शनिवार, 10 अप्रैल 2010

मैं बेरोजगार हूँ

कल तक जो जान छिड़कते थे...
वे ढूंढने से भी नहीं मिलते!
अब कोई नहीं कहता...
दोस्त! मैं अब भी तुम्हारे साथ हूँ...
यह अजीब इतेफाक नहीं...
यह वो वक़्त है...
जब मैं बेरोजगार हूँ।

अमिताभ बुधौलिया 'फरोग'

3 टिप्‍पणियां:

boletobindas ने कहा…

यही सच है....कड़वा सच .... तभी कहा गया है कि अंधेरे में अपना साया भी साथ छोड़कर चला जाता है..इसलिए खुद को बुलंद कर फिर कुछ कर....हर कोई प्रबल भाग्यवान नहीं होता..

Udan Tashtari ने कहा…

यही दुनिया की रीत है भाई..क्या करियेगा!

nilesh mathur ने कहा…

waah! kya baat hai!