शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

खेल और संस्कृति


जो करे धन्य और धान्य वही खेल महान

पुराने खेल ‘खल्लास’

अमिताभ बुधौलिया

मैं बचपन में कंचे खूब खेला हूं। गिल्ली-डंडा खेलने में भी कमतर नहीं था। जब कभी गांव जाता था; तो पेड़ों पर चढ़कर पकड़ा-पकड़ी खेलने में भी खूब मजा आता था। थोड़ा बड़ा हुआ; तो क्रिकेट का भूत सवार हुआ। धुरंधर बल्लेबाज और अच्छा विकेट कीपर रहा। इसी दरमियान थोड़ा-बहुत समय निकालकर बैटमिंटन में भी हाथ आजमाता रहा। ...और हां; साइकिल के चक्के (स्टील की रिम) में लकड़ी फंसाकर उसे ऊबड़-खाबड़ गलियों में घुमाना परम आनंद की अनुभूति कराता था। लुकाछिपी का भी अपना एक क्रेज था। कबड्डी, खो-खो, चोर-सिपाही, खूब खेला। कई खेल खेले; लेकिन जो इन खेलों में आता था, वैसी तृप्ति आधुनिक खेलों से कभी नहीं मिली।

अब जब; बड़ा हो चुका हूं, तब बचपन में झांककर स्मृतियों को तरोताजा करता हूं, तो अपना ‘खेल-काल’ बहुत याद आता है। मीठी यादें जेहन को प्रफुल्लित कर देती हैं। मन मचल उठता है; गोया बोल रहा हो-‘कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन!’
अब आप किसी बच्चे से इन खेलों के बारे में पूछिए! संभव है कि; कई तो भारतीय लोकसंस्कृति/बाल संस्कृति में रचे-बसे और माटी में ‘सने’ इन खेलों में से कुछेक को परिभाषित भी नहीं कर पाएंगे। वहीं कई खेलों के बारे में तो आश्चर्य व्यक्त करते हुए प्रतिसवाल कर सकते हैं कि; ‘यह कौन-सा खेल था, कब और कैसे खेला जाता था?’
उम्रदराज पीढ़ी की बात छोड़िए; हम जैसे युवाओं को भी यह बात दु:खी कर सकती है कि; ‘हम अपने बच्चों को खेल विरासत के तौर पर क्या सौंपे?’

पिछले दिनों भारतीय संस्कृति की परिचायक इस पत्रिका ‘रंगकृति’ के संपादक रवि चौधरी मेरे घर आए और बोले-‘मैं यह अंक भारतीय परंपरागत खेलों को समर्पित करना चाहता हूं। वे खेल; जो भारत की लोककला और संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते रहे हों!’ एक व्यावसायिक नजरिये से आकलन किया जाए, तो ऐसी साम्रगी का पत्रिका में संकलन करना मुनाफे का सौदा नहीं कहा जा सकता। हां; यदि क्रिकेट जैसे खेलों पर सम्पूर्ण अंक निकालने का बात होती, तो यकीनन विज्ञापन कबाड़े जा सकते हैं। हालांकि यह प्रयास सराहनीय था, लेकिन जब मैंने उसे लेखकीय नजरिये से भांपा तो इस विषय पर लिखना बड़ा दुष्कर दिखलाई पड़ा। आखिर; शुरुआत कहां से करूं, क्या लिखूं, किस खेल पर लिखूं? आदि-आदि कई प्रश्न दिमाग में बिजली-की भांति कौंधने लगे। तीन-चार दिन तक तो समझ ही नहीं आया कि; क्या मैं लिख भी पाऊंगा कि नहीं? लेकिन सरस्वती देवी की कृपा से रास्ता भी मिल गया।
एक दिन मैंने रास्ते में पड़ने वाली एक झुग्गी बस्ती में कुछ बच्चों को सितौलिया(रबर या कपड़े की गेंद से गोलाकार या चौकोर पत्थरों पर मारकर भागना) खेलते देखा। मैंने भी बचपन में सितौलिया खूब खेला है। इन बच्चों को खेलता देखकर ठीक वैसी ही आनंद की अनुभूति हुई। कुछ देर बच्चों को खेलते देखता रहा। मुझे लिखने का रास्त मिल गया था, सोच मिल गई थी।
परिवर्तन प्रकृति का नियम है! इसलिए नई चीजों/संस्कृतियों/जीवनशैली का जनम-मरण लाजिमी है। यह सिद्धांत खेलों पर भी लागू होता है। भौतिक संसाधनों में नई चीजों/आविष्कारों की निरंतर आमद हो रही है। समाज की दिशा बदली-देश की गति बदली और लोगों की मति बदली। लेकिन जब से ‘बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रुपया!’ वाला फंडा समाज में प्रभावी हुआ है; तब से ‘तरक्की’ और ‘संभ्रांत’ शब्द के मायने बदल गए हैं। जिसके पास मनी; वही धन्य वही धनी! पैसे ने लोगों की क्रयशक्ति बढ़ाई, सो नेशनल/मल्टीनेशनल कंपनियों ने अपने प्रोडक्ट्स घर-घर खपाने के उपाय खोजने प्रारंभ कर दिए। जिनके पास कम पैसा; वे भी धनाढ्य वर्ग के पीछे-पीछे चलने में कोई कोर-कसर छोड़ना नहीं चाहते। संभ्रांत घरों के बच्चे अब उसी खेल में दिलचस्पी लेते हैं, जिसमें जॉब हो या पैसा! गुल्ली-डंडा, सितौली, चोर-सिपाही जैसे खेल बकवास-सरीखे हो चले हैं। ये खेल अभिभावकों के लिए अब महज वक्त-बर्बादी से अधिक कुछ भी नहीं हैं। इस लोक-बदलाव ने खेलों से जुड़ीं कहावतों की न सिर्फ दिशा बदली बल्कि उनके ‘भाव’ में भी आमूल-चूल परिवर्तन कर दिया है। उदाहरण देखिए, वर्षों पहले तक एक कहावत बहुत प्रचलित थी-‘खेलोगे-कूदोगे; बनोगे खराब/पढ़ोगे-लिखोगे; बनोगे नवाब!’ यह कहावत तब तक; सटीक थी, जब तक खेल-संस्कृति को विकसित करने/उसे बढ़ाने केंद्र और राज्य सरकारों के पास कोई योजना नहीं थी, बजट नहीं था। अब स्थितियां बदल चुकी हैं। सो यह कहावत भी अब भाषाई संस्कृति का जीवाश्मभर रह गई है। लेकिन इस बदलाव के उपरांत कमाने-धमाने के खेलों की फेहरिस्त में परंपरागत और भारतीय गली-कूचों में विकसित गुल्ली-डंडा टाइप खेल सम्मिलित नहीं किए गए। क्रिकेट जैसे धनाढ्य और संभ्रांत खेल ने बाकी खेलों की दुर्गति करके रख दी। हॉकी, फुटबाल, जूडो जैसे कुछेक खेलों पर सरकार की कृपादृष्टि अवश्य बनी, लेकिन ये आज भी कुपोषण से जूझ रहे हैं।
संभव है कि अभी तक की सामग्री पढ़ने के बाद आपके जेहन में एक प्रश्न उठ सकता है कि; ‘ विषय जब परंपरागत और कभी लोकप्रिय रहे खेलों से संदर्भित है, तब इसमें पैसा कहां से यक्ष बनकर सामने आ गया?

मैं स्पष्ट किए देता हूं। हम जिन खेलों की दुर्गति की बात कर रहे हैं; उन्हें गर्त तक पहुंचाने के मूल में पैसा ही है। वजहें अवश्य तीन हैं, लेकिन सबकी पैदाइश धन से ही हुई है।

उदाहरण : क्रिकेट दीगर खेलों को खा गया। कारण इसमें पैसा अपार है। आपका बच्चा क्रिकेट में नेशनल स्तर तक भी पहुंच गया, तो समझिए कि; उसकी सरकारी जॉब पक्की। यदि वह इंटरनेशनल टीम का हिस्सा बन गया या आईपीएल जैसे महाआयोजनों में चुन लिया गया, तब तो धन्य और धान्य हो जाएंगे माता-पिता/परिवार/कुटुम्ब/समाज आदि-आदि। सितौली, या टेशु जैसे खेलों के रास्ते यह स्वप्न देखना निहायत वेबकूफी कहलाएगी।

दूसरी वजह पैसे ने भौतिक सुख-साधन से जुड़ीं वस्तुओं में इजाफा कर दिया है। तकनीकी क्षेत्र में तरक्की से वीडियो गेम्स को जन्मा। इस खेल में दिमागी कसरत है, लेकिन शारीरिक मशक्कत कतई नहीं। दूसरा इसमें सांस्कृतिक मेल-मिलाप के अवसर भी नगण्य हैं। घर में दिनभर बैठे-बैठे गेम्स खेलते रहिए बस; दोस्तों/यारों से खुले मैदान में प्रतिस्पर्धा की गुंजाइश धूल-धूसरित।

तीसरा कारण है ठेठ भारतीय समाज का ‘हाइजेनिक सोसायटी’में तब्दील हो जाना। इस अंग्रेजी शब्द ने कई नेशनल/मल्टी नेशनल कंपनियों को ‘तर’ दिया है, यानी उन्हें भारतवंशियों के बीच अपने प्रोडक्ट्स बेचने को अच्छा अवसर मुहैया कराया है। यदि आप टेलिवजन देखते हैं, तो ऐसे तमाम प्रोडक्ट्स के विज्ञापन भी देखें होंगे, जिनमें बच्चों को कीटाणुओं से कैसे बचाएं? बताया जाता है। मुझे कुछ प्रोडक्ट्स के उदाहरण देने में कोई संकोच नहीं। डिटॉल साबुन, सर्फ एक्सल जैसे बाथरूम प्रोडक्ट्स कीचड़ या माटी में सने-लदे बच्चों को स्वच्छ और कीटाणुमुक्त रखने का दावा करते हैं। यदि आपने गौर से देखा हो, तो ज्यादातर प्रोडक्ट्स के विज्ञापन में भी क्रिकेट या फुटबॉल जैसे गेम्स ही दिखाए जाते हैं। कहीं-कहीं कबड्डी जैसे खेल भी दिख जाते हैं।

कहने का तात्पर्य यह है कि; मौजूदा भारतीय व्यवस्था में अब हर अभिभावक अपने बच्चे को ‘नीट एंड क्लीन’ देखना चाहता है/रखना चाहता है। भारत में पुराने जितने भी खेल हैं, उनमें से ज्यादातर में खेलने की अनिवार्यता ‘धूल-धूसरित’ होना है। यानी आप सितौली खेल रहे हों, या कबड्डी अथवा टेशु; सभी में कहीं न कहीं माटी अवश्य सम्मिलित है। कहीं धूल उड़ती है, तो कई माटी हाथों/पैरों में सनती है।...और जिन खेलो में माटी बदन पर नहीं सनती, जैसे चोर-सिपाही आदि; उनमें कपड़ों की उज्जवलता खत्म होने का डर बना रहता है। चोर-सिपाही के खेल में बच्चे धड़ाम-से एक-दूसरे को थप्पी मारते हैं। कहीं-कहीं हंसी-ठिठोली में खींचातानी भी होती है, ऐसे में कीमती कपड़े फटने और गंदे हो जाने की ‘आशंका’ भी बराबर बनी रहती है।

अभिभावक भी चाहते हैं कि उनका बच्चा ग्राउंड में जाए तो क्रिकेट या टेनिस जैसे ‘कमाऊ’ खेल खेले और यदि वो घर पर है, तो शांति से कंम्पयूटर गेम या सांप-सीढ़ी में रमा रहे। इससे उनकी शांति में भी खलल नहीं होगा और न ही बच्चे गंदे होंगे, उनके कपड़े मैले-कुचैले होने की गुंजाइश रहेगी।

चिकित्सक भले ही राग अलापते हों कि; कम्प्यूटर और इसी किस्म के दूसरे इनडोर गेम्स से बच्चों का दिमाग तो तेज होता है, लेकिन शारीरिक विकास बिलकुल नहीं, लेकिन वे भी अपने बच्चों को बाहर खेलने से रोकते हैं। कथनी-करनी में यह अंतर भी खेलों को खाए जा रहा है।

लोग इस बात को अब स्वीकार करना ही नहीं चाहते कि; कंचा, चोर-सिपाही, पेड़ों पर चढ़कर खेले जाने वाले पुरातन खेल बच्चों की पाचन शक्ति बढ़ाने के साथ-साथ शारीरिक और मानसिक विकास में भी सहायक होते हैं। हालांकि ऐसे खेलो में बच्चों की रुचि कम नहीं हुई है, उन्हें रास्ते से भटकाया गया है।

अभिभावकों ने कभी यह नहीं सोचा कि; तमाम हाईजेनिक इंतजामों और मल्टी विटामिन्स/टॉनिक्स/च्यवनप्राश खाने के बावजूद उनका बच्चा बूढ़े-पुराने लोगों की स्टेमिना पैदा क्यों नहीं कर पाता? आधुनिकता का लबादा सिर्फ शहरी लोगों ने ही नहीं ओढ़ा है, गांव और देहात भी इससे अछूते नहीं हैं। गांवों से भी पुराने खेल ‘खल्लास’ होते जा रहे हैं। इसके पीछे अधुनातन होने को स्वांग भी है।

प्राचीन खेलों के पतन से कला और संस्कृति दोनों पर चोट

हर खेल के पीछे कोई कला और संस्कृति निहित होती है । यानी कला-संस्कृति और खेल तीनों के मिश्रण से ही जन्मती है जीवनशैली। कोई भी खेल ऐसा नहीं है, जो संस्कृति या कला से न जुड़ा हो। साइकिल का चक्का लकड़ी में फंसाकर घुमाने का खेल कहां से जन्मा? आप सोचकर बताइए? मैं ही बताए देता हूं। पहले के समय में कुम्हार बैलगाड़ी के पहिये(जिसे चाक कहा जाता था) को लकड़ी से घुमाकर घड़े, दीये, मटके आदि बनाता रहा है। बच्चों ने साइकिल के अनुपयोगी पहिये(स्टील रिम) में लंबवत लकड़ी फंसाकर रगड़ते हुए उसे घुमाने का हुनर पैदा किया। इस खेल से बच्चा बैलेंस सीखता है और दौड़ते रहने से कसरत भी होती है। बैलेंस करना एक कला है।
एकदम नई पीढ़ी की बात न करें, तो हममें से भी कइयों ने टेशु का खेल नहीं देखा होगा।
‘मेरा टेसू यहीं अड़ा, खाने को मांगे दही बड़ा!’ जैसे बोल अब मुश्किल से गांव-देहात में ही सुनने को मिलते हैं। शहरों के लिए तो यह खेल बेगाना हो चला है। किशोरियों का खेल नौत्ता तो गोया विलुप्तप्राय है। ये दोनों ही खेल भारतीय कला और संस्कृति के परिचायक रहे हैं।
आपको बता दें कि आश्विन मास में पितृ पक्ष लगते ही गांव-देहात में पंद्रह दिन तक लड़कियां नौत्ता खेल खेलती थीं। इस खेल में कच्ची दीवारों पर गोबर से देवी की मूर्ति बनाई जाती थी। उसका कौड़ियों और फूलों से श्रृंगार किया जाता था। फिर आरती कर प्रसाद बंटता था। अब तो गांवों में भी यह खेल देखने को तरस जाएंगे।
वहीं नवदुर्गा के बाद दशहरे से लेकर पूर्णिमा तक बच्चे टेसू-झांझी खेलते थे। इस खेल में लोकसंस्कृति के कई आयाम देखने और सुनने को मिलते रहे हैं। अब यह खेल भी लगभग लुप्त है।
इस जैसे तमाम खेलों में कोई न कोई ऐतिहासिक कहानी का बखान निहित होता था, यानी खेल-खेल में आप अपनी कला और सांस्कृतिक विरासत से भी रूबरू होते थे। मैं ‘थे’ शब्द इसलिए इस्तेमाल कर रहा हूं क्योंकि अब ये खेल कहीं दिख जाएं, ऐसी संभावना न के बराबर है।
बहरहाल, पैसे से जन्मी आधुनिक संस्कृति ने पुराने खेलों का जो बिगाड़ा किया है, वो अब शायद ही दुबारा दुरुस्त किया जा सकेगा।

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

पृथक बुंदेलखंड



-बुंदेलखंड मध्यभारत के दो बड़े राज्यों उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश में फैला एक विशाल पठारी इलाका है। यहां करीब 78 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में आबादी निवास करती है। यहां की 95 फीसदी आबादी तंगहाल है।

 -पिछले 5 वर्ष के दौरान बुंदेलखंड में करीब 5000 किसानों ने आत्महत्या की है। अधिकतर मामलों की वजह किसानों द्वारा कर्ज न चुका पाना है।

क्यों भाजपा-कांग्रेस को खा रहा ‘बंटवारे का डर’

 बिगड़ सकती है सियासी बुनावट, राजस्व हानि की भी चिंता

उत्तरप्रदेश विधानसभा में पारित चार राज्यों के प्रस्ताव(जिसमें बुंदेलखंड भी सम्मिलित है) ने सिर्फ यूपी नहीं; मध्यप्रदेश की राजनीतिक में भी हलचल पैदा कर दी है। दरअसल, यूपी के महज 7 जिलों की 32 विधानसभा क्षेत्रों मात्र से बुंदेलखंड प्रांत की परिकल्पना पूर्ण नहीं होती; इसमें मध्यप्रदेश के छह जिलों-दतिया, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, दमोह सागर को भी अंगीकार करना होगा। यदि ‘बुंदेलखंड प्रांत’ को आर्थिक दृष्टिकोण से भी सुदृढ करना है, तो इसमें प्रस्तावित जिले; जो सभी मध्यप्रदेश के खाते से जाएंगे-मुरैना, श्योपुर, भिंड, ग्वालियर, शिवपुरी, गुना और अशोकनगर को भी उसके नक्शे में जोड़ना होगा। भूख, बेरोजगारी और पानी से आकंठ त्रस्त ‘बुंदेलखंड’ यदि नये प्रांत का रूप अख्तियार करता है, तो इसके राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक नफा-नुकसान क्या होंगे? अमिताभ बुधौलिया की विशेष रपट...

  
‘यूपी में बहुत दम है!’ समाजवादी पार्टी के लिए अमिताभ बच्चन ने यह स्लोगन दिया था। ‘दमखम’ वाली इस यूपी में फिलहाल मायावती के एक फैसले ने राजनीतिक खलबली पैदा कर दी है। यहां सपा का तो पहले से ही ‘दम’ फूला हुआ था, अब कांग्रेस की भी हालात ऊपर-नीचे हो रही है। मायावती ने प्रदेश के चार टुकड़े करने का विधानसभा में जो प्रस्ताव पास कराया है, उसने मध्यप्रदेश की राजनीति में भी उबाल पैदा कर दिया है। दरअसल, बुंदेलखंड प्रांत की मांग वर्षों से चली आ रही है और अब मायावती के इस फैसले से इसे और अधिक बल मिला है। चूंकि मायावती के प्रस्तावित बुंदेलखंड में मध्यप्रदेश वे छह जिले सम्मिलित नहीं हैं, जिनके बगैर पृथक बुंदेलखंड प्रांत का सपना साकार नहीं होता। सो, मध्यप्रदेश में भी पृथक बुंदेलखंड पर बहस छिड़ गई है।

 भाजपा क्यों नहीं पृथक बुंदेलखंड की मांग के साथ...
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने पृथक बुंदेलखंड प्रांत की मांग को एक सिरे से खारिज कर दिया है। मध्यप्रदेश में आने वाले बुंदेलखंड अंचल के मंत्रियों का तर्क है कि; यदि नया राज्य बना, तो वह अपनी स्थापना से ही बीमार हो जाएगा। वे छोटे राज्य बनाने को औचित्यहीन मानते हैं। जल संसाधन मंत्री जयंत मलैया के मुताबिक;‘मप्र विधानसभा में पृथक बुंदेलखंड राज्य का प्रस्ताव पारित नहीं होगा।’ वहीं पंचायत और ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव तर्क देते हैं-‘संभावित राज्य बीमारी में ही पैदा होगा और बीमार ही बना रहेगा!’ कृषि मंत्री रामकृष्ण कुसमारिया भी कुछ ऐसा ही मानते हैं-‘बड़े राज्यों के निर्माण से ही विकास की संभावनाएं बलवती होंगी।’ ये तीनों ही मंत्री बुंदेलखंड से आते हैं और उनका तर्क बाजिव भी है, लेकिन नजरिया राजनीति से प्रेरित है। इसकी दो वजहें हैं पहला; वर्ष 2000 में मध्यप्रदेश से अलग हुए छत्तीसगढ़ बनने के बाद मध्यप्रदेश के विकास की रफ्तार मध्यम पड़ी है। दिलचस्प पहलू यह है कि छत्तीसगढ़वासी सम्मिलित मध्यप्रदेश में बेहद पिछड़े हालात का सामना कर रहे थे। चूंकि छग में मात्र 20 फीसदी आबादी ही शहरों में बसती है, ऐसे में ग्रामीण अंचलों का खूब दोहन/शोषण हुआ, वो भी तब; जब वहां भरपूर खनिज संपदा, पानी और वन हैं। छत्तीसगढ़ में34 प्रतिशत आबादी आदिवासियों की है, जबकि 12 प्रशित पिछड़े और 50 फीसदी लोग अन्य पिछड़ा वर्ग में शुमार हैं। यहां की 80 प्रतिशत आबादी खेती-किसानी और लघु उद्योगोें पर आश्रित है। पृथक राज्य बनने के बाद छग में जलसंसाधनों पर खूब काम हुआ है। छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है, जो इसकी आर्थिक उन्नति का सूचक है।

इसलिए भी चिंता बाजिव
विकास की गाथा जिन तीन चीजों-बिजली, पानी और सड़क से लिखी जाती है, उसमें छग सम्पन्न प्रांतों में शुमार है। बिजली उत्पादन के मामले में छग भारत के कुछेक गिने-चुने प्रांतों में शामिल है, जहां बिजली संकट जैसे शब्द सुनने को नहीं मिलते। वहीं स्टील, अल्युमिनियम, कोल माइन जैसी खनिज संपदा भी प्रचुरता में है। वन संपदा के मामले में भी छग बहुत सम्पन्न है। यहां कुल क्षेत्रफल के करीब 40 फीसदी में वन संपदा मौजूद है।
कहने का आशय यह है कि; मध्यप्रदेश और छग दोनों जगहें भाजपा की सरकारें हैं। दोनों ही प्रांतों में दूसरी मर्तबा भाजपा काबिज हुई है, लेकिन जब विकास की बात होती है, तो मध्यप्रदेश छग अलग होने के बाद से लगातार बिजली और पानी के संकट से जूझ रहा है। खनिज संपदा का भी ठीक से दोहन नहीं हो पा रहा है। बोले तो; मध्यप्रदेश स्वयं को छग अलग होने के बाद से पिछड़ा महसूस करने लगा है।
दूसरा मध्यप्रदेश के जिन छह जिलों को पृथक बुंदेलखंड में सम्मिलित किए जाने की बात हो रही है, वे भी खनिज संपदा के मामले में धनी हैं। उदाहरण के तौर पर अकेले पन्ना जिले से केंद्र सरकार को 700 करोड़ रुपए, जबकि मध्यप्रदेश सरकार को करीब 1400 करोड़ रुपए का राजस्व प्राप्त होता है। उल्लेखनीय है कि पन्ना पिछले 5000 सालों से हीरा खदानों के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है। यहां अब तक करीब 40 हजार कैरेट हीरा निकाला जा चुका है, जबकि अनुमान है कि 14 लाख कैरेट के भंडार अभी मौजूद हैं। वहीं सागर और छतरपुर में तांबा, राक और चूना पत्थर , दतिया में सीसा अयस्क और गेरू मिट्टी, टीकमगढ़ में बैराइटिस और अभ्रक, पन्ना में अग्निरोधी मिट्टी आदि की प्रचुरता है। बुंदेलखंड से प्राप्त ग्रेनाइट पत्थर की विदेशों में खासी मांग है। विशेषकर जर्मनी, जापान और इटली में इनका बड़े पैमाने पर निर्यात होता है। बांदा में बॉक्साइट का अकूत भंडार है। बुंदेलखंड के तालाबों की मछलियां कोलकाता में खूब बिकती हैं। यहां के जंगलों में मिलने वाला तेंदूपत्ता हरा सोना कहा जाता है। खजुराहो और दतिया जैसे पर्यटन स्थल सालभर लोगों को आकर्षित करते रहते हैं। बीना (सागर)में मध्यप्रदेश की संभवत: सबसे बड़ा उद्योग ‘तेल शोधक परियोजना’ तैयार हो चुकी है। इस पर करीब 6400 करोड़ रुपए व्यय हुए हैं। 60 लाख टन ली. क्षमता का यह तेल शोधक संयन्त्र भारत तथा ओमान सरकार के सहयोग से स्थापित हुआ है। अनुमान है कि दोनों राज्यों के बुंदेलखंड मिलकर लगभग 1000 करोड़ रुपए का राजस्व सरकार के खाते में जमा कराते हैं, लेकिन दुर्भाग्य इसका 10 फीसदी भी उस पर खर्च नहीं होता। यह ठीक वैसी स्थिति है जब छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश एक थे। छग कमाता था और मध्यप्रदेश बैठकर ऐश करता था। चूंकि अब कमाऊ बेटा न्यारा हो चुका है, सो मध्यप्रदेश नहीं चाहता कि बुंदेलखंड भी उससे मुंह मोड़ ले!
यानी दो टूक शब्दों में कहा जाए, तो यदि पृथक बुंदेलखंड प्रांत बनता है, तो मध्यप्रदेश के हाथ से खजाना निकल जाएगा। कारखानों की बात छोड़ दी जाए, तो ज्यादातर खनिज संपदा का सरकार से ज्यादा माफिया दोहन कर रहा है। यह भी बुंदेलखंड के पिछड़ेपन का एक बड़ा कारण है।

यह है राजनीतिक गणित
राजनीतिक दृष्टिकोण से ‘पृथक बुंदेलखंड प्रांत’ का प्रस्ताव एक अलग गणित पैदा करता है। चूंकि अगले वर्ष 2012 में यूपी में विधानसभा चुनाव हैं, सो मायावती को इससे निश्चय ही फायदा पहुंचने वाला है। जहां तक यूपी वाले बुंदेलखंड की बात की जाए, तो यहां से 4 सांसद और 32 विधायक चुनकर आते हैं। वर्ष 2007 के विस चुनाव में बसपा को 14 सीटें मिली थीं, जबकि सपा के खाते में पांच और कांग्रेस को महज 3 सीटों से संतोष करना पड़ा था। भाजपा यहां अपना खाता तक नहीं खोल पाई थी। निश्चय ही माया द्वारा फेंका गया बंटवारे का ‘मोह पांस’ उन्हें चुनाव में फायदा पहुंचाएगा।
लेकिन जब इस मुद्दे से मध्यप्रदेश को जोड़ा जाए, तो यहां वर्ष, 2013 में विधानसभा चुनाव हैं। वर्तमान में मध्यप्रदेश की कुल 231 विधानसभा सीटों में से 151 पर भाजपा(जनशक्ति के पांच विधायकों के विलय के बाद), 66 पर कांग्रेस, 7 पर बसपा, जबकि सपा के खाते में सिर्फ 1 सीट शामिल है। जहां तक मध्यप्रदेश के हिस्से वाले बुंदेलखंड की दलीय स्थिति देखी जाए तो छह जिलों दतिया, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, दमोह और सागर की कुल 30 विधानसभा सीटों पर 20 पर भाजपा, 7 पर कांग्रेस, जबकि सपा, बसपा के खाते में सिर्फ 1-1 सीटें आई हैं। एक सीट पर निर्दलीय का कब्जा है। यदि जातिगत जनंसख्या की बात की जाए, तो यूपी और मध्यप्रदेश दोनों के सम्मिलित बुंदेलखंड में पिछड़े और दलित वर्ग की बहुलता है। लाजिमी है, इसका चुनाव में सबसे अधिक फायदा बसपा को पहुंचने वाला है। सबसे अधिक नुकसान कांग्रेस को होगा। ऐसे में बसपा को छोड़कर कोई भी पार्टी नहीं चाहती कि; बुंदेलखंड प्रांत की मांग जोर पकड़े। अब तो कांग्रेस भी नहीं। यह बात और है कि दो साल पहले कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी जब प्यासे बुंदेलखंड का दर्द जानने दौरे पर थे, तब उन्होंने पृथक बुंदेलखंड की वकालत की थी।
उल्लेखनीय है कि इसी 28 जुलाई को राहुल गांधी के नेतृत्व में मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और यूपी के प्रभारी दिग्विजय सिंह, मध्यप्रदेश के प्रभारी बीके हरिप्रसाद और पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुरेश पचौरी प्रधानमंत्री से मिलने गए थे। इन्होंने मप्र और यूपी दोनों के संयुक्त केंद्रीय बुंदेलखंड विकास प्राधिकरण के गठन की मांग उठाई थी। इसके लिए उन्होंने 8000 करोड़ रुपए का विशेष पैकेज दिए जाने की बात भी की थी। हालांकि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह और यूपी की मुख्यमंत्री मायावती दोनों ने इसका विरोध किया था।

क्यों मुकरीं उमाश्री...
हालांकि मध्यप्रदेश सरकार अप्रैल 2007 में ‘बुंदेलखंड विकास प्राधिकरण’ का गठन कर चुकी है। इस प्राधिकरण को अब तक 1.17 करोड़ रुपए मिल चुके हैं। मार्च 2012 से पहले इतनी ही राशि और राज्य सरकार देगी, लेकिन इसमें अब थोड़ा पेंच है। दरअसल, बुंदेलखंड में खासा प्रभाव रखने वालीं पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती की भाजपा में वापसी शिवराज सिंह को रास नहीं आई है। ऐसे में अटकलें लगाई जा रही हैं कि वे ‘बुंदेलखंड विकास प्राधिकरण’ को और पैसा देने के मूड में नहीं हैं। इसकी एक वजह और है। उमा भारती ने जब ‘भारतीय जनशक्ति पार्टी’ का गठन किया था, तब उन्होंने पृथक बुंदेलखंड प्रांत की मांग को उचित ठहराया था। दिसंबर, 2009 में भाजश के प्रदेश अध्यक्ष अशोक त्रिपाठी ने कहा था-‘सुश्री भारती पृथक बुंदेलखंड राज्य की मांग उठाकर छोटे-छोटे नये राज्यों के गठन की मुहिम में शामिल हो गई हैं।’ श्री त्रिपाठी ने यहां तक कहा था कि; बुंदेलखंड के गठन की उम्मीद में पार्टी की एक इकाई गठित करने जा रहे हैं। उन्होंने दो टूक कहा था कि; उमा भारती ऐसी एक मात्र राजनेता हैं, जो पृथक बुंदेलखंड की मांग के जरिये क्षेत्र में वन और खनिज माफिया को समाप्त करना चाहती हैं।
लेकिन जून, 2011 को जैसे ही भाजश का भाजपा में विलय हुआ और इसके बाद उमा भारती को यूपी का प्रभार सौंपा गया, वे इस मुद्दे पर चुप हो गर्इं।

बड़ा अजीब तर्क
पृथक बुंदेलखंड के विरोध में कुछ और भी तर्क दिए जा रहे हैं। मध्यप्रदेश के कई नेताओं का कहना है कि उप्र और मप्र के बुंदेलखंड में काफी भिन्नताएं हैं, इसलिए इन्हें मिलाकर एक राज्य का निर्माण करना उचित नहीं है। इसमें सबसे बड़ी भिन्नता राजनीतिक स्तर पर है। अभी तक मध्यप्रदेश में दो दलों के बीच सीधी टक्कर होती है, जबकि उप्र में कई छोटे दल हैं। यदि यूपी का हिस्सा भी एमपी के बुंदेलखंड में मिल गया, तो बसपा भी यहां अपना प्रभाव जमा लेगी। कुछेक नेताओं का तर्क है कि मप्र में खदानें हैं, वन हैं, खनिज हैं; लेकिन उप्र में इसका अभाव है। इसके अलावा सांस्कृतिक स्तर पर भी विभिन्नताएं हैं। वैसे यह कितनी हैरान कर देने वाली बात है कि; जहां राहुल गांधी ‘केंद्रीय बुंदेलखंड विकास प्राधिकरण’ पर जोर देते हुए 8000 करोड़ रुपए के विशेष पैकेज की मांग उठा चुके हैं, वहीं अब कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दल ‘पृथक बुंदेलखंड’ के निर्माण को खर्चीला साबित करने पर तुले हुए हैं। दोनों दलों के नेताओं का तर्क है कि यदि अलग राज्य का गठन हुआ, तो इसके बुनियादी निर्माण पर करीब 2000 करोड़ रुपए खर्च होंगे। सबसे शर्मनाक बात यह है कि एम और यूपी के ‘संयुक्त बुंदेलखंड’ के विकास के लिए केंद्र सरकार विशेष पैकेज के नाम पर वर्ष 2009-2010 से लेकर अगले तीन सालों के लिए करीब 7266 करोड़ रुपए का बजट दे चुकी है। इसमें से यूपी के खाते में 3506 करोड़ और एमपी के हिस्से में 3760 करोड़ रुपए आए, लेकिन दुर्भाग्य इतनी बड़ी रकम मिलने के बावजूद किसी भी जिले की औसत विकास दर 14-14 प्रतिशत से ऊपर नहीं उठ पाई। इसकी सबसे बड़ी वजह रही भ्रष्टाचार।

बंटवारे का गणित
  • बुन्देलखंड-13 जिले (बांदा, चित्रकूट, हमीरपुर, झांसी, जालौन, ललितपुर, महोबा, उत्तर प्रदेश क्षेत्र से एवं छतरपुर, दमोह, दतिया, पन्ना, सागर, टीकमगढ़ मध्य प्रदेश से)।
  • ये हैं रोड़े-इस पथरीले इलाके में हमेशा पानी का संकट, सूखा, भुखमरी व किसान आत्महत्याओं की युगलबन्दी, कोई स्थायी उद्योग नहीं, कृषि नाम मात्र की, ज्यादातर ऊसर-परती व ऊबड़, खाबड़ जमीन, पलायन आय का अतिरिक्त कोई संसाधन नहीं है।
  • वन क्षेत्र-उत्तर प्रदेश के सात जिलों में अनिवार्य 33 प्रतिशत वन क्षेत्र के मुकाबले बांदा में 1.21 प्रतिशत वन क्षेत्र व अन्य की स्थिति, 21.6 प्रतिशत चित्रकूट अधिकतम से ज्यादा नहीं है। मध्य प्रदेश के 6 जिलों में छतरपुर, पन्ना इलाके में ही आंशिक वन क्षेत्र है वह भी ईंधन उपयोगी ही है।
  • खनिज सम्पदा- बुन्देलखण्ड के चित्रकूट मण्डल के चार जिलों में जिस गति से खनिज संसाधनों का दोहन हो रहा है। चाहे वन हो या पहाड़ उसे बचा पाने की रणनीतियां नहीं हैं। यही स्थिति मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ व छतरपुर की है। जहां सरकार ने आस्ट्रेलिया की एक कम्पनी को बेतहासा खनन के लिए पहाड़ों व नदियों के पट्टे कर दिए हैं।
  • कृषि क्षेत्र-विश्वबैंक की रिपोर्ट कहती है कि हमारे अध्ययन का उद्देश्य गरीबी के कारकों का पता लगाना था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में करीब 57 प्रतिशत पूर्वी व मध्य प्रदेश में 40 प्रतिशत उद्योग क्षेत्र है। जब कि बुन्देलखंड में तीन से चार प्रतिशत है। कृषि क्षेत्र बुन्देलखंड में 5 प्रतिशत और पश्चिमी उत्तर प्रदेश व पूर्वी क्षेत्र में 45 प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, असम तथा पश्चिम बंगाल के 300 गांवों का सर्वेक्षण करके जो तथ्य जुटाए गए हैं उसमें बुंदेलखंड भी शामिल था।
  • उद्योग-आजादी की औद्योगिक क्रान्ति को छोड़ दे तो यहां ऐसी कोई परियोजना नहीं आई है, जो लोगों को रोजगार दे सके। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इन्दिरा गांधी के जमाने में झांसी में बीएचईएल (भेल), सूती मिल के साथ बिजौली में औद्योगिक एरिया विकसित किया गया था। आज भेल को छोड़कर अधिकांश उद्योग बंद हो चुके हैं। बरूआसागर का कालीन उद्योग, रानीपुर के करघे चरमरा गए हैं, मऊरानीपुर का टेरीकाट गरीबों से बहुत दूर हो चुका है, चित्रकूट की बरगढ़ ग्लास फैक्ट्री, बांदा का शजर व बुनकरी उद्योग और कताई मिल फैक्ट्री के हजारों मजदूर परिवारों सहित पलायन कर गए हैं।
  • नदियां- गंगा, यमुना, वेत्रवती, केन (कर्णवती), पहूज, घसान, चंबल, बेतवा, काली सिंघ, मंदाकिनी, बागै यहां की सदानीरा नदियां रही हैं, जिन पर आश्रित रहती है बुन्देलखंड की कृषि।
  • बड़े बांध या विनाश परियोजनायें-केन बेतवा नदी गठजोड़ राष्ट्रीय परियोजना बांध प्रयोगों के प्रयोगशाला क्षेत्र स्वरूप बुन्देलखण्ड के लिये प्रस्तावित है। परियोजना की डीपीआर रिपोर्ट के अनुसार 22.4 करोड़ रुपए 31 मार्च 2009 तक खर्च हो चुके हैं जबकि इसकी कुल प्रस्तावित धनराशि 7,614.63 रुपए (सात हजार छ: सौ पन्द्रह करोड़ रुपए) है। 90 प्रतिशत केन्द्र अंश व 10 प्रतिशत राज्य सरकार के अनुदानित कुल 806 परिवारों के विस्थापन वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार और 10 गांवों के पलायन की पुरोधा है यह परियोजना। परियोजना क्षेत्र में दौधन बांध एवं पावर हाउस 2182 हेक्टेयर भूमि में बनाया जाना है। इस योजनान्तर्गत 4317 हेक्टेयर कृषि जमीन नहरों के प्रबन्धन पर खर्च होगी। केन बेतवा नदी गठजोड़ परियोजना के अन्तर्गत छह परियोजनाओं व नहरों के विकास में 6499 हेक्टेयर भूमि किसानों से अधिग्रहीत की जानी है। बुन्देलखंड के पर्यावरण विद, सामाजिक कार्यकर्ता, संगठनों ने परियोजना प्रस्ताव के समय से लेकर आज तक इसका विरोध ही किया है। इसके अतिरिक्त बुन्देलखण्ड में 3500 किलोमीटर लम्बी नहरें, 1581 नलकूप भी स्थापित हैं।
  • तालाबों की तबाही- टीकमगढ़, छतरपुर, महोबा के विशालकाय सागर जैसे तालाबें और चन्देलकालीन जलस्रोतों की दुर्दशा किसी से छुपी नहीं है। मिटते हुए जल संसाधन बुन्देलखण्ड में सूखा जनित आपदाओं के प्रमुख कारण हैं।
  • खनिज दोहन- बुन्देलखण्ड में यू तो हीरा, सोना, ग्रेनाइट, अभ्रक, बालू, रेत, सागौन, शजर, लौह अयस्क भण्डार (छतरपुर), यूरेनियम के अकूत भण्डार हैं। यहां की खनिज सम्पदा से उत्तरप्रदेश के बुन्देलखण्ड वाले सात जनपदों से ही 510 करोड़ रुपए का वार्षिक राजस्व उत्तर प्रदेश सरकार को प्राप्त होता है और राज्य सरकारों को सभी खनिज सम्पदाओं के दोहन से 5000 करोड़ रुपए राजस्व मिलता है, लेकिन बेतहासा खनिज दोहन बुन्देलखण्ड के स्थायी विकास और राज्य की अवधारणा में बाधक साबित होने के मजबूत तथ्य हैं।
  • बिजली प्लांट- झांसी के पास पारीछा वियर में ही विद्युत संयत्र से 660 मेगावाट बिजली उत्पादन होता है। अन्य हिस्सों में बिजली संयत्र स्थापित नहीं किये जा सके हैं।

कहां है बुंदेलखंड
  • यूपी में कानपुर से दक्षिण की तरफ जाते ही यमुना पार करने पर बुंदेलखंड शुरू हो जाता है। इसका विस्तार यूपी के सात और एमपी के छह जिलों में है। ये जिले हैं झांसी, चित्रकूट ,बांदा, हमीरपुर, महोबा, जालौन और ललितपुर (यूपी में), दतिया, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, सागर और दमोह (एमपी)। बुंदेलखंड का यूपी में पड़ने वाला यानी उत्तरी हिस्सा समतल मैदान है। लेकिन जैसे जैसे दक्षिण की तरफ बढ़ते हैं, पथरीली जमीन बढ़ती है। इसके प्रमुख शहर हैं झांसी और सागर।
 कब मुख हुई पृथक बुंदेलखंड की मांग
  • -आजादी के पहले से ही बुंदेलखंड निर्माण के लिए आंदोलन का सूत्रपात हो गया था। ओरछा नरेश वीर सिंह देव ने 1941 में प्रांत निर्माण के पूर्व इस क्षेत्र की सांस्कृतिक एकता के अभिलेखीकरण पर जोर देते हुए पं.बनारसी दास चतुर्वेदी, यशपाल जैन, कृष्णानंद गुप्त, अंबिका प्रसाद, दिव्या आदि साहित्यकारों को कुंडेश्वर में आमंत्रित कर रूपरेखा बनाई थी।
  • वर्ष 1953 में जब न्यायमूर्ति फजरत अली की सदारत में पहला राज्य पुनर्गठन आयोग गठित हुआ, तो उसके सामने भी बुंदेलखंड राज्य निर्माण का प्रस्ताव आया।
  • आयोग के एक सदस्य केएम पणिक्कर ने बुंदेलखंड क्षेत्र के एकीकरण की आवश्यकता अनुभव की। हालांकि उन्होंने इसे स्वतंत्र राज्य बनाने के बजाय आगरा राज्य बनाकर इसमें उत्तरप्रदेश से तत्कालीन झांसी डिवीजन तथा मध्यभारत से भिंड, मुरैना, ग्वालियर व शिवपुरी चार जिलों को सम्मिलित करने का सुझाव दिया था। सागर, पन्ना, दमोह, टीकमगढ़ व छतरपुर के बारे में उन्होंने मत व्यक्त नहीं किया। आयोग ने 30 सितंबर 1955 को जब अपनी रिपोर्ट को अंतिम रूप दिया तो उसमें पणिक्कर के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया गया।
  • बुंदेलखंड के निर्माण के लिए सर्वाधिक प्रभावी जनजागरण अभियान 1989 से 2001 तक स्व.शंकर लाल मेहरोत्रा के नेतृत्व में बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा की ओर से चलाया गया। इसकी स्थापना नौगांव मप्र में की गई थी, किंतु बाद में संगठन की सुविधा के विचार से मोर्चा का मुख्यालय झांसी लाया गया।
  • शंकरलाल मेहरोत्रा ने मप्र के पूर्व मंत्री बिट्ठल भाई पटेल (सागर), राजा बुंदेला (ललितपुर-मुंबई), मुकुंद कुमार गोस्वामी (चरखारी), सुरेश (दमोह), हरिमोहन विश्वकर्मा (झांसी) आदि को जोड़कर जीवन के अंतिम क्षण तक बुंदेलखंड राज्य के लिए संघर्ष किया।
  • 1995 में शंकरलाल मेहरोत्रा के नेतृत्व में नौ आंदोलनकारियों ने सुरक्षा घेरा तोड़कर संसद में पर्चे फेंके थे। इस पर उन्हें दंडित किया गया। 1996 में हमीरपुर-महोबा के तत्कालीन सांसद गंगाचरण राजपूत ने लोकसभा में बुंदेलखंड प्रांत के निर्माण की मांग उठाई।
  • 1999 में शंकरलाल मेहरोत्रा ने 1997 में छोटे राज्यों की मांग करने वाले 12 संगठनों का झांसी में महासम्मेलन बुलाया। इसमें रालोद के अध्यक्ष अजित सिंह को संयोजक, पूर्व राज्यपाल मधुकर दिघे अध्यक्ष व शंकरलाल मेहरोत्रा महामंत्री बनाये गए।
  • शंकरलाल मेहरोत्रा का 20 नवंबर 2001 को निधन हो गया। इसके बाद विधायक बादशाह सिंह ने बुंदेलखंड इंसाफ सेना बनाकर पृथक राज्य के लिए सशस्त्र संघर्ष छेड़ने तक की घोषणा कर डाली, लेकिन बसपा में शामिल होने के बाद उनके तेवर ठंडे पड़ गये। यही हश्र गंगाचरण राजपूत का हुआ, जब वे सपा में शामिल हो गये थे लेकिन बसपा में आने के बाद उन्होंने फिर पृथक राज्य की चर्चा शुरू कर दी।
  • राजा बुंदेला ने हाल में बुंदेलखंड कांग्रेस बनाकर पृथक राज्य के मुद्दे पर विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान किया है, हालांकि उन्हें कोई गंभीरता से नहीं ले रहा। शिवप्रकाश सिंह कल्लू भैया ने बुंदेलखंड विकास मंच बनाकर हमीरपुर व जालौन जिले में युवाओं को पृथक राज्य के समर्थन में लामबंद किया।


‘बुंदेलखंड का असली स्वरूप मध्यप्रदेश का हिस्सा मिलाने से ही बनेगा। पन्ना, टीकमगढ़ आदि जिलों से बुंदेलखंड को राजस्व मिलता है। भौगोलिक,सामाजिक, सांस्कृतिक, पर्यटन, रीति-रिवाज आदि सब एक होकर बनने से बुंदेलखंड का महत्व है।

हरिमोहन विश्वकर्मा, पूर्व अध्यक्ष बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा

मंगलवार, 4 अक्तूबर 2011


रावण के अवतार सौ, एक अकेले राम

सदियां गुजर गईं, लाखों प्रयत्न व्यर्थ हुए, लेकिन रावण को मार पाना कभी संभव नहीं हो सका। रामयुग में भी रावण तमाम बुराइयों के अंश में लोगों के तंत्रिका तंत्र को उद्देलित करता रहा, सो कलयुग में उसे पराजित कर पाना कहां मुमकिन होगा? लंका जीतने के बाद मर्यादा पुरुषोत्तम राम भी रावण के दुष्प्रभावों से स्वयं को नहीं बचा पाए और सीता को परीक्षा से गुजरना पड़ा। ऐसी अग्निपरीक्षाएं कलयुग में नित होती हैं। कहे तों, राम रग-रग में बसते हैं/बहते हैं, लेकिन रावण हमारे तंत्र को प्रभावित करता है।


अमिताभ बुधौलिया

आदमी ताउम्र दोहरी भूमिका निभाता है-एक दिल से दूसरी दिमाग से। दिल भावनाओं का प्रतीक है, तो दिमाग संवेदनाओं का। दैनिक जीवन में भावनाएं और संवेदनाएं दोनों का बराबर प्रवाह होता है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम हमारी भावनाओं में बसते हैं। वे ऊर्जा बनकर नसों में बहते हुए दिल को पम्प करते हैं। राम आॅक्सीजन हैं, जो शिराओं में बहने वाले अशुद्ध रक्त को पवित्र करते हैं, तो धमनी के माध्यम से शुद्ध-संस्कार हमारे अंग-अंग तक प्रवाहित भी करते हैं। यानी राम हमारी शक्ति हैं-प्राण वायु हैं, लेकिन यह भी सत्य है कि मायावी शक्ति पाने का मोह आदमी के तंत्र को उत्तेजित कर देता है और यही से रावण जन्मता है।

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर/आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर।।

आदमी कितना भी कुछ अर्जित कर ले, धन-दौलत, यश-गान लेकिन वह मन से कभी नहीं अघाता। यह मानव की नियति है। यही नियति जब नीयत बन जाती है, तो आदमी सारी मार्यादाएं/भावनाएं भुलाकर घोर संवेदनशील बन बैठता है। यही से रावण पनपता है और हम जिंदगीभर रावणमयी संवदेनाओं की प्रसव पीड़ा भुगतते हैं।

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर/कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर।।


राम शक्ति हैं। हम मंत्र फूंक-फूंककर शक्ति जागृत करने का प्रयास करते रहते हैं। मंत्र का उच्चारण मन से होता है। मंत्र वायु हैं, और मन प्राण। प्राणों से निकली वायु हमारे ह्रदय में राम की प्राण प्रतिष्ठा करती है। मन एक मंदिर है और मंदिर पवित्र स्थल का प्रतीक। स्वाभाविक-सी बात है, जो मंदिर(मन) अपवित्र होगा; वहां राम कैसे विराजेंगे/बसेंगे? राम भावुकता के प्रतीक हैं, सो वे मानव को मझधार में नहीं छोड़ते, लेकिन ह्रदय में भी ठौर नहीं करते; किनारे बैठकर व्यक्ति के सारे पाप/पुण्य के लेख-जोख का विश्लेषण करते रहते हैं।

राम झरोखे बैठ के सबका मुजरा लेत/जैसी जाकी चाकरी वैसा वाको दैत।।

राम सदियों से जतन कर रहे हैं, हमारे भीतर ठीया किए बैठे रावण को मार गिराने का। वे प्राणों में शुद्ध वायु प्रवाहित कर रहे हैं, लेकिन रावण तंत्रिका तंत्र में बहते हुए हमारे मस्तिष्क को उत्तेजित करता रहता है। संभवत: योग से भी उत्तेजनाओं से उपजे हठ पर काबू पाना सरल नहीं है!

नाम भला-सा रख लिया, उल्टे सारे काम। रावण के अवतार सौ, एक अकेले राम।

जहां राम; वहां रावण कभी अप्रसांगिक नहीं हो सकता। यही शास्वत सत्य है। सतयुग में रावण के दस सिर थे, लेकिन कलयुग में ‘पहाड़ों-से’ गुणित हो रहे हैं।

अंक गणित-सी जिंदगी पढ़े पहाड़ा रोज, अपने ही धड़ पर लगे, अपना यह सिर बोझ।       (यश मालवीय)

रावण एक बोझ है, जिसे हम सदियों से ढोते आ रहे हैं। यह पाप की गठरी; गोया हमारी कुल जमापूंजी-सी वंश-दर-वंश स्थानांतरित होती रहती है। इस गठरी में हमारा अहम भरा है, द्वेष-स्वार्थ और तमाम व्यक्तिगत हित ठुंसे पड़े हैं। राम भावुकता के प्रतीक हैं, लेकिन रावण रूपी संवेदनाओं की अग्नि अकसर भावुकता को मोम-सा पिघला डालती है। भावनाओं की एक सीमा होती है, जैसे ही वह लक्ष्मण रेखा लांघती है, रावण (संवेदनाएं) उसका हरण कर लेता है। काम-लोभ और मोह की यह ‘अति’ हमारी मति भ्रष्ट कर देती है। यहीं से रावण जन्मता है।

जहां काम है, लोभ है और मोह की मार/ वहां भला कैसे रहे, निर्मल पावन प्यार।           (कुंअर बैचेन)


रावण हमारे मस्तिष्क में बैठा है, और लोक-तंत्र को अपने तरीके से संचालित कर रहा है। उसका अंत तभी संभव है, जब हम अपने मस्तिष्क पर नियंत्रण करना सीख जाएंगे।

रावण भी मर जाएगा, करिए एक जतन। दोनों को एक-रंग दो, करनी और कथन।।


सोमवार, 12 सितंबर 2011

बच्चों को बिगाड़ देती है बात-बात पर सजा




स्कूली बच्चों को पनिशमेंट


अमिताभ बुधौलिया

प्रदेश में स्कूली बच्चों को दंड देने के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं, वो भी तब; जब सरकार और प्रशासन इस मामले में कड़ा रुख अख्तियार कर चुका है। पिछले दिनों सीहोर के नौगांव में एक महिला शिक्षक ने छात्राओं के बाल काट दिए। छात्राओं को यह सजा इसलिए मिली क्योंकि वे घर से चोटी बनाकर नहीं आई थीं। सिर्फ चोटी बनाकर स्कूल न आना क्या कोई अपराध है? नि:संदेह नहीं, यह मामला स्वच्छता से संबंधित है। छात्राओं को सजा देने वालीं नौगांव स्थित इस सरकारी स्कूल की संविदा शिक्षक वर्ग-2 की मीता सिंह भी यही मानती हैं। ...और वे भी यही चाहती थीं कि छात्राएं साफ-सफाई का महत्व समझें, लेकिन दंड देने का तरीका गलत निकला।

वरिष्ठ अधिवक्ता कमलाकर चतुर्वेदी के मुताबिक, मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 की धारा 17(1) के अनुसार बच्चों को किसी भी तरह से शरीरिक दंड या मानसिक उत्पीड़न नहीं दिया जा सकता। इसमें बच्चों को मुर्गा बनाना, छड़ी आदि से मारना, बेंच या धूप में खड़ा करना या किसी कार्य करने को मजबूर करना इत्यादि पहलू शामिल हैं। धारा 17(2) के मुताबिक इसका उल्लंघन पाए जाने पर संबंधित व्यक्ति पर अनुशनात्म कार्रवाई की जाएगी।
सरकारी स्कूल भुगतेंगे खामियाजा: शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) से भले ही निजी संस्थानों के दरवाजे वंचित तबकों के लिए खुल गए हों, लेकिन इसकी भारी कीमत सरकारी स्कूलों को चुकानी पड़ सकती है। इसके शुरुआती संकेत इस साल पहली कक्षा में दर्ज बच्चों की संख्या में हुई कमी से मिलते हैं। भोपाल जिले के स्कूलों के सरकारी आंकड़ों और राजधानी भोपाल के ग्रामीण अंचलों की चुनिंदा स्कूलों के सर्वे से पता चलता है कि अभिभावकों का रुझान बड़ी तेजी से निजी स्कूलों की ओर हो रहा है।

हाल ए मध्यप्रदेश : प्रदेश के 50 जिलों में स्थित 22,387 निजी स्कूलों में एक लाख 70 हजार 987 सीटें वंचित तबकों के बच्चों के लिए रखी गई हैं। इनमें अब तक एक लाख चार हजार बच्चों को प्रवेश दिया जा चुका है। जानकार लोगों के अनुसार ये वे बच्चे हैं, जो अगर शिक्षा का अधिकार कानून नहीं होता तो निश्चित तौर पर सरकारी स्कूलों में प्रवेश लेते। इस तरह सरकारी स्कूलों से करीब एक लाख बच्चे सीधे-सीधे तौर पर बाहर हो गए हैं।

यह है प्रदेश की स्थिति : प्राथमिक स्तर पर क्षेत्रफल व आबादी के अनुसार राज्य के औसत से अधिक स्कूल टीकमगढ़, उमरिया, धार, झाबुआ, खरगोन, बड़वानी, सिवनी, मंडला, शहडोल, सीधी, सतना, रायसेन, डिंडौरी, अलीराजपुर जिले में हैं। माध्यमिक स्तर पर क्षेत्रफल व आबादी के अनुसार राज्य के औसत से अधिक स्कूल रीवा, सीहोर, बालाघाट, बड़वानी, बैतूत, खरगौन, सिवनी, सीधी, उमरिया, मंडला, सिंगरौली में हैं। जबकि पूर्व से ही प्राथमिक शाला के विरुद्ध माध्यमिक शालाओं का अनुपात अपेक्षाकृत भोपाल, उज्जैन, शाजापुर, उमरिया, होंशगाबाद, सीहोर, नीमच, बैतूल, सागर, मंदसौर, जबलपुर, नरसिंहपुर, देवास, कटनी, बुरहानपुर, दमोह, खंडवा, राजगढ़, रायसेन, सीधी, विदिशा में अधिक हैं।

राजधानी की पड़ताल : भोपाल जिले के सरकारी स्कूलों पर नजर दौड़ाएं तो इस साल पहली कक्षा में बच्चों की संख्या में छह फीसदी तक की कमी आई है। जिले के 1050 स्कूलों के आंकड़े बताते हैं कि वहां पिछले वर्ष पहली कक्षा में करीब 28 हजार बच्चों ने दाखिला लिया था। इस साल अब तक यह आंकड़ा सिर्फ 12 हजार तक ही पहुंच सका है। हालांकि अधिकारियों के अनुसार सभी स्कूलों से अभी पूरे आंकड़े आ नहीं पाए हैं, इसलिए इस संख्या में इजाफा होना लाजिमी है। लेकिन इसके बावजूद वे स्वीकारते हैं कि सरकारी स्कूलों में विद्याथिर्यों की संख्या में कमी तो आई है।

सर्वे से सामने आई हकीकत: भोपाल शहर के आसपास स्थित स्कूलों के सर्वे से भी पता चलता है कि सरकारी स्कूलों की हालत खस्ता हो चुकी है। भदभदा रोड स्थित गौरा गांव में स्थित सरकारी प्राइमरी स्कूल में पिछले साल 70 बच्चे थे। इस साल घटकर 59 रह गए हैं। और ये बच्चे भी कितने नियमित हैं, इसका अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि सर्वे के दौरान केवल 18 बच्चे ही स्कूल में उपस्थित थे। पड़ोस के बिसनखेड़ी गांव की प्राइमरी स्कूल तो दोपहर तीन बजे ही बंद मिली, जबकि उसे साढ़े चार बजे तक खुला होना चाहिए था। गांव के लोगों ने बताया कि जब स्कूल में बच्चे ही नहीं हो, तो शिक्षक भी रहकर क्या करेगा। इन गांवों के करीब ही अरुणोदय नामक निजी स्कूल में 150 बच्चे पढ़ते हैं। इसी तरह बरखेड़ीकलां की सरकारी स्कूल में 150 बच्चे पढ़ते थे। अब यहां 4 बच्चों के ही नाम दर्ज हैं। बीलखेड़ा की शासकीय स्कूल में 130 बच्चे पढ़ते थे। अब इस साल 90 बच्चे पढ़ रहे हैं।

बदलती मानसिकता, सक्रीय एजेंट: ग्रामीण इलाकों में शिक्षा के क्षेत्र में कार्य कर रहे एक स्वयंसेवी संस्था के अनुसार सरकारी स्कूलों के शिक्षक भी इस बात के लिए प्रेरित कर रहे हैं कि बच्चे सरकारी स्कूलों से निकलकर निजी स्कूलों में दाखिला दिलवाया जाए। संभवत: इसके लिए वे निजी स्कूलों के साथ साठगांठ भी कर रहे हैं, क्योंकि चूंकि निजी स्कूलों में 25 फीसदी बच्चों का खर्च सरकार देगी। वहीं शासकीय स्कूलों की अव्यवस्था की कमी का फायदा उठाते हुए एंजेट मोटा कमीशन लेकर बच्चों का दाखिला निजी स्कूलों में करवाने में अपना जोर लगा रहे हैं।
पैर पसारते निजी स्कूल : उत्तर प्रदेश, राजस्थान और महाराष्टÑ के बाद सबसे ज्यादा निजी स्कूल मप्र में ही हैं। यहां निजी स्कूलों की संख्या में इजाफा भी हो रहा है। डिस्ट्रिक्ट इंफार्मेशन सिस्टम फर एजूकेशन (डाइस) की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2008-09 में प्रदेश में जहां 22,989 स्कूलें थीं, वहीं वर्ष 2009-10 में यह संख्या बढकर 23,455 हो गई। यानी प्रदेश में हर रोज एक नई निजी स्कूल खोली गई।

निजी बनाम सरकारी स्कूल : प्रदेश में निजी स्कूलों की संख्या कुल स्कूलों में 17 फीसदी ही है, लेकिन शिक्षकों की संख्या 35 फीसदी से ज्यादा है। यही वजह है कि निजी स्कूलों में जहां प्रति स्कूल सात शिक्षक हैं, वहीं सरकारी स्कूलों में यह औसत 25 ही है। इसके अलावा ढांचागत सुविधाओं के मामले में भी सरकारी स्कूलों की स्थिति बदतर है। डाइस की रिपोर्ट के अनुसार केवल 25 फीसदी स्कूलों में ही बायस टयलट और 38 फीसदी स्कूलों में लड़कियों के लिए टायलट हैं। 43 फीसदी स्कूलों की ही बाउंड्री वल है, जबकि बिजली का कनेक्शन केवल 20 फीसदी स्कूलों में ही हैं।

कुछ ऐसे हैं मैदानी हालात: आंकड़ों पर गौर किया जाए तो शासकीय स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति लगातार कम होती जा रही है। इसका बड़ा कारण शासकीय योजनाओं का लचर रवैया और निचले स्तर तक योजनाओं का भली भांति प्रबंध ना होना पाना है। बच्चों को स्कूल का वातावरण और दी जाने वाली ना काफी सुविधाएं भी शिक्षा का अधिकार कानून पर भारी पड़ती दिखाई देती है। एमडीएम से लेकर यूनिफार्म और पुस्तकों का वितरण भी बच्चों को स्कूल का रुख कराने में पर्याप्त साबित नहीं हो रहा है। ऐसे में प्रदेश सरकार ने शिक्षा के लिए अपनी नीतियों में सभी विकल्प खुले रखे है।

अब बदलेंगे हालात, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं सामने आइं : ग्रामीण भारत में बच्चों की शिक्षा के लिए अब अंतरराष्ट्रीय कंपनियों ने पहल की है। अंतरराष्ट्रीय संस्था एमएसडी ने ‘सपोर्ट माइ स्कूल’अभियान के तहत भोपाल क्लस्टर में पहला स्कूल समर्पित करने के लिए भारत में कोका कोला और यूएन एचएबीआईटीएटी से हाथ मिलाया है। रायसेन रोड भोपाल पर आदमपुर के शासकीय प्राइमरी स्कूल का चयन ‘सपोर्ट माय स्कूल’ अभियान में हुआ है। सपोर्ट माय स्कूल अभियान में कोका कोल इंडिया, एनडीटीवी, यूएन हेबिटेड, केफ इंडिया, पियरसन इंटरनेशनल और सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस आर्गनाइजेशन के संयुक्त तत्वावधान में चलाया जा रहा है। एमएसडी अब कोका कोला इंडिया एनडीटीवी सपोर्ट माइस्कूल अभियान में शामिल होकर काम करेगा। देश में इस अभियान की शुरूआत अभियान (एनजीओ) कैंपेन एंबेसडर सचिन तेंलुकर ने जनवरी 2011 में की। इस अभियान का लक्ष्य भारत में 10 राज्यों और 14 क्लस्टरों के ग्रामीण और अर्धशासकीय स्कूलों की पुर्नसंरचना के लिए धन और सुविधाएं प्रदान करना है।
इस अभियान के अंतर्गत भोपाल क्लस्टर के 18 स्कूलों की पुनर्संरचना के लिए राशी प्रदान की जाएगी।
आदमपुर के सरकारी स्कूल में छात्र-छात्राओं के लिए अलग-अलग शौचालय, बेहतर और स्वच्छ जल आपूर्ति, खेल-कूद के सामान और लाइब्रेरी जैसी सुविधाएं प्रदान की गई हैं। इस तरह गांवों में बच्चों को स्कूल जाने के लिए प्रेरित करने में सहायता मिलेगी। यह ऐसा अभियान होगा जिसमें बच्चों को बेहतर माहौल में पढ़ने-लिखने का मौका मिलेगा। स्वाभाविक है कि जब बच्चों को माहौल अच्छा मिलेगा, तो वे तहजीब सीखेंगे, उदंडता नहीं करेंगे, सो उन्हें दंड भी नहीं मिलेगा।
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मध्यप्रदेश के स्कूलों की स्थिति
कुल शासकीय प्रायमरी स्कूलों की संख्या 83266
कुल शासकीय प्रायमरी स्कूलों में शिक्षकों की संख्या 193026
कुल शासकीय मिडिल स्कूलों की संख्या 27534
कुल शासकीय मिडिल स्कूलों में शिक्षकों की संख्या 78163
कुल बच्चों ने स्कूल छोड़ा 70316
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सीहोर जिले का ब्यौरा

कुल शासकीय प्रायमरी स्कूलों की संख्या 1443
कुल शासकीय प्रायमरी स्कूलों में शिक्षकों की संख्या 3398
कुल शासकीय मिडिल स्कूलों की संख्या 611
कुल शासकीय मिडिल स्कूलों में शिक्षकों की संख्या 1476
कुल बच्चों ने स्कूल छोड़ा 306
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भोपाल जिले का ब्यौरा

कुल शासकीय प्रायमरी स्कूलों की संख्या 837
कुल शासकीय प्रायमरी स्कूलों में शिक्षकों की संख्या 2676
कुल शासकीय मिडिल स्कूलों की संख्या 368
कुल शासकीय मिडिल स्कूलों में शिक्षकों की संख्या 1328



कुल बच्चों ने स्कूल छोड़ा 957

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बच्चों को शिक्षा अधिकार कानून के अंतर्गत सभी आदेशों का पालन किया जा रहा है। किसी भी तरह का संज्ञान मिलने पर अनुशनात्मक कार्रवाई की जाएगी। हाल में प्राप्त मामलों की जांच समिति गठित कर जांच करवाई जा रही है।

- मनोज झालानी, आयुक्त स्कूल शिक्षा



मंगलवार, 6 सितंबर 2011

इंसाफ की डगर पर बच्चों दिखाओ चलके

अमिताभ बुधौलिया

शकील बदांयुनी साहब का लिखा यह गीत बच्चों को इंसाफ का संदेश देता है, लेकिन क्या खुद बच्चों के साथ सही इंसाफ हो पा रहा है? इसी वर्ष फरवरी में मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के स्कॉलर होम पब्लिक स्कूल में फीस को लेकर बच्चे के बाल काट दिये गये थे। अगस्त माह में रायसेन जिले के ग्राम माखनी की प्राथमिक शाला में अध्ययनरत कक्षा 5वीं की छात्र रुचि लोधी, सुरभि एवं रोशनी लोधी को शिक्षक हरीराम विश्वकर्मा ने लाठियों से न सिर्फ बेरहम तरीके से पीटा; बल्कि इन्हें तीन घंटे कमरे में भी बंद कर रखा। सिंगरौली जिले के चितरंगी ब्लाक अंतर्गत झौंपो हाईस्कूल के 50 बच्चों ने 24 जुलाई को मानव अधिकार आयोग में मारपीट की शिकायत करते हुए आरोप लगाया है कि शिक्षक द्वारा बिना किसी कारण के प्रतिदिन उनकी पिटाई लगाई जा रही है। न केवल प्रदेश बल्कि पूरे देश में ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं, जहां जरा सी बात पर स्कूली बच्चों को अनुशासन के नाम पर शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है।

आखिर हम क्यों भूल जाते हैं कि एक नन्ही से जान के कोमल से मुलायम शरीर पर जब एक तमांचे या बेंत की मार पड़ती होगी तो उसके नाजुक दिल पर क्या बीतती होगी? जब एक हंसत-खेलते बच्चे को उसके दोस्तों के सामने बेइज्जत किया जाता होगा, तो उसके मासूम मन पर क्या असर पड़ता होगा? आखिर हम क्यों नहीं सोचते कि जब एक बच्चे को घंटों भूखा या धूप पर खड़ा रखकर तड़पाया जाता होगा तो कितनी जान रह जाती होगी उसमें? क्या होमवर्क ना करना या एक शैतानी करना इतना बड़ा गुनाह है जिसकी सजा मौत होती है? अगर मौत नहीं तो एक ऐसी सजा जिसका जख्म शरीर और दिल पर लिए वो बच्चा सारी जिंदगी जीता है और अंदर ही अंदर घुटता रहता है।

दरअसल हर बच्चे की मुठ्ठी में उसकी तकदीर होती है। हर एक बच्चे की आंखों में उम्मीदों की दिवाली जगमगाती है। उसकी आंखें आने वाली दुनिया का सपना संजोती हैं, तो फिर क्यों कई बार वो आंखे वक्त से पहले ही बंद हो जाती हैं, या फिर हमेशा-हमेशा के लिए इनमें दर्द और दहशत का साया तैरने लगता है?

शिक्षा संस्थानों में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं विशेषकर छोटे बच्चों के साथ अमानवीय व्यवहार, मारपीट और अनेक तरह की प्रताड़ना के मामले बड़े पैमाने पर सामने आ रहे हैं। ये हमें यह सोचने पर विवश करते हैं कि शिक्षण संस्थाओं में छात्रों और शिक्षकों के बीच किस तरह के संबंध होना चाहिए। क्या पढ़ाई-लिखाई, अनुशासन बनाए रखने के लिए शिक्षकों द्वारा छात्र-छात्राओं के साथ किया जाने वाला कठोर या यूं कहें कि अमानवीय व्यवहार सही माना जा सकता है? हालांकि ज्यादातर शिक्षक इस बात से भलीभांति वाकिफ हैं कि बच्चों के साथ मारपीट करना कानूनी दंडनीय अपराध है। बाल अधिकारों का अंतरराष्ट्रीय अधिनियम 1989 के तहत् बच्चों के अधिकारों को विस्तृत रूप से परिभाषित करते हुए जो प्रावधान किए गये हैं, उसे भारत सरकार ने स्वीकार करते हुए कहा है कि बच्चों को स्वास्थ्य तरीके और स्वाधीनता तथा गरिमापूर्ण परिस्थितियों में विकास करने का अवसर दिया जाएगा। बच्चे से तात्पर्य 18 वर्ष से कम के प्रत्येक मनुष्य से है। अनुच्छेद 28 और 29 के अनुसार बच्चे के व्यक्तित्व, प्रतिभाओं तथा मानसिक और शारीरिक योग्यताओं का पूर्ण विकास तथा स्कूल में अनुशासन लागू करने के तरीके बच्चे की मानवीय गरिमा के अनुकूल होना चाहिए. इसके बावजूद बहुत सारे स्कूलों में बच्चों के साथ मारपीट आम बात है। बच्चों को हिन्दी या अंग्रेजी बोलने पर प्रताड़ित करना, स्कूल में टिफिन नहीं खाने देना, आर्थिक दंड लगाना, दिनभर दीवार के कोने में या दरवाजे के बाहर खड़ा रखना, उकडूूं या मुर्गा बनाकर खड़ा करना, उठक-बैठक लगवाना, जरा-सी नाराजगी पर छात्र-छात्राओं को थप्पड़ मारना, ये आम शिकायत है।

दरअसल आज के शिक्षकों के सामने छात्र-छात्राओं को गुरु-शिष्य को परस्पर बांधे रखना सबसे बड़ी चुनौती है। आधुनिक संचार प्रणाली और एक-दूसरे से श्रेष्ठ दिखने, कुछ अलग करने तथा उच्छृंखलता भरे माहौल में शिक्षण संस्थाओं की कथित पवित्रता और अनुशासन को बनाए रखना शिक्षकों के लिए मुश्किल होता जा रहा है। दोष केवल उनका नहीं इसके लिए काफी हद तक शिक्षण प्रणाली और अभिभावक भी जिम्मेदार हैं। ऐसे में शिक्षण संस्थान में अपने आदेश का पालन न होते देख या फिर अनुशासन की पकड़ को कमजोर होता देख बहुत से शिक्षक विचलित हो जाते हैं और ऐसा कुछ कर बैठते हैं जो अनअपेक्षित/अमानवीय है।

इस संबंध में मैनेजमेंट गुरु अरिंदम चौधरी का संस्मरण याद आता है। अपने एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा था - मेरी शुरुआती पढ़ाई दिल्ली के एक बेहतरीन स्कूल में हुई। वहां शिक्षकों द्वारा विद्यार्थियों को थप्पड़ मारना आम बात थी। यहां तक कि चौथी-पांचवीं कक्षा के बच्चों की भी बेंत से पिटाई लगाई जाती थी। सौभाग्य से मैं इससे बचा रहा। हालांकि छठवीं कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते मैं उतना भाग्यशाली नहीं रहा। एक दिन स्कल्पचर की क्लास के दौरान जब मैं अपने एक मित्र के साथ सृजनात्मक मसले पर चर्चा कर रहा था कि तभी एक असिस्टेंट ने आकर मेरे सिर पर एक जोरदार चपत लगा दी। मैं गुस्से का घूंट पीकर रह गया। घर लौटने पर मैंने अपने पिता से कहा कि उन्हें इस मसले पर कुछ करना होगा। अगले दिन पिताजी मुझे स्कूल के प्रिंसिपल के पास लेकर गए और कहा कि वह नहीं चाहते कि उनके बेटे यानी मुझे स्कूल में शारीरिक दंड मिले। चर्चा करने के बाद यह तय हुआ कि अब से मेरी जेब में हमेशा एक पत्र रहेगा, जिसमें लिखा था कि यदि किसी टीचर को मुझसे कोई समस्या है तो वह इसकी लिखित शिकायत मेरे पिताजी से कर सकता है लेकिन मुझे स्कूल में कोई मारेगा नहीं। इस पत्र पर प्रिंसिपल आॅफिस की मुहर लगी थी। उसके बाद से इस स्कूल में किसी भी टीचर ने मुझे नहीं मारा। सच यह है कि किसी को (और खासकर स्कूल में बच्चों को) पीटकर हम अपनी शिक्षा की कमी को ही जाहिर करते हैं। यदि हम ऐसी दुनिया चाहते हैं जहां शांति हो, जहां सड़कों पर दंगे न हों और जहां लोग सहिष्णु हों और एक-दूसरे से प्यार करें, तो हमें अपने बच्चों को स्कूल के शुरुआती जीवन से ही शांति, प्यार और सहिष्णुता के दर्शन कराने चाहिए।

अरिंदम एक शिक्षक के तौर पर कहते हैं कि ऐसा कोई कारण नहीं होता जिसके लिए किसी टीचर के लिए छात्र को क्लासरूम में या दूसरों के सामने मारना जरूरी हो जाए। यदि कोई शिक्षक अच्छा है और शिक्षण के प्रति समर्पित है, तो उसे पढ़ाने की प्रक्रिया में इतना आनंद आता है कि छात्रों के लिए भी यह मनोरंजक प्रक्रिया बन जाती है। अच्छे शिक्षक को कभी छात्रों के साथ समस्या नहीं होती। ये केवल उन शिक्षकों को ही होती है, जो खुद को सिद्ध करने के लिए शारीरिक दंड का शॉर्टकट तरीका अपनाते हैं। शारीरिक दंड बचपन में कभी कारगर नहीं होता।

जब शिक्षकों से इस संबंध में बात की जाती है, तो बहुत से शिक्षकों का तर्क होता है कि बच्चे यदि होमवर्क करके नहीं आते, समय पर स्कूल नहीं पहुंचते, पढ़ाई में ध्यान नहीं लगाते और स्कूल के अनुशासन को तोड़ते हैं तो उन्हें मारना लाजिमी है। ऐसे समय में उन्हें तुलसीदास की यह शिक्षा तुरंत याद आती है कि-भय बिन प्रीत न होये गोंसाई। किंतु वास्तविकता में बच्चे भी मारपीट करने वाले, हमेशा उलहाना देने या बेइज्जत करने वाले शिक्षक-शिक्षिकाओं का सम्मान नहीं करते। ऐसे शिक्षक/शिक्षिका के क्लास में आते ही बच्चों की आंखों में एक अलग किस्म की नफरत या भय का भाव होता है, जो शिक्षक के हटते ही उपहास या मजाक में तब्दील हो जाता है।

बच्चों के मनोविज्ञान को समझने वाले भोपाल के ख्यात मनोवैज्ञानिक डॉ. विनय मिश्रा कहते हैं कि हर बच्चा आइंस्टीन नहीं हो सकता। क्लास में पढ़ने वाले सभी बच्चों का आईक्यू लेवल अलग-अलग होता है. सभी बच्चों से एक-सी अपेक्षा करना ठीक नहीं है। वे नियमित रूप से पेरेंट टीचर मीटिंग पर जोर देते हुए कहते हैं कि यदि बच्चे से किसी भी प्रकार की शिकायत है, तो उसके अभिभावकों को सूचित कर उनके माध्यम से प्रॉब्लम को हल करना चाहिए। माह में एक दिन सभी अभिभावकों की मौजूदगी में मीटिंग होनी चाहिए।

इसी तरह शिक्षाविदें का मानना है कि शिक्षकों की समय-समय पर ट्रेनिंग होना चाहिए उन्हें यह बताया जाना चाहिए कि बिना मारपीट के भी अलग-अलग टेक्निक से बच्चों को पढ़ाया-लिखाया जा सकता है। कई बार बच्चे स्कूल में होने वाली मारपीट से अपने पूरे एटिट्यूट को नेगेटिव बना लेते हैं। कई बच्चे होमवर्क, पढ़ाई, परीक्षा आदि के भय से घर से भाग जाते हैं, कई बच्चे असफलता के कारण आत्महत्या कर लेते हैं।

बच्चों का अच्छी ढंग से लालन-पालन और शिक्षण माता-पिता और शिक्षकों के आपसी तालमेल से ही संभव है। बहुत सारे मां-बाप तो शिक्षकों को इस बात का अधिकार सहर्ष दे देते हैं कि उनके बच्चे मारपीट करें तो कोई मुरब्बत न करें, जरूरी पड़े तो अच्छी पिटाई भी करें। बहुत सारे मां-बाप प्रतिस्पर्धा के चक्कर में पड़कर अपने बच्चे को हमेशा हर क्षेत्र में अव्वल ही लाना चाहते हैं, तो दूसरी ओर कुछ अभिभावक अपने बच्चों की गतिविधियों को पूरी तरह नजरअंदाज कर उन्हें स्कूल, कॉलेज, छात्रावास के भरोसे छोड़कर निश्चित हो जाते हैं। नाबालिग बच्चों को मोबाइल, मोटरसाइकिल और बड़ी मात्रा में जेब खर्च देने वाले मां-बाप इस बात से बेखबर रहते हैं कि उनका बच्चा जिस संस्थान में पढ़ रहा है, वहां सभी बच्चे एक से नहीं हैं, बच्चों में यहीं से ऊंच-नीच, अमीर-गरीब और अहम् की भावना विकसित होती है। जरूरत इस बात की है कि शिक्षकों के साथ-साथ अभिभावक भी इस बात का ध्यान रखें कि उनका बच्चा किस तरह की अपेक्षा करता है, उसका व्यवहार कैसा है, उसकी वाजिब जरूरतें क्या हैं, वह पढ़ाई का कितना बोझ सह सकता है?

क्लास में सभी बच्चे फर्स्ट क्लास पास नहीं हो सकते। बच्चों को केवल डरा-धमका, मारपीट करके ही सुधारा नहीं जा सकता, बल्कि बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार रखकर उनकी बातों को धैर्यपूर्वक सुनकर उन्हें वे ही सुविधाएं, साधन उपलब्ध कराएं जो उनके व्यक्तित्व विकास, पढ़ाई-लिखाई और बेहतर नागरिक बनाने के लिए जरूरी हैं। यही नहीं उनके शिक्षकों के साथ नियमित संवाद अभिभावक की भी जिम्मेदारी है।

पश्चिमी देशों में बाल अधिकारों की रक्षा के व्यापक प्रबंध के बावजूद बच्चों में उद्दंडता बढ़ रही है, वे कक्षाओं में पिस्तौल चला रहे हैं, हिंसा की ओर उन्मुख हो रहे हैं, क्योंकि पारिवारिक विघटन और उपभोक्तावादी संस्कृति का प्रभाव उन्हें असहिष्णु बना रहा है। हमारे यहां अभी स्थिति इतनी दयनीय नहीं हुई है कि बाल अधिकारों की रक्षा के लिए माता-पिता, शिक्षक और रिश्तेदारों के लिए कठोर कानून की दरकार हो। आवश्यकता इस बात की है कि समाज, परिवार और विद्यालय के वातावरण को संवेदनशील, रचनात्मक और उत्तरदायित्वपूर्ण बनाया जाए। शिक्षकों को भलीभांति प्रशिक्षित किया जाए ताकि वे बच्चों में जिम्मेदारी की भावना विकसित कर सकें। माता-पिता, शिक्षक और बच्चे के बीच आत्मीय और विश्वसनीय संबंध स्थापित करने के बाद ही अच्छे परिणाम की आशा की जा सकती है। भारत में पश्चिम की तर्ज पर कानून बनाकर बाल-हिंसा नहीं रोकी जा सकती। जरा सोचिए, बच्चे की शिकायत पर यदि मां-बाप या शिक्षक जेल भेजे जाने लगे तो हमारी परिवार-व्यवस्था और शिक्षा का क्या हश्र होगा? बच्चे बोझ लगने लगेंगे। न कोई संतान को जन्म देना चाहेगा और न ही कोई शिक्षक बनना चाहेगा। निश्चय ही बच्चों के प्रति हिंसा रोकी जानी चाहिए और उन्हें वे सारी सुविधाएं मिलनी चाहिए जिससे वे जिम्मेदार नागरिक बन सकें। लेकिन भारत में शिक्षक और अभिभावक के सम्मान को दरकिनार कर सिर्फ कानून के बल पर इस लक्ष्य की प्राप्ति संभव नहीं।

दरअसल हमें कानून से अधिक ऐसे व्यवहारिक प्रयोगों की जरूरत है, जो स्कूलों में शारीरिक दंड की प्रक्रिया को पूरी तरह रोक दे। स्कूल का काम बच्चों की जिंदगी संवारना है, बर्बाद करना नहीं। हां, स्कूल में कुछ ऐसे बच्चे भी आते हैं, जिनका रवैया नकारात्मक और अनुशासनहीन हो सकता है। टीचर में यह क्षमता होनी चाहिए कि वह उनके बर्ताव को बदल सके। हां, यदि टीचर छात्रों को बदलने के लिहाज से समुचित रूप से प्रशिक्षित न हो और बच्चा बहुत उद्दंड और बिगड़ैल हो तो टीचर ज्यादा से ज्यादा यही करे कि उस बच्चे को उसके माता-पिता या कानून अनुपालकों को सौंप दे। लेकिन न तो हमारे स्कूल जेल हैं, न बच्चे मुजरिम और न ही टीचर खुद पुलिस है जिसे बच्चों को शारीरिक रूप से दंडित करने का कोई कानूनी अधिकार दिया गया हो।

अच्छा टीचर वही है, जो मानता हो कि उसका काम शिक्षा के जरिए बच्चों को बेहतर इंसान बनाना है। वह मानता हो कि उसका काम बच्चों को यह भरोसा दिलाना है कि वे क्लास के अंदर जो भी सीखेंगे, उससे उनका जीवन बदलेगा और वे बेहतर इंसान बनेंगे। बच्चों के व्यक्तित्व को निखारने के लिए स्रेह और कोमल स्पर्श की आवश्यकता होती है। उन्हे डांटकर या अपमानित करके गलती करने का एहसास नहीं कराया जा सकता। कड़ी या अपमानजनक सजा देने के बजाय उन्हे सुधारने के इंटेलिजेंट और क्रिएटिव तरीके अपनाएं जाने चाहिए जिससे बच्चे सही और गलत के वास्तविक अंतर को समझ पाएं।







शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

एक-दूसरे को टोपी पहनाना छोड़िए जनाब

टट्टू बनकर जीने की आदत छोड़िए जनाब।

संड़ाध मारते नालों की धारा मोड़िए जनाब।

कब तक कहोगे, जो हुक्म मेरा आका।

बात-बेबात दुम हिलाना छोड़िए जनाब।

शुतुरमुर्ग बनने से न बदलेगी तस्वीर कभी।

पत्थर उठाइए, पाप का मटका फोड़िए जनाब।

मिल-बैठकर निकलता है समस्याओं का हल।

एक-दूसरे को टोपी पहनाना छोड़िए जनाब।

अमिताभ बुधौलिया

मंगलवार, 16 अगस्त 2011

दंड बनाए उदंड, सो प्यार से पढ़ाएं

            अमिताभ बुधौलिया
यूं ही चलते-चलते एक बैनर पर लिखा दिखाई दिया ‘लर्न विदाउट फियर’। लाइन काफी अच्छी थी। उसे पढ़ते ही यह ख्याल आया कि काश हमारे स्कूलों में भी यही स्लोगन अपनाया जाता तो बच्चों के लिए स्कूल हौव्वा न बनकर सचमुच शिक्षा का मंदिग्र बन जाते। कुछ समय पहले महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा देश के 13 राज्यों में कराए गए सर्वे में 63 प्रतिशत स्कूली बच्चों ने इस बात को माना था कि उन्हें स्कूल में शारीरिक दंड मिल चुका है। इनमें शासकीय के साथ-साथ निजी स्कूल के छात्र भी शामिल थे। विडंबना यह कि जब तक कोई गंभीर परिणाम सामने न आए स्कूल में मिलने वाले शारीरिक दंड में अभिभावकों की मौन स्वीकृति भी शामिल रहती है। यही नहीं कई बार तो बच्चे की स्कूल से आने वाली शिकायतों या फिर उसके कमजोर परीक्षा परिणाम के कारण अभिभावक घर में भी उसे शारीरिक दंड देते हैं। स्कूल और घर दोनों जगहों पर शारीरिक प्रताड़ना के चलते बच्चे या तो स्कूल छोड़ना बेहतर समझते हैं या लगातार पढ़ाई में पिछड़ते जाते हैं।
स्थिति पर गौर करें तो साफ नजर आता है कि आज वक्त की जरूरत है कि खुशनुमा माहौल में बच्चों को कुछ सिखाने की कोशिश की जाए न की उन्हें गलतियों के लिए बार-बार ह्यूमिलिएट किया जाए। ज्यादातर अभिभावक और शिक्षक शारीरिक दंड की पैरवी करते हुए कहते हैं कि दंड के बिना बच्चे अनुशासनहीन हो जाते है। यदि उनकी बात को सच भी माने तो क्या शारीरिक प्रताड़ना के अलावा दंड के अन्य विकल्प खोजे नहीं जा सकते। वर्तमान में स्कूलों में जिस तरह के दंड दिए जा रहे हैं उनसे स्टूडेंट्स में नेगेटिव फिलिंग आती है। इसकी जगह दंड के कुछ ऐसे विकल्प खोजे जाएं बच्चों के लिए कंस्ट्रक्टिव मैथड की तरह काम करे। मसलन यूरोपिय स्कूलों का उदाहरण ले तो वहां फेल होने की स्थिति में बच्चों को कम्यूनिटी सर्विस कराई जाती है। जैसे कि एक विषय में फेल होने पर उन्हें साल में 25 घंटे कम्यूनिटी सर्विस को देने होते हैं। सब्जेक्ट के अनुसार घंटे बढ़ा दिए जाते हैं। यहीं नहीं टारगेट पूरा होने पर उन्हें इसके लिए मार्क्स भी दिए जाते हैं।
केवल विदेश की बात नहीं हमारे देश में भी अब ऐसे उदाहरण देखने मिल रहे हैं, जहां बच्चों को मीनिंगफुल पनिशमेंट दिया जाता है। राजस्थान के कुछ स्कूलों में इसी तरह के क्रिएटिव पनिशमेंट के उदाहरण काफी सराहना पा रहे हैं। यहां लेट आने वाले बच्चों को गार्डनिंग में मदद करने को कहा जाता है। अगर स्टूडेंट्स आपस में झगड़ा करते हुए पाए जाते हैं, तो उन्हें जूनियर क्लास के बच्चों को पढ़ाना होता है।
मध्यप्रदेश की बात करें तो राजधानी भोपाल के कुछ प्रायवेट स्कूल में भी इस तरह के उदाहरण अब सुनाई देने लगे हैं। नेशनल कमीशन आफ प्रोटेक्शन आफ चाइल्ड राइट्स की ओर से कॉरपोरल पनिशमेंट को गंभीरता से लेने के बाद यहां भी इस सकारात्मक बदलाव के स्वर सुनाई दे रहे हैं।
एक प्रायवेट स्कूल में कार्यरत ममता मजूमदार कहती हैं हम बच्चों को पनिशमेंट देते हैं लेकिन उसका स्वरूप बदल गया है। मसलन यदि बच्चा ग्राउंड में कचरा फैलाता है तो उसे ग्राउंड से कचरा उठाकर डस्टबिन में डालने का दंड दिया जाता है। यही नहीं उसे इस बात का भी ध्यान रखना होता है कि जहां तक हो सके लंच ब्रेक में अन्य छात्र भी कचरा न फैलाए।
एक अन्य स्कूल की छात्रा जगमीत कौर बताती हैं कि उनकी स्कूल में होमवर्क पूरा न करके आने वाले या फिर एक ही प्रकार की गलती बार-बार दोहराने वाले छात्र को किसी मेधावी छात्र या छात्रा की करेक्टेड कॉपी से मिलाकर खुद अपनी कॉपी चेक करनी होती है। जगमीत के अनुसार जब एक बार उसने खुद अपनी कॉपी चेक की तो उसे अपनी की हुई गलती बहुत अच्छी तरह याद रही और आज तक उसने वह गलती दोबारा नहीं दोहराई।
एक अन्य प्रतिष्ठित और काफी महंगे माने जाने वाले स्कूल के शिक्षक शैलेन्द्र शर्मा कहते हैं कि ‘राइट टू एजूकेशन एक्ट’ के बाद क्लास में गरीबी रेखा के नीचे आने वाले छात्र भी शामिल हो गए हैं। ऐसे में कई बार अन्य छात्र उनका मजाक बनाते हैं। यहीं नहीं कुछ छात्र तो स्टडीज में अन्य छात्रों से काफी पिछड़े हुए भी होते हैं और इस कारण भी वह छात्रों की हंसी का पात्र बनते हैं। ऐसी स्थिति में छात्र का मखौल बनाने वाले छात्र को दंड के तौर पर स्टडीज में उस छात्र की मदद करने को कहा जाता है। इससे धीरे-धीरे ही सही उनके बीच एक समझ का विकास भी होता है।
प्रिटी पेटल्स प्ले स्कूल के संचालक शशिकुमार केसवानी कहते हैं कि फिजिकल और मेंटल पनिशमेंट केवल बच्चों में नकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। ये किसी भी तरह उनकी प्रगति का मार्ग प्रशस्त नहीं करता। यह दंड का काफी आउटडेटेड तरीका हो चुका है। इसकी जगह अब क्रिएटिव पनिशमेंट को अपनाया जाना जरूरी हो गया है। इससे न केवल बच्चे में पॉजिटिव रिजल्ट देखने मिलते हैं बल्कि वे अधिक जिम्मेदार भी बनते है।
दरअसल जब बच्चे को शारीरिक दंड दिया जाता है तो यह उसके संवैधानिक अधिकार का हनन है और यह तथ्य हमारी शैक्षणिक व्यवस्था को अच्छी तरह से आत्मसात करना ही होगा इसके विपरीत यदि उसे अनुशासन में लाने के लिए कुछ रचनात्मक तरीके अपनाए जाए तो यह उसका   विकास करने के साथ-साथ उसे एक अच्छा नागरिक बनाने में भी अहम भूमिका निभा सकते हैं।

सोमवार, 13 जून 2011

हमको राणाजी माफ करना



मियां मसूरी अत्यंत दु:खी थे,
चिंतन में थे, अंतर्मुखी थे।
मैंने पूछा-किस चिंता में खां?
मियां ने घूरा, बोले-
न कचोटो खामख्वाह।
मैं मुस्कराया-फिर भी;
क्यों हो परेशान, कुछ तो सुनाइए?
लो राणा भी छूट गया,
अब आप बताइए!
मैं बोला-गुस्सा थूकिये,
आप पान खाइए।
मियां चिल्लाये-ये आपको
क्या सनक चढ़ी है?
यहां सारा देश आतंकवाद से पीड़ित है
और आपको पान की पड़ी है?
मैं बोला-मियां, पान खाएंगे,
तो बेकार-के प्रश्न नहीं उठाएंगे
क्योंकि पान खोल देता है
बंद अकल का ताला..
और आपको ज्ञात हो जाएगा
कहां है दाल में काला।
वैसे भी राणाजी को पकड़कर
हमारा तंत्र क्या कर पाता?
अफजलजी, कसाबजी पहले ही बोझ हैं
एक और खर्चा जबरिया बढ़ जाता।
मियां बोले-हम में अमेरिका सा साहस कब आएगा?
मैं बोला- तब तक तो नहीं, जब तक सियासी सभाओं में ओसामा, ओसामाजी कहलाएगा।

  अमिताभ बुधौलिया

बुधवार, 8 जून 2011

बाबा की माया और जिज्जी के राम




अमिताभ बुधौलिया
मैं गुमठी पर पान चबा रहा था, सामने से मियां मसूरी  कुछ बड़बड़ाते-से आते दिखे। मैंने मुंह ऊपर उठाया, थोड़ी-सी पीक गटकी और तुरंत प्रश्न दागा-‘अमां खां! क्यों खामख्वाह बड़बड़ा रहे हो?’
 मियां ने आंखें तरेरीं-‘लेखक महोदय, आप मुंह उठाकर कुछ भी बक देते हैं!’
मैंने तुरंत पीक थूकी और मुस्कराया-‘मियां; मुंह तो इस खातिर ऊपर उठाया था, ताकि पान की पीक आपके वस्त्रों को खराब न कर दे।’ मियां ने व्यंग्य मारा-‘आपके प्रश्न से तो भला पीक थी!’
मैंने हैरानी जताई-‘मियां आपके कहने का आशय नहीं समझा?’ मियां ने आंखें घुमाईं  -‘आपके सवाल दिमाग खराब कर देते हैं, पीक तो सिर्फ वस्त्र ही गंदा करती!’
मैंने पलटवार किया-‘मियां; पीक-वीक की छोड़िये और अपने बड़बड़ाने का खुलासा कीजिए।’ मियां कुछ सोचते हुए बोले-‘लेखक महोदय; इस भारत में अब आगे क्या होगा...?’
 मैं बीच में लपका-‘महाभारत और क्या!’
 मियां ने मुझे घूरा-‘महोदय, आप शब्दों से खुराफात करना कब छोड़ेंगे?’ मैं गुनगुनाया-‘छोड़ेंगे न हम तेरा साथ हो साथी मरते दम तक...!’ मियां के अधरों पर शरारतभरी मुस्कान प्रकट हुई-‘ महोदय; आप शब्दों की जुगाली बंद कीजिए और तनिक स्पष्ट कीजिए कि; देश की राजनीति में इन दिनों जो कुछ चल रहा है, वो कहां तक ठीक है? बाबा के साथ रामलीला मैदान में जो बर्ताव हुआ, उससे मैं अत्यंत दु:खी हूं।’ मैंने दार्शनिक शैली अपनाई-‘मियां, रामलीला हो या महाभारत दोनों में हार/जीत का सूत्र हरि बोले तो; भगवान विष्णु के हाथों में था। रामायण में राम के रूप में तो; महाभारत में कृष्णा के अवतार में हरि ने रावण और कंस जैसे दुराचारियों को नेस्तनाबूत किया। अब कलयुग में बाबाजी राम और कृष्ण बोले तो; रामकृष्ण यादव दोनों का संयुक्त अवतार लेकर पैदा हुए हैं। बाबा योद्ध संन्यासी हैं, सो सियासत की महाभारत और मोहन-लीला दोनों में हुड़ दबंग-दबंग साबित होंगे।’
मियां ने जिज्ञासा व्यक्त की-‘लेखक महोदय; वो तो ठीक है कि; बाबा के शरीर में राम और कृष्ण दोनों की ऊर्जा निहित है, लेकिन मौजूदा सियासी महाभारत में उनका मुकाबला अपने ही अवतार यानि मोहन से है। गोया रजनीकांत की फिल्म रोबोट रियल लाइफ में चल रही हो।’
मैं समझाइश की मुद्रा में था-‘मियां; आप दुरुस्त फरमा रहे हैं, लेकिन आप इससे भली-भांति वाकिफ होंगे कि; सम्प्रंग के सरदार मनमोहन के सींग निकल आए हैं। वे सिंह की भांति जो दहाड़ मार  रहे हैं, उसके पीछे कौन हवा भर रहा है!’
मियां ने चिकोटी काटी-‘...महोदय; आप सटीक फरमा रहे हैं। रोबोट में नकली रजनीकांत शर्मिली उर्फ ऐश्वर्या राय के मोहजाल में फंस गया था और यहां हमारे प्यारे मोहन के मन और चक्षुओं पर सोनियाजी का मायाजाल पड़ा हुआ है।’
मैंने व्यंग्य मारा-‘...सही कहा; इसीलिए मनमोहन ने रामलीला मैदान को महाभारत स्थल बनाने में कोई शर्म नहीं की।’
मियां ने व्यंग्य मारा-‘लेकिन इस महाभारत में तो जूते भी चल रहे हैं।’ मैंने लोकतांत्रिक-दर्शन व्यक्त किया-‘जूते कहीं भी चल सकते हैं,
सभा  हो संसद!’ मियां ने व्यंग्यात्मक शैली अख्तियार की-‘महोदय; जूते और मायाजाल से याद आया कि; अब यूपी में क्या होगा?’ मैं मियां का आशय समझ गया था। मैंने इतना कहते हुए मुंह में एक पान और दबा लिया-‘जिज्जी की भाजपा में वापसी क्या रंग दिखाएगी; यह तो समय बताएगा, लेकिन इतना तय है कि माया मेम साब, जिज्जी और हमारे बड़बोले दिग्गी राजा का त्रिकोणीय मुकाबला देखने योग्य होगा। जिज्जी यूपी में रामराज्य ला पाएंगी या नहीं; यह अलग प्रश्न है, लेकिन वहां महाभारत के आसार साफ नजर आ रहे हैं। हे राम!’

सोमवार, 6 जून 2011

गड़बड़झाला, खूब घोटाला.





गड़बड़झाला, खूब घोटाला...
लोकतंत्र का बज गया बाजा...

मुंह खोला तो खैर नहीं है...
अंधेर नगरी, चौपट राजा।

कौन नहीं है भ्रष्ट तंत्र में!
निकल रहा सब ओर दिवाला।

किस-किस की गर्दन पकड़ोगे...
उजली खादी, पीछे काला।

बाबाजी न करो सियासत...
जिसका काम, उसी को साजा।

अनशन से अब होगा न कुछ...
करो क्रांति, थामो भाला।


अमिताभ बुधौलिया

शनिवार, 4 जून 2011

आसन से सिंहासन की ओर -अमिताभ बुधौलिया




मियां मसूरी बाहें चढ़ाए/सीना ताने आते दिखाई दिए। मैंने उन्हें आवाज दी-क्यों खां, लपर-झपर करत कहां जा रिये हो? मियां ने मुझे घूरा, फिर लरजती-गरजती आवाज में बोले-‘लेखक महोदय; दिल्ली जा रिया हूं...आप भी हमारे साथ तशरीफ लाएंगे?’ मैं भांप गया कि; मियां ने पलटवार किया है। मैंने तीर छोड़ा-‘अमां खां; दिल्ली तो दिलवालों की है, अब इस उमर में आप जैसे लोग वहां जाकर क्या करेंगे?’
मियां बिदक गए-‘लेखक महोदय, आप हर बात को हल्के में लेते हैं?’ मैंने व्यंग्य कसा-‘क्यों करूं...महंगाई ने कमर तोड़कर रख दी है, सो भारी-भरकम चीजें उठाने का साहस/दुस्साहस अब हमारे वश में नहीं है!’ मियां ने आखें तरेरी-‘महोदय, चीजों से मेरा मतलब उपभोग की वस्तुओं से नहीं; आपके नजरिये से है।’ मेरा लहजा थोड़ा मजाकिया हो चला-‘ क्यों खां, कहीं आप शशांत शाह के निर्देशन में बनी फिल्म चलो दिल्ली...देखने तो नहीं जा रहे?’ इस बार मियां का लहजा तल्ख था-‘महोदय, बेवजह भेजा फ्राय न कीजिए...!’ मैंने बीच में बात काट दी-‘अरे हां, याद आया...चलो दिल्ली वाले विनय पाठक की भेजा फ्राय-2 भी रिलीज होने वाली है।’ मियां उखड़ गए-‘महोदय, इस वक्त सारा हिंदुस्तान भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा है और आपको सिनेमा की पड़ी है।’
मैंने व्यंग्य-शब्द छोड़े-‘मियां, सिनेमा और करप्शन दोनों का भी गहरा नाता रहा है। सिनेमाई रंगों के पीछे भी कई बार काली कमाई छिपी रहती है।’ मियां थोड़े नरम पड़े-‘महोदय, आपका कहना एकदम बाजिव है, लेकिन इस वक्त मैं बाबा रामदेव के अनशन की बात कर रहा हूं।’
मैंने कटाक्ष शैली अख्तियार की-‘मियां क्या आपको लगता है कि; बाबा के आसन से शासन हिल जाएगा? वो भी तब जब; कालेधन के मामले में वे कांग्रेस के महासचिव दिग्गी राजा बयानबाजी कर रहे हैं कि; बाबा ने भी खूब काला-पीला किया है!’ मियां थोड़े चिढ़-से गए-‘आप कहना क्या चाहते हैं?’
मैंने काव्यात्मक शैली अपनाई-‘बोले तो; कीचड़ में खड़े होकर कीचड़ न उछालिये/हो सके तो अपने आप को बाहर निकालिए।’ मियां बिफर-से पड़े-‘महोदय, आप भी क्या आलतू-फालतू के तर्क लेकर बैठ गए?’ मैंने पलटवार किया-‘मैं कहां बैठा; अनशन में तो वे लोग भी बैठ गए हैं, जिनके दामन पर भी दाग लगे हैं!’ मियां सोच-विचार की मुद्रा में बोले-‘कहीं आप 1992 में अयोध्याकांड की आरोपी साध्वी ऋतंभरा और स्कॉटलैंड में बाबा को बतौर उपहार द्वीप देने वाले एनआरआई की बात तो नहीं कर रहे?’ मैंने कहा-‘मियां; बड़बोले दिग्गी राजा की बात पर भले ही विश्वास न करो, लेकिन रामदेव टोली के सही अहम सदस्य स्वामी अग्निवेश और गांधीवादी नेता अन्ना हजारे ने यह मामला उठाया है, तो मन आशंकित तो होगा ही?’
मियां ने तर्क दिया-‘इस देश में सबको अपनी बात कहने का अधिकार है, लेकिन यहां सबसे बड़ा मुद्दा कालेधन का है। अली हसन, ए. राजा, सुरेश कलमाड़ी, करीम मोरानी जैसी बीमारियों का उपचार तो होना ही चाहिए।’
मैं गंभीर हो उठा-‘मियां, आप की चिंता सौ टका सही है, क्योंकि भ्रष्टाचार से सारा देश त्रस्त है।’ मियां चिंतातुर थे-‘महोदय, कभी-कभार तो लगता है कि सारा सिस्टम ही भ्रष्ट है!’ मैंने चिकोटी काटी-मियां, सिस्टम भी तो हम हीं जैसे लोग बनाते हैं। मियां ने नजरें चुराई-‘इसीलिए करप्शन सिस्टम में घुलमिल चुका है।’ मैंने चिकोटी काटी-‘मियां, कहिए कि; करप्शन भी सिस्टेमिटक हो चला है।’ मियां ने प्रश्न दागा-‘आप मेरी एक जिज्ञासा का समाधान कीजिए?’ मैंने फौरन कहा-‘हां, हां, क्यों नहीं; आप एक क्या; 10 सवाल कीजिए!’ मियां ने पूछा-‘आप को क्या लगता है कि; रामदेव के अनशन के बाद काले कारनामों पर थोड़ा-बहुत अंकुश लग पाएगा या नहीं?’ मैंने आखिरी व्यंग्य तीर छोड़ा और आगे बढ़ लिया-‘मियां, रामलीला मैदान पर रामदेव की अनशन लीला क्या गुल खिलाती है, यह तो समय ही तय करेगा, लेकिन इतना अवश्य हुआ है कि बाबा के प्रयासों ने मन मोह लिया है। सो संभव है कि जनता-जनार्दन के योग से आसन पर बैठे बाबा आगे चलकर दिल्ली के सिंहासन पर बैठ जाएं।’

सोमवार, 9 मई 2011



गुब्बारों जितनी भी नहीं उड़ी
‘एक नागार्जुन’ की काव्य-कथा

कुछ लोग उन्हें जनकवि बाबा नागार्जुन का एक नया अवतार मानते हैं। हालांकि कुछ इस तुलना से पूरी तरह असहमत हैं। सहमति-असहमतियों के इतर यह सच है कि प्रदेश के दतिया नगर में रहने वाले फक्कड़ कवि जलेश की पांच किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। निर्धनता के काले अंधेरे में जीवनयापन करने वाले इस कवि को इस बात से कोई मलाल नहीं है कि उनका गुजारा बच्चों को गुब्बारे बेचने से होता है। अपनी गरीबी को अपनी कविता की ताकत बनाने वाले जलेश के बारे में डॉ. नीरज जैन की रपट...

आप शायद विश्वास नही करेंगे कि जनकवि बाबा नागार्जुन का एक अवतार या नया संस्करण मध्यप्रदेश के दतिया नगर में रहता है। अनेक संदर्भों में इस अद्भुत जनकवि के दर्शन इस प्राचीन और सांस्कृतिक परम्पराओं वाले नगर में अत्यंत सहजता से किये जा सकते हैं, जिसने हिंदुस्तानी जबान को बुंदेली परिधान पहनाकर भाषा की व्यंजक क्षमताओं के साथ शानदार अठखेलियां की हैं।
सिर पर उगे अनुशासनहीन छोटे-बडे सफेद बाल, श्याम वर्ण और पांच फुटीय वृद्ध व इकहरा शरीर जिस पर प्राचीन धरोहरों की याद दिलाते मलगुजे पैंट-शर्ट; इन सब पर पहाड़ियों जैसी छोटी-छोटी आंखों वाला यह शख्स पहली नजर में किसी दीन-हीन याचक सा लगता है तिस पर बलराम के हल जैसा ध्वजनुमा काष्ठ-उपकरण अपने कंधे पर उठाए नगर की गंदी, पिछड़ी, दलित बस्तियों में बच्चों को ‘फुकना’ (गुब्बारे) बेचते हुए अक्सर देखा जाता है। शायद जिसे शहरी सभ्यता अपने दरवाजे पर भी खड़े होने की अनुमति न दे या फिर लुप्त हो चुकी प्रजाति का प्राणी समझे, वही शख्स जब कवि गोष्ठियों में कविता सुनाता है तो आमजन क्या सुधी श्रोताओं का वर्ग भी अपनी आंखों पर विश्वास नहीं कर पाता। इसी कवि का पूरा नाम है हरप्रसाद रायकवार जलेश जो आज से चौरासी साल पहले उत्तर भारत की कहार (ढीमर) जाति के एक परिवार में पैदा हुआ, पानी से पेट भरना जिसका पुश्तैनी रोजगार रहा है।
आश्चर्य तब और बढ़ जाता है जब पता लगता है कि उनकी पांच किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं और तीन अभी प्रकाश्य हैं। इतनी ही रचनाएं इधर-उधर बिखरी हैं व 1944 से लेकर आज तक वे देश-प्रदेश के प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर छपते रहे हैं। बाबा नागार्जुन की तरह जलेश की रचनाधर्मिता आंचलिकता युक्त खड़ी बोली में तीखी चुुभन वाली बरछी की धार सी है जिसमें भीतर की कसक, बेचैनी, छटपटाहट और बाबा की तरह पर्दाफाश अभियान है। इस कारण ही वे व्यंग्योक्तियों के कवि हैं।
कवि जलेश का व्यक्तित्व गोष्ठियों या किताबों या पत्र-पत्रिकाओं में ही मुखर-प्रखर हो पाता है अन्यथा उनका अघोरी बाबाओं जैसा रूप ही उनके इर्द-गिर्द छाया रहता है। वे मोहल्ले के स्कूल के पास बैठकर बच्चों को गोली-बिस्कुट के साथ स्वनिर्मित खिलौने बेचते रहते हैं। स्कूल के बाद शहर की गलियों में गुब्बारे बेचते भी देखे जा सकते हैं। जहां उनकी तथाकथित दुकान सजती है वहीं गंदा नाला बहता रहता है, इतना ही नहीं घरों से फेंका गया कचरा भी उस विशुद्ध प्राकृतिक शॉपिंग-मॉल में एकत्रित किया जाता है। उनके शब्दों में अपना व्यापार जीवनयापन के लिए करते हैं और इसलिए भी कि हाथ-पांव-दिमाग सब चलता रहे। उनकी दृष्टि और रचनाशीलता में व्यर्थ कुछ नहीं जाता, एक तरफ भावनाओं की रिसाइकलिंग कर वे कविता रचते हैं तो दूसरी तरफ कबाड़ का विनिमय कर मुद्राएं। इस तरह आज के उपभोक्तावाद से लड़ने की उनकी यह निजी जिजीविषा है।
शाम के समय बलराम के हल जैसा एक ध्वज दण्ड उठाए जलेश गली-गली गुब्बारे बेचते हैं। गली-मोहल्लों के कृष्ण-कन्हैया उन्हें फुकना वाले बब्बा कहकर ही बुलाते हैं। कभी-कभी उनका नागार्जुनीय व्यक्तित्व युधिष्ठिर के प्रिय साथियों की जमात को सक्रिय करता है। दतिया रियासत का सांस्कृतिक पक्ष बेहद गौरवशाली रहा है। यहां पालकी ढोने वाले कर्मचारी को पलकया कहा जाता था। ऐसे ही एक पलकया बलीराम की पत्नी सरस्वती ने दिनांक 30 सितम्बर 1926 को हरप्रसाद जी को जन्म दिया। कविता लिखने का शौक बचपन से लग गया। उन दिनों दतिया के दीवान एनुद्दीन नाम के शख्स हुआ करते थे जो गजब के साहित्य प्रेमी थे। आये दिन गोष्ठियां-मुशायरे वगैरह आयोजित होते थे। हर प्रसाद जी भी इन्हें सुनने जाने लगे। शौक परवान चढ़ता गया तो अपना उपनाम भी रख लिया निषाद, जो कि उनकी जाति का सूचक था, फिर लगा कि जलेश ज्यादा सार्थक है तो जलेश रख लिया।

जमीन से जुड़ा कवि
जमीन से जुड़े जलेश का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत है- ‘सट्टा’ जिसने उन्हें अंचल में खूब ख्याति दिलाई। कुछ पंक्तियां हैं-

हम उसी देश के वासी हैं
जिस देश में सट्टा होता है
हर हाथ में चाकू होता है
हर हाथ में कट्टा होता है।
डाके पड़ते हैं ग्रामों में
चोरी हो भगवद् धामों में
घर की इज्जत घर के बाहर
लुटती है जहां विरामों में।
छुट्टा सांड़ों से बारी का
खुलकर चौपट्टा होता है।

यहां विरामों से जलेश का आशय होटलों आदि से है जो उनकी सपाट, स्वाभाविक संस्कारों वाली शैली का प्रमाण है। उनकी भाषा आखिरी आदमी की भाषा है जो अंग्रेजी के कुछ शब्दों को किसी भी दूसरी जुबां से ज्यादा पसंद करता है-

नर हो या बालक या नारी,
बहुतों को इसकी बीमारी
लकड़ी ला ललुआ लगा रहा,
लकड़ी ला लछिया बेचारी
ओपन क्लोज की पत्ती पर
आए दिन रट्टा होता है।

मंच से दूर
जलेश को कभी मंच नहीं मिला। लेकिन, पत्र-पत्रिकाओं में वे कई बार छपे। मुम्बई के पत्र ‘रंग’ और कानपुर के ‘सुकवि’ में जलेश की अनेक रचनाएं प्रकाशित हुर्इं। 1969-70 में रंग पत्र में कवियों को म्याऊं शब्द पर समस्या पूर्ति की चुनौती दी गई। जलेश की कविता को इसमें पहला पुरस्कार हासिल हुआ-

म्याऊं सुन मूषक, हिरण सुनकर छुपे दहाड़
मौन साध चुप मैं रहूं सुनकर उनकी झाड़।
सुनकर उनकी झाड़, कटाकट बजत बत्तीसी
चंद क्षणों को मिलत धूल में शक्ल-रईसी
व्यथित हुआ हूं, व्यथा-कथा मैं किसे सुुनाऊं
कवि जलेश नारीवश करता म्याऊं-म्याऊं।।
इसी तरह बे-पेंदी के लोटे पर उन्होंने समस्या की पूर्ति की-
कभी हाथ मत धोइये, दल-बदलू को मार
कवि जलेश यदि चाहते हो स्वदेश उद्धार।
हो स्वदेश उद्धार, धार पैनी से काटो।
जात रसातल देश, शेष बनकर आ डाटो।
करो पूर्ण कर्तव्य, भवन जन सुखद होइये
डुबो-डुबो बे-पेंदी लोटा हाथ धोइये।

फाग का उस्ताद
जलेश की अभिव्यक्ति की शैली अपने वर्ग की भाषा और उनके सरोकारों के निकट है। उनके द्वारा रचित फाग देखें-

फागें हैं खांडे-से पैनी, ज्यों लुहार की छैनी,
ठण्डे-तातें काटत छिन में दिन-दूनी सुख दैनी।
हास्य व्यंग्य श्रृंगार प्यार की सूदी बनी नसैनी,
कंय जलेश कछु-कछु तौ फागें मीठी जैसी फैनी।

साहित्यिक विचारों-आंदोलनों से अनभिज्ञ जलेश ने साहित्य जगत के दांव-पेचों को जानने-समझने में कोई रुचि नहीं ली। स्वांत: सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा की तर्ज पर जलेश के भाव जिस तरह उमडे कविता बन गये।

तिय कहीं लिपिस्टिक की लाली
पाउडर से अंग निखार रही।
पर कहीं महीनो में स्वकेश
कडुआ दे तेल संवार रही।
क्या कभी जार्जेट साड़ी से ,
गाढ़ा कर सकता होड़ सखे
क्या कर दूं भंडा-फोड़ सखे?

कवि की विडम्बना
कितनी बिडम्बना है कि जीवन के 84 बसंत देख चुके महाकवि का आज तक कोई अभिनंदन-सम्मान आदि नहीं हुआ। साहित्य की दुकानों से पेट पालने वाले किसी बुद्धिजीवी ने आज तक जलेश की कोई सुध नहीं ली। सच्ची बात यह भी है कि जलेश ने कभी भी अपने साहित्य को अपनी प्रतिष्ठा का विषय नहीं बनाया, वरना दतिया की जानी या अनजानी गलियों में फुकना (गुब्बारे) फुला-फुला कर बाल गोपालों के बीच अपना मन बहलाने वाले जलेश ने साहित्य के क्षेत्र में वह योगदान दिया है कि अनेक दलित-विमर्शकों को चुल्लू भर पानी ढूंढ़ना पड़े। उनके 85 वें बसंत-दर्शन पर मुझे उनके स्तरीय अभिनंदन की कामना है जो कि जलेश को बिल्कुल नहीं है।

नया नागार्जुन
गरीबी के बाद भी जलेश ने अपनी काव्य यात्रा को कृतियों का रूप दिया। उनकी प्रकाशित पांच काव्य कृतियां, जो उन्होंने 1955 से 1975 के मध्य लिखीं-

कहार उत्थान
दुधारा
युगल पच्चीसी
व्यंग्य बल्लरी
फाग मदन माल

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011


रावण के अवतार सौ, एक अकेले राम

सदियां गुजर गर्इं, लाखों प्रयत्न व्यर्थ हुए, लेकिन रावण को मार पाना कभी संभव नहीं हो सका। रामयुग में भी रावण तमाम बुराइयों के अंश में लोगों के तंत्रिका तंत्र को उद्देलित करता रहा, सो कलयुग में उसे पराजित कर पाना कहां मुमकिन होगा? लंका जीतने के बाद मर्यादा पुरुषोत्तम राम भी रावण के दुष्प्रभावों से स्वयं को नहीं बचा पाए और सीता को परीक्षा से गुजरना पड़ा। ऐसी अग्निपरीक्षाएं कलयुग में नित होती हैं। कहे तों, राम रग-रग में बसते हैं/बहते हैं, लेकिन रावण हमारे तंत्र को प्रभावित करता है।

अमिताभ फरोग

आदमी ताउम्र दोहरी भूमिका निभाता है-एक दिल से दूसरी दिमाग से। दिल भावनाओं का प्रतीक है, तो दिमाग संवेदनाओं का। दैनिक जीवन में भावनाएं और संवेदनाएं दोनों का बराबर प्रवाह होता है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम हमारी भावनाओं में बसते हैं। वे ऊर्जा बनकर नसों में बहते हुए दिल को पम्प करते हैं। राम आॅक्सीजन हैं, जो शिराओं में बहने वाले अशुद्ध रक्त को पवित्र करते हैं, तो धमनी के माध्यम से शुद्ध-संस्कार हमारे अंग-अंग तक प्रवाहित भी करते हैं। यानी राम हमारी शक्ति हैं-प्राण वायु हैं, लेकिन यह भी सत्य है कि मायावी शक्ति पाने का मोह आदमी के तंत्र को उत्तेजित कर देता है और यही से रावण जन्मता है।

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर/आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर।।

आदमी कितना भी कुछ अर्जित कर ले, धन-दौलत, यश-गान लेकिन वह मन से कभी नहीं अघाता। यह मानव की नियति है। यही नियति जब नीयत बन जाती है, तो आदमी सारी मार्यादाएं/भावनाएं भुलाकर घोर संवेदनशील बन बैठता है। यही से रावण पनपता है और हम जिंदगीभर रावणमयी संवदेनाओं की प्रसव पीड़ा भुगतते हैं।

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर/कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर।।

राम शक्ति हैं। हम मंत्र फूंक-फूंककर शक्ति जागृत करने का प्रयास करते रहते हैं। मंत्र का उच्चारण मन से होता है। मंत्र वायु हैं, और मन प्राण। प्राणों से निकली वायु हमारे ह्रदय में राम की प्राण प्रतिष्ठा करती है। मन एक मंदिर है और मंदिर पवित्र स्थल का प्रतीक। स्वाभाविक-सी बात है, जो मंदिर(मन) अपवित्र होगा; वहां राम कैसे विराजेंगे/बसेंगे? राम भावुकता के प्रतीक हैं, सो वे मानव को मझधार में नहीं छोड़ते, लेकिन ह्रदय में भी ठौर नहीं करते; किनारे बैठकर व्यक्ति के सारे पाप/पुण्य के लेख-जोख का विश्लेषण करते रहते हैं।

राम झरोखे बैठ के सबका मुजरा लेत/जैसी जाकी चाकरी वैसा वाको दैत।।

राम सदियों से जतन कर रहे हैं, हमारे भीतर ठीया किए बैठे रावण को मार गिराने का। वे प्राणों में शुद्ध वायु प्रवाहित कर रहे हैं, लेकिन रावण तंत्रिका तंत्र में बहते हुए हमारे मस्तिष्क को उत्तेजित करता रहता है। संभवत: योग से भी उत्तेजनाओं से उपजे हठ पर काबू पाना सरल नहीं है!
नाम भला-सा रख लिया, उल्टे सारे काम। रावण के अवतार सौ, एक अकेले राम।

जहां राम; वहां रावण कभी अप्रसांगिक नहीं हो सकता। यही शास्वत सत्य है। सतयुग में रावण के दस सिर थे, लेकिन कलयुग में ‘पहाड़ों-से’ गुणित हो रहे हैं।

अंक गणित-सी जिंदगी पढ़े पहाड़ा रोज, अपने ही धड़ पर लगे, अपना यह सिर बोझ। (यश मालवीय)

रावण एक बोझ है, जिसे हम सदियों से ढोते आ रहे हैं। यह पाप की गठरी; गोया हमारी कुल जमापूंजी-सी वंश-दर-वंश स्थानांतरित होती रहती है। इस गठरी में हमारा अहम भरा है, द्वेष-स्वार्थ और तमाम व्यक्तिगत हित ठुंसे पड़े हैं। राम भावुकता के प्रतीक हैं, लेकिन रावण रूपी संवेदनाओं की अग्नि अकसर भावुकता को मोम-सा पिघला डालती है। भावनाओं की एक सीमा होती है, जैसे ही वह लक्ष्मण रेखा लांघती है, रावण (संवेदनाएं) उसका हरण कर लेता है। काम-लोभ और मोह की यह ‘अति’ हमारी मति भ्रष्ट कर देती है। यहीं से रावण जन्मता है।

जहां काम है, लोभ है और मोह की मार/ वहां भला कैसे रहे, निर्मल पावन प्यार। (कुंअर बैचेन)

रावण हमारे मस्तिष्क में बैठा है, और लोक-तंत्र को अपने तरीके से संचालित कर रहा है। उसका अंत तभी संभव है, जब हम अपने मस्तिष्क पर नियंत्रण करना सीख जाएंगे।

रावण भी मर जाएगा, करिए एक जतन। दोनों को एक-रंग दो, करनी और कथन।।

गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

पतवार तो ढीली पड़ी....

पतवार तो ढीली पड़ी....
माझी भी बेहोश है...
बेफिक्र हैं सारे सिकंदर...
बस, व्यर्थ का ही शोर है!
सोचता हूँ...
भर लूं उड़ान...
डूबने से तो बेहतर है!
भगवान् भरोसे...
नहीं चलती जीवन की नय्या....
हमीं डुबोते उसको...
उसके हमीं खिवय्या!!!