गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

पतवार तो ढीली पड़ी....

पतवार तो ढीली पड़ी....
माझी भी बेहोश है...
बेफिक्र हैं सारे सिकंदर...
बस, व्यर्थ का ही शोर है!
सोचता हूँ...
भर लूं उड़ान...
डूबने से तो बेहतर है!
भगवान् भरोसे...
नहीं चलती जीवन की नय्या....
हमीं डुबोते उसको...
उसके हमीं खिवय्या!!!

कोई टिप्पणी नहीं: