का ज़िक्र किसी वितरक के बही खातों में नहीं होता। ये कमाई बस पर्चियों पर गिनी जाती है और वितरक की तिजोरी में ही सिमटकर रह जाती है। मैं जब पिछली बार बिहार में था तो निरहुआ रिक्शावाला वहां तब भी अंदरुनी इलाकों में चल रही थी, लेकिन शायद ही निरहुआ रिक्शावाला के निर्माताओं को अब ओवरफ्लो के नाम पर कुछ भी बिहार से मिलता होगा। वक्त अब पेशेगत ईमानदारी का और बिहार की छवि मुंबई के निर्माताओं के बीच निखारने का है। वक्त बिहार के सिंगल स्क्रीन थिएटर्स की दशा सुधारने का भी है। पसीने से तरबतर होने के बावजूद फिल्म देखते लोगों को आरा में देख मेरा सिर श्रद्धा से वहीं झुक गया था। ये वो लोग हैं जो सितारे बनाते हैं। और भोजपुरी के सितारे हैं कि एक बार आसमान में चमकने के बाद ज़मीन पर आने का नाम ही नहीं लेते। कहा सुना माफ़।
(अभी हाल में निर्माता-निर्देशक पंकज शुक्ल की भोजपुरी फिल्म भोले शंकर रिलीज हुई है। उन्नाव जिले(उत्तरप्रदेश) के छोटे-से गांव मंझेरिया कला में जन्मे पंकज का जुझारूपन उनके कृतित्व में स्पष्ट देखा जा सकता है। पहले उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ पत्रकारिता में खूब धाक जमाई। वहां से मन उचटा तो मुंबई नगरिया की ओर कूच कर गए। उनके हुनर और हौसले को वाकई सलाम करना होगा कि पूंजीपति फिल्म निर्माताओं के बीच उन्होंने अपनी जगह बनाने में सफलता हासिल की। 12 सितंबर को रिलीज हुई 'भोले शंकर' बिहार में बम-बम भोले के जयघोष सी लोकप्रिय हो चुकी है। अब बारी दिल्ली, यूपी , पंजाब और मुंबई की है। उनका यह लेख भोजपुरी फिल्मों के सुनहरे भविष्य का खाका खींचता है। बोलो जय बम भोले...)

अब क्या कहूं?


बहुत कुछ अभी बाकी है मेरे दोस्त...

अमिताभ बुधौलिया 'फरोग'

1
बकरे की अम्मा अब खैर मनाएगी...
देखना बहुत जल्द इंसानों की बारी आएगी।
2
एक कुत्ता...
इंसानियत के चक्कर में इंसानों-सा मारा गया...
और
एक कुत्ता इंसानों के बीच...
इंसानियत में मारा गया।
3
नए-नए मुल्लाओं को भी अब प्याज से घिन आने लगी है...
क्योंकि...
प्याज नेतागिरी के काम आने लगी है।
4
नेताजी के भाषणों के बीच...
उनके मुर्गे-गुर्गे खूब ढोल बजाते हैं...
क्योंकि...
वे 'पोल' के पहले अपनी...
पोल खुलने से घबराते हैं।
और
नेताजी के भाषणों के बीच खूब ढोल बजते हैं...
क्योंकि...
वे जनता के सवालों का जवाब देने से बचते हैं।
5
गिद्दों पर संकट इसलिए आया है...
क्योंकि...
जरूर उनकी कौम में से किसी ने...
इंसान का मांस खाया है।
6
वे मोहल्लेभर में भोग बंटवा रहे हैं...
क्योंकि...
उनके मित्र मस्जिद गिराकर आ रहे हैं।
7
उन्होंने आज फिर बकरा कटवाया है...
क्योंकि...
एक और मंदिर टूटा है...
अभी-अभी ऐसा समाचार आया है।

सोमवार, 22 सितंबर 2008

आलोचना में टेलीविजन की महारानी


एकता कपूर ऐसी क्यों हैं?
  • अमिताभ बुधौलिया 'फरोग'
टेलीविजन की दुनिया पर एकता कपूर एकछत्र राज करती हैं। कम उम्र में अप्रत्याशित सफलता व्यक्तित्व पर खासा असर करती है। एकता पर भी आरोप लगते रहे हैं कि वे कामयाबी के मद में इतनी चूर हैं कि स्वयं को टेलीविजन संसार की 'स्वयम्भू महारानी' मानती हैं। एकता की कार्यशैली और बर्ताव फिल्म उद्योग में चर्चा का विषय बना रहता है। संभवतः यह ईर्ष्यावश ही प्रचारित किया गया होगा कि 2004 में रिलीज हुई फिल्म 'गर्लफ्रेंड' उनके ही चरित्र पर रची गई। यह दुष्प्रचार भी हो सकता है और सच भी।
दरअसल, फिल्मी दुनिया ही कुछ ऐसी है कि यहां हर बात गासिप-सी नजर आती है। सच भी झूठ जान पड़ता है और झूठ सौ टका सच। 22 सितंबर08 को 'दैनिक भास्कर' के भोपाल संस्करण में 'आपस की बात' कालम के अंतर्गत वीना नागपाल एकता कपूर की बॉडी लैंग्वेज को आड़े हाथों लेती हैं। संदर्भ बिग बॉस के घर से जुड़ा हुआ है। एकता अपने भाई तुषार के साथ इस शो में गेस्ट बनकर आई हुई थीं। उनके मुंह में च्युंगम था, सो शिल्पा शेट्टी के हर सवाल के जवाब में उनका मुंह काफी हरकत-सा करता नजर आता। साथ ही वे बात-बात पर तुषार के कंधे या पैर पर हाथ भी पटक रही थीं। एकता का च्युंगम चबाना और बॉडी लैंग्वेज लेखिका वीनाजी को भारतीय नारी के चरित्र के अनुकूल नजर नहीं आई।
एकता कपूर के 'सास बनाम बहू' सीरियलों को लेकर भी नुक्ता-चीना होती रही है। तथाकथित समाजसेवियों का तर्क है कि एकता के सीरियलों ने भारतीय नारी की छवि धूमिल कर दी है। उनके सीरियल घरेलू झगड़ों की वजह भी बने हुए हैं, गोया एकता कपूर मनोरंजन के नाम पर मन-दर-मन रंज के बीज बो रही हों? यह दीगर बात है कि ऐसे समाजसेवियों का दर्द सिर्फ इतना है कि पुरुष प्रधान समाज में उनका वर्चस्व डोलने लगा है। नारियां एकता के सीरियल देखकर मुखर/उग्र हो रही हैं। एकता कपूर के सीरियलों में काम करने वाले तमाम कलाकार भी इससे इत्तेफाक रखते हैं। वे एकता की कार्यशैली से भी पीड़ित हैं, लेकिन सैकड़ों संषर्घरत कलाकार ऐसे भी हैं, जो एकता कपूर का गुणगान करते थकते नहीं हैं। एकता का स्वरूप क्या है? इसे समझ पाना शायद तब तक संभव नहीं है, जब तक 'बालाजी टेलीफिल्म' अस्तित्व में है।
दरअसल, महिमा-मंडन और छीछालेदरी का यह सारा खेल 'बालाजी टेलीफिल्म' के गठन के बाद ही शुरू हुआ है। संभव है कि टेलीविजन के मनोरंजन उद्योग पर बालाजी के वर्चस्व ने एकता में गुरुर पैदा कर दिया हो...और यह भी हो सकता है कि कई लोग उनकी यह अभूतपूर्व सफलता पचा न पा रहे हों? कारण दोनों हो सकते हैं। एकता के चाल-चरित्र को लेकर अब फिल्में भी रची जाने लगी हैं। गणेश आचार्य की 'मनी है तो हनी है' में एकता के 'मर्दाना रवैये ' पर खूब कटाक्ष किया। गोया बालाजी टेलीफिल्म में काम करने वाले कलाकार बंधुआ मजदूर-सरीखे हों। यह हैरानी वाली बात भी हो सकती है कि पिछले कई सालों से एकता फिल्म उद्योग, खासकर टेलीविजन, तथाकथित समाजसेवियों और मीडिया के निशाने पर रही हैं, लेकिन उन पर कोई असर नहीं हुआ। उनके होंठों पर सदैव मुस्कान अठखेलियां करती रहती है, मानों वे चिकने घड़े का प्रतीक हों।...लेकिन अब अचरज तो यह होता है कि बालाजी प्रोडक्शन की फिल्मों में भी एकता के ऐसे रंग-ढंग को मनोरंजन में ढाला जाने लगा है। हालिया रिलीज फिल्म 'सी कंपनी' इसका ताजातरीन उदाहरण है। यह भी संभव है कि एकता अपनी लोकप्रियता को भुनाने के लिए ऐसा कर रही हों, या वे यह बताना चाहती हों कि उन पर कीचड़ उछालने वाले कोई दूध से धुले नहीं हैं। वहीं ऐसा भी आभास होता है कि एकता यह जताने का प्रयास कर रही हैं कि यह लड़की हर संकट में मुस्कराती रहेगी, जैसा फिल्म के एक दृश्य में होता है। अंडरवर्ल्ड डान यानी मिथुन चक्रवर्ती एकता को कड़ी फटकार लगाते रहते हैं, लेकिन वे तनिक भी विचलित नहीं होती और मुस्कराती रहती हैं।
दरअसल, कोई भी इंसान यह दावा और प्रमाण पेश नहीं कर सकता कि वह दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है। चूक सबसे होती है, लेकिन जो उनसे सबक हासिल कर लेता है, वह श्रेष्ठ मानवों की श्रेणी में शुमार हो जाता है। एकता कपूर ने भी बहुत गलतियां की होंगी, लेकिन क्या इस बात को नकारा जा सकता है कि बालाजी टेलीफिल्म ने नवोदित कलाकारों के संघर्ष को कम किया है। आज बालाजी से हजारों कलाकार, तकनीशियन और अन्य विधाओं के माहिर लोग जुड़े हुए हैं। बालाजी उनके रोजी-रोटी का जरिया बना हुआ है। बालाजी टेलीफिल्म से जुडे मेरे कुछ मित्र बताते हैं कि वहां काम करके यूं लगता है मानों वे कलाकार नहीं, दिहाड़ी मजदूर हों। लेकिन वे इस बात को भी स्वीकारते हैं कि अगर बालाजी टेलीफिल्म न होता, तो न जाने कितने कलाकार संघर्ष करते-करते बुढा जाते।
यह विडंबना ही है कि बहुसंख्यक लोग अपनी आलोचना स्वीकार नहीं कर पाते, लेकिन एकता ने अपने असंयमित व्यवहार पर तमाम हो-हल्ला के बावजूद खुद को संयमित रखा। 'सी कंपनी' में एक विदूषक की भूमिका निभाते हुए उन्होंने खुद का उपहास बनाया, ऐसा साहस बहुत कम लोग दिखा पाते हैं। शायद एकता ने यह बताने की कोशिश की है कि आलोचनाएं उन्हें कभी विचलित नहीं का पातीं, या उनके बुरे बर्ताव के लिए दूसरे लोग भी दोषी हैं...या उनके बारे में जैसा प्रचारित किया जाता है, वो सौ टका सच नहीं है! एकता का मकसद जो भी रहा हो, लेकिन उनका यह साहस सलाम के योग्य है।

शनिवार, 20 सितंबर 2008

रोजगार गारंटी योजना हुई विफल

फजीहत बना पलायन

  • पल्लवी वाघेला
रोजगार गारंटी योजना की असफलता के चलते गुजरात सीमा से सटे गांवों में पलायन हो रहा है। हालांकि रोजगार की तलाश में इन इलाकों के गरीबजन पहले भी गुजरात की ओर जाते रहे हैं, लेकिन इस योजना की फ्लॉप हो जाने से पलायन तेजी से बढ़ा है। सीमावर्ती इन गांवों में भुखमरी जैसे हालात निर्मित हो गए हैं। बीमारियां लोगों के मनोबल को तोड़ रही हैं और शिक्षा की लौ बुझती दिखाई पड़ रही है।
लगातार जारी पलायन के पीछे रोजगार गारंटी में हो रहा भ्रष्टाचार मुख्य कारण बताया जा रहा है। अलीराजपुर और झाबुआ जिले के कई क्षेत्र ऐसे हैं, जहां जॉब कार्ड तो बने हैं, लेकिन वे पंचायत सचिव के पास पड़े रहते हैं। इन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में फर्जी जॉब कार्ड का इस्तेमाल भी हो रहा है। दूसरी ओर कई क्षेत्र ऐसे हैं, जहां काम तो शुरू कर दिए गए, लेकिन वह अधूरे पड़े हैं। समय पर पैसा नहीं मिलता : जिन क्षेत्रों में रोजगार गारंटी योजना के तहत सही तरह से काम हो रहे हैं, वहां समय पर पैसा न मिलने के कारण मजदूर बगावती हो उठते हैं और अंतत: पलायन के लिए मजबूर हो जाते हैं। दरअसल काम तो शुरू कर दिए जाते हैं, लेकिन प्रशासनिक फाइलों में उलझा पैसा बाहर आने में इतना समय ले लेता है कि मजदूर इसकी अपेक्षा गुजरात जाना बेहतर समझते हैं। कहते हैं सरपंच गुजरात से लगी ग्राम पंचायत बड़ा उंडवा की सरपंच बिरजा बाई बताती हैं कि पढ़ी-लिखी न होने के कारण यह काम सचिव ही देखता था। उन्हें गांव वालों से पता चला कि मजदूरों के जॉब कार्ड सचिव के पास ही रखे रहते हैं और उन्हें काम नहीं मिल पाता। उन्होंने लिखित में जनपद पंचायत में सचिव मुकाम सिंह की शिकायत की। अब उनके यहां योजना का क्रियान्वयन सही तरीके से हो रहा है। ग्राम पंचायत बेहड़वा के सरपंच विश्राम सिंह चौगढ़ लाख प्रयासों के बाद भी पलायन नहीं रोक पा रहे हैं। वे कहते हैं कि लोगों को समझाना बहुत कठिन है। वह अपने 14-15 साल के लड़कों के लिए भी काम चाहते हैं। वह चाहते हैं उनके भी जॉब कार्ड बनें, जो संभव नहीं। गुजरात के मुकाबले यहां मजदूरी भी कम है और समय पर पैसा भी नहीं मिल पाता। ऐसे में हम चाह कर भी उन्हें रोक नहीं पाते।
यह भी समस्या
  • क्षेत्र के ग्रामीणों का कहना है कि गुजरात में अधिक और इका पैसा मिलता है, यह व्यवस्था यहां नहीं।
  • ग्रामीणों द्वारा रोजगार गारंटी के तहत बच्चों को रोजगार दिलाने की जिद की जाती है, जिसे पंचायत पूरा नहीं कर सकती।
  • कई जगह निर्धारित राशि 85 रुपए से कम का भुगतान किया जाता है।

( यह रपट दैनिक जागरण के भोपाल संस्करण में 20 सितंबर,08 प्रकाशित हुई है। देवी अहिल्याबाई यूनिवर्सिटी, इंदौर से पत्रकारिता की डिग्री लेने वालीं पल्लवी इन दिनों संवाद फेलोशिप के तहत पंचायतीराज में महिला जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर काम कर रही हैं)


शुक्रवार, 19 सितंबर 2008

आतंकवाद की आग पर राजनीतिक रोटियों की सिकाई


...फिर कौन है देशद्रोही?

  • अमिताभ बुधौलिया 'फरोग'
मुंबई के मुस्लिम बहुल इलाकों में आतंकवादियों के प्रति नफरत जाहिर करना जानलेवा भी साबित हो सकता है। अकेली मुंबई नहीं, गुजरात, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में मुस्लिम बस्तियों में हिंदुस्तानी होने जैसे कोई भाव नजर नहीं आते। आप इन बस्तियों में एक अच्छे और देशभक्त भारतीय होने का साहस नहीं दिखा सकते, खासकर तब जब चर्चा या बहस का विषय आतंकवाद या पाकिस्तान हो। मुंबई का उदाहरण इसलिए प्रासंगिक है, क्योंकि देश की यह आर्थिक राजधानी हमेशा से आतंकवादियों के निशाने पर रही है। मैंने खुद इन बस्तियों में पाकिस्तानी रंग देखे हैं। यह बात मुंबई में 1993 में हुए बम विस्फोटों और दंगों के बाद की है। शायद 96 या 97 में अपने एक मित्र के साथ मुंबई घूमने गया था। मित्र के एक मुस्लिम परिचित थाणे इलाके की किसी बस्ती में रहते थे। हम दोनों तीन-चार दिन वहीं ठहरे। हम जितने दिन भी वहां रुके, मन में एक अज्ञात भय हमेशा बना रहा। यह भय हमारे हिंदू और हिंदुस्तानी होने की वजह से था।

मुद्दा यह नहीं है कि भारत में रहने वाली मुस्लिम कौम भारतीय कहलाने में गर्व क्यों महसूस नहीं करती, चिंता इसकी है कि अब हिंदू और मुसलमानों के बीच इतनी अधिक दूरी बढ़ चुकी है कि, भारत कहीं से भी धर्मनिरपेक्ष देश दिखाई नहीं देता। हम लाख कहते रहें, लेकिन कड़वा सच यही है कि हिंदुस्तान में धर्मनिरपेक्षता के भाव काफूर और काफिर हो चले हैं। भारत कभी भी सांप्रदायिक सौहार्द्र की कसौटी पर पूर्णतः खरा नहीं उतरा। आजादी के बाद धर्मनिरपेक्षता का क्या हश्र हुआ और क्या हो रहा है, यह जगजाहिर है। दुःखद और विडंबना यह है कि अब हर गली, हर शहर साम्प्रदायिक नफरत की हद में आ चुका है। साम्प्रदायिक अलगाववाद की आग से अकेला कश्मीर नहीं, कन्याकुमारी तक हिंदुस्तान झुलसा पड़ा है। जहां कहीं भी मुस्लिम बहुलता है, वहां दंगे होते रहे हैं या हमेशा कोशिशें जारी रहती हैं। बेशक दोष अकेले इस संप्रदाय का नहीं है, लेकिन दुर्भाग्य, हर देशद्रोही हादसों में इन्हीं पर अंगुलियां उठती रही हैं। हिंदुओं के प्रति नफरत की कई वजहें हो सकती हैं, लेकिन अपने देश से घृणा? कुछ समझ नहीं आता, आखिर देशद्रोही कौन है?

हाल में दिल्ली में हुए बम विस्फोटों के बाद भारत की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष छवि और अधिक धूमिल हुई है। ऐसा इसलिए नहीं हुआ क्योंकि हर हादसे के पीछे एक मुस्लिम चेहरा/सोच और इरादा दिखाई दिया। दरअसल, आतंकवाद के मुद्दे पर राजनीतिक दल सदैव दो ध्रुवों में बंटे रहते हैं। मुस्लिम और हिंदू वोट बैंक का लालच इसकी मूल वजह रहा है। एक पार्टी बिना सोचे-समझे वर्षों से समूची मुस्लिम कौम को आतंकवादी ठहराने पर आमदा है, वहीं दूसरी पार्टी दोषियों को सिर्फ इस वजह से बचाने में कोई कसर छोड़ना नहीं चाहती क्योंकि वे उनका वोट बैंक हैं। सिर्फ वोट बंटोरने के मकसद से किसी सम्प्रदाय या संगठन का विरोधी या समर्थक होना देश के हित में कतई नहीं हैं। इसे भारतीय लोकतंत्र की कमजोरी कहें, या राजनीति की गंदे सिद्धांत/सोच, पिछले कुछ सालों से आतंकवाद का नया रूप सामने आया है। मामला 13 दिसंबर, 2001 में भारतीय संसद पर हुए आतंकी हमले के मास्टर माइंड अफजल गुरु का हो या दिल्ली धमाके के मोस्ट वांटेड अब्दुल सुभान कुरैशी उर्फ तौकीर का, एक प्रायोजित और सुनियोजित तरीके से समूची दुनिया के सामने भारत की साख पर बट्टा लगाने के प्रयास जारी हैं। इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा कि वोट बैंक की गर्ज से कुछ पार्टियां भी उनकी इस मुहिम को खुलकर या अंदरूनी तौर पर समर्थन दे रही हैं। अफजल गुरु को देशद्रोह साबित हो जाने के बावजूद फांसी नहीं दी जा सकी है। गुरु को बचाने के लिए कई संगठन दुनियाभर में हायतौबा मचाए हुए हैं। हैरानी इसमें नहीं कि गुरु को रिहा कराने के लिए कश्मीरी मुस्लिम नेता दिल्ली से लेकर लंदन तक अभियान छेडे हुए हैं, इस गंदे खेल में वे लोग भी शामिल हैं, जिन्हें गुरु के गद्दार होने को लेकर कोई शंका नहीं है। समर्थन के पीछे सिर्फ सत्ता का लालच काम कर रहा है। अब यही खेल तौकीर को लेकर खेला जा रहा है। तौकीर की मां जुबैदा कुरैशी चीख-चीखकर मीडिया के सामने अपने बेटे को निर्दोष कह रही हैं, जबकि 2001 में वे उससे नाता तोड़ चुकी हैं।

1993 में मुंबई में हुए बम विस्फोटों के बाद भी आरोपियों को बचाने यही राजनीतिक पैंतरा अपनाया गया था। कौन दोषी है और कौन निर्दोष? सवाल यह नहीं है, मुद्दा यह है कि आखिर हर जांच के बाद अपने ही पुलिस तंत्र पर अंगुलियां क्यों उठाई जाती हैं? आतंकवादी घटनाओं पर सदैव पुलिस की नाकामी बताकर पल्ला झाड़ लेने की प्रवृत्ति देश के लिए बेहद घातक है। सबसे खतरनाक तब, जब दोषियों के समर्थन में उठ रहे हाथों को शह दी जा रही हो। इसे क्या कहेंगे कि तमाम आतंकी हादसों के बावजूद कांग्रेस सिमी जैसे संगठनों को लेकर चुप्पी साधे बैठी है, लेकिन उडीसा, कर्नाटक और कुछ अन्य राज्यों में ईसाई समुदाय पर हुए हमलों के मामले पर भगवा बिग्रेड पर प्रतिबंध की मांग उठा रही है। ऐसा पहली बार नहीं हो रहा, बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठन वर्षों से कांग्रेस के निशाने पर रहे हैं।...पर सिमी का क्या किया जाए? क्योंकि सिर्फ केंद्र की चूक के चलते उस पर से प्रतिबंध हटते-हटते रह गया था। पूरा देश और वे लोग भी जो सिमी की वकालत कर रहे हैं, भली-भांति जानते हैं कि यह संगठन आतंकी गतिविधियों में लिप्त है, बावजूद इस पर नकेल नहीं कसी जा सकी है क्यों? कारण आतंकवाद के मुद्दे पर एकजुटता का अभाव। पोटा के मामले में भी यही देखने को मिला । संभव है इस कानून का दुरुपयोग हुआ हो, तो क्या कश्मीर से भी धारा 370 नहीं हटाई जानी चाहिए? आज से नहीं, तब से जब से कश्मीर मुद्दे ने जड़ पकड़ी है, वहां के मुस्लिमजन सेना पर अंगुली उठाते रहे हैं। फिर कश्मीर और अन्य प्रांतों को अलग-अलग तराजू पर क्यों तौला जा रहा है? खासकर तब, जब आतंकवाद का स्वरूप कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक एक सा हो।

दैनिक भास्कर के संपादकीय पेज (19 सितंबर) पर राजदीप सरदेसाई लिखते हैं-'जब तक ऐसे नरसंहारों को राजनेता विचारात्मक मसलों में तब्दील करते रहेंगे, दहशतगर्द हमेशा जीतेंगे।' पंजाब केसरी में विशेष संपादकीय के तहत अश्विनी कुमार दो टूक कहते हैं-'आतंकवाद का मुकाबला केवल कड़े कानून बनाने से ही नहीं होगा, इसके लिए इच्छाशक्ति का भी होना जरूरी है। यदि संकल्प ही नहीं, तो इच्छाशक्ति कैसे होगी?।' दरअसल, बात पोटा या टाडा की नहीं, राजनीतिक इच्छाशक्ति और नीयत की है। बात जब देशहित की हो, तो निजी हित विस्मृत कर देने की बहुत जरूरत है।