शुक्रवार, 7 नवंबर 2008


बातों से नहीं होती बगावत कभी...
वक्त पल-पल बदलता है,
गिरगिट की तरह रंग बदलता है।
पैरों में नहीं होती ताकत उठाने की,
इंसान खुद-ब-खुद संभलता है।
कौन स्वार्थी नहीं इस दुनिया में...
कोई रिश्ते तो, कोई औकात बदलता है।
मां से महान नहीं है अगर कोई...
कृष्ण यशोदा के घर क्यों पलता है।
विवशता तो नाम है सिर्फ कहने की...
आस्तीन अपनी है, तो सांप क्यों पलता है।
बहुत ढूंढा हर तरफ एक बदनाम आदमी...
जो मिला, वही खुद को शरीफ समझता है।
परिवर्तन प्रकृति का नियम है, तो फिर...
सूर्य सदियों से पश्चिम में ही क्यों ढलता है।
बातों से नहीं होती बगावत कभी...
उठा पत्थर, खड़े-खड़े हाथ क्यों मलता है।
  • अमिताभ बुधौलिया 'फरोग'

4 टिप्‍पणियां:

arun prakash ने कहा…

शत प्रतिशत सही लिखा है आपने
बातों से नहीं होती ......और जो मिला .... की लाईनें सटीक हैं साधुवाद

अंकित "सफ़र" ने कहा…

acchi kavita hai

दिगम्बर नासवा ने कहा…

क्या बात है
मज़ा आ गया पड़ कर, बहुत अच्छा लिखा है, सही लिखा है

splendid ने कहा…

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