गुरुवार, 16 अक्तूबर 2008

पुरस्कारों का सच!

क्यों दिए जाते हैं पुरस्कार?

इक्के-दुक्के पुरस्कारों को छोड़ दिया जाए, तो शायद ही कोई पुरस्कृत व्यक्ति दूध का धुला निकला हो। पुरस्कृत होना भी एक कला है,...और इसमें वही माहिर होता है, जो सत्ताई मठ में कुंडली मारकर बैठे धीशों को सदैव खुश रखने का हुनर रखता हो। पुरस्कारों के पीछे का सच सब जानते-समझते हैं, लेकिन कौन मुंह खोलेगा? खासकर तब, जब सब एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हों! बहरहाल, ब्लाग की दुनिया घूमते-घामते मेरी दृष्टि ब्लॉग निर्मल आनंद पर पड़ी । यह ब्लाग अभय तिवारी संचालित करते हैं। अभयजी के बारे में पढ़ने के बाद इतना जान सका हूं कि वे इन दिनों मुंबई में रहकर फिल्म और टेलीविजन दोनों में अपने बहुआयामी व्यक्तित्व का प्रभाव छोड़ रहे हैं। बहरहाल, उन्होंने अरविंद अडिगा के पहले उपन्यास द व्हाइट टाइगर को मैन बुकर प्राइज मिलने पर घोर आश्चर्य व्यक्त किया है। देश-दुनिया के लोग पुरस्कारों के पीछे की कहानी जान सकें, इस मकसद से उनका वैचारिक कम विश्लेषणात्मक लेख हम गिद्द पर प्रकाशित कर रहे हैं...
अरविन्द अडिगा की पहले उपन्यास दि व्हाईट टाइगर को बुकर प्राईज़ मिल गया है। उनके नामाकंन मैं इतना हैरान नहीं हुआ था, मगर उनकी इस जीत के बाद मैं वाक़ई हतप्रभ रह गया। दुनिया भर में पुरस्कार एक निश्चित राजनीति के तहत दिए जाते हैं, इस तथ्य से मैं अनजान नहीं रहा हूँ मगर आप सब की तरह कहीं न कहीं मेरे भीतर भी एक सहज-विश्वासी मानुस जीवित है जो चीज़ों की सतही सच्चाई पर यकी़न करके ज़िन्दगी से गुज़रते हैं।अरविन्द अडिगा के साथ अमिताव घोष के साथ की किताब सी ऑफ़ पॉपीज़ भी नामांकित थी, मैंने वो किताब नहीं पढ़ी है, पर अमिताव घोष की पिछली किताबों के आधार पर यह मेरा आकलन है कि सी ऑफ़ पॉपीज़ कितनी भी बुरी हो दि व्हाईट टाइगर से बेहतर होगी। पर मुद्दा यहाँ दो किताबों की तुलना नहीं है, मुद्दा दि व्हाईट टाईगर की अपनी गुणवत्ता है।लगभग तीन-चार मास पहले एच टी में एक रिव्यू पढ़ने के बाद मैं इस किताब को दो दुकानों में खोजने और तीसरे में पाने के बाद हासिल किया और पढ़ने लगा। कहानी की ज़मीन बेहद आकर्षक है; बलराम नाम का एक भारतीय चीन के प्रधानमंत्री को लिखे गए पत्रों में अपने जीवन और उसके निचोड़ों की कथा कह रहा है। बलराम की खासियत यह है कि वो एक रिक्शेवाले का बेटा है और एक बड़े ज़मीन्दार के बेटे का ड्राईवर है जिसे मारकर वो अपने सफल जीवन की नीँव रखता है।अडिगा तहलका में लिखे अपने लेख में बताते हैं कि कैसे कलकत्ता के रिक्शेवालो से कुछ दिन बात-चीत कर के उन्हे अपने फँसे हुए उपन्यास का उद्धार करने की प्रेरणा मिली। यह पूरा डिज़ाइन पश्चिम में बैठे उन उपभोक्ताओं के लिए ज़रूर कारगर और आकर्षक होगा जो भारत की साँपों, राजपूतों और राज वाली छवि से ऊब चुके हैं और भारत में अमीर और ग़रीब के बीच फैलते हुए अन्तराल में रुचि दिखा रहे हैं।मगर मेरे लिए इस किताब को पढ़ना इतना उबाऊ अनुभव रहा कि पचासेक पन्ने के बाद मैं अपने आप से सवाल करने लगा कि मैं ऐसे वाहियात किताब पर क्यों अपना समय नष्ट कर रहा हूँ, जिसे कु़छ वैसे ही चालाकी से लिखा गया है जैसे मैं कभी टीवी सीरियल लिखा करता था। जो मुझे मेरे भारत के बारे में जो कुछ बताती है वो मुझे उस विवरण से कहीं बेहतर मालूम है। और जिन चरित्रों के जरिये बताती है वो न तो सहानुभूति करने योग्य बनाए गए हैं और न ही किसी मानवीय तरलता में डूब के बनाए गए हैं। मुझे अफ़सोस है कि मैं एक उपन्यास से कहीं अधिक उम्मीद करता हूँ।मैं नहीं जानता कि अडिगा को बुकर पुरस्कार दिए जाने के पीछे क्या मानक रहे होंगे? मैं जान भी कैसे सकता हूँ.. पश्चिम के नज़रिये से भारतीय सच्चाई को देखने की तरकीब कुछ और ही होती है? तभी तो ग्यारह बार नामांकित होने के बाद भी नेहरू को कभी नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिला; गाँधी जी की तो बात छोड़ ही दीजिये। लेकिन कलकत्ता के पेगन नरक में बीमारों की सुश्रूषा करने वाली एक नन, मदर टेरेसा को शांति पुरस्कार के योग्य माना गया।

3 टिप्‍पणियां:

manoj ने कहा…

भइया आपके लेख में कही सारी बाते सही है
पुरस्कार के पीछे राजनीतिकरण है

रंजना ने कहा…

satya kaha.....

नीरज गोस्वामी ने कहा…

बुकर पुरूस्कार एक भारतीय द्वारा जीतने पर भारत वासियों की खुशी का गुब्बारा आप ने एक पिन मार कर तोड़ दिया है. हम सिर्फ़ एक भारतीय द्वारा पुरुस्कृत होने पर नाचने लगते हैं लेकिन उसके पीछे छुपे राज को नहीं जानना चाहते...सत्य दर्शन करवाने पर आप का शुक्रिया...और हाँ मेरी धन राशी भी आपने बचा ली क्यूँ की मैं इस पुस्तक को खरीदने की सोच ही रहा था...
नीरज