बुधवार, 6 जनवरी 2010

सुनील पाल (फिल्म निर्माता और निर्देशक ‘भावनाओं को समझो’)


‘भावनाओं को समझो’ मूवी देखिए, मजा आएगा
अमिताभ फरोग
‘स्टैंडअप कॉमेडियन’ से फिल्ममेकर बने सुनील पाल अपने प्रोडक्शन की पहली फिल्म ‘भावनाओं को समझो’ को लेकर काफी उत्साहित हैं। वे देशभर में फिल्म के प्रमोशन बाबत विजिट कर रहे हैं और सिने प्रेमियों से अपनी गुदगुदाने वाली शैली में आग्रह कर रहे हैं कि; हमारी ‘भावनाओं को समझो’ मूवी देखिए, बहुत मजा आएगा।

महाराष्ट्र के चंदनपुर में जन्मे सुनील पाल संभवत: ऐसे पहले स्टैंडअप कॉमेडियन हैं, जिन्होंने मंच से ऊंची छलांग मारते हुए फिल्म प्रोडक्शन में कदम रखा है। वे अपने ‘मल्टीपरपज टैलेंट’ की उपज ‘भावनाओं को समझो’ को लेकर अपनी भावनाएं व्यक्त करते हैं-‘वाकई यह बहुत अच्छी मूवी बन पड़ी है। मैं यह इसलिए नहीं कह रहा, क्योंकि मैं इसका प्रोड्यूसर/डायरेक्टर और राइटर हूं; आप मूवी देखना, बहुत मजा आएगा।’
सुनील की भावनाएं दर्शकों को कितना गुदगुदाएंगी? वे मूवी की खासियत बयां करते हैं-‘यह बेहद अनूठी फिल्म है। इसमें सिर्फ कॉमिक टच भर नहीं है, इसमें इमोशन है, ड्रामा है, एक्शन है...यानी आर्ट/क्राफ्ट एंड टेक्निक; हर पहलू से मूवी की बेहतर बुनावट हुई है। इसमें हमने मधुर संगीत भी संजोया है। श्रेया घोषाल, सोनू निगम, शान और सुनिधि चौहान जैसे फेमस सिंगर्स के नग्मे आपके कानों में रस घोल देंगे। यह बॉलीवुड की ऐसी इकलौती मूवी है, जिसमें एक-दो नहीं, 51 स्टैंडअप कॉमेडियंस आपको हंसा-हंसाकर लोटपोट कर देंगे। इसी विशेषता के कारण गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड के प्रतिनिधियों को मूवी के प्रीमियर पर आमंत्रित किया गया है। मुझे यकीन है कि; वो लोग हमसब की भावनाओं को समझेंगे और मूवी को गिनीज बुक में जगह मिलेगी।’
इससे पहले पाल वर्ष, 2007 में आई ‘बाम्बे टू गोवा’ में बस मालिक लाल का कैरेक्टर निभा चुके हैं। इस फिल्म में कॉमेडियन एहसान कुरैशी और राजू श्रीवास्तव भी मौजूद थे। स्क्रिप्ट की बेसिक थीम धन के पीछे भागभमभाग थी। फिर ‘भावनाओं को समझो’ में नया क्या है? सुनील दोनों फिल्मों का विश्लेषण करते हैं-‘बाम्बे टू गोवा भी अच्छी फिल्म थी। वह कितना चली, नहीं चली...यह दीगर बात है। भावनाओं...की कहानी अवश्य 1000 करोड़ की प्रापर्टी के इर्द-गिर्द रची गई है, लेकिन इसका ट्रैक बाम्बे टू...से डिफरेंट है। इसमें राजू, एहसान, जॉनी लीवर, नवीन प्रभाकर, उदय दाहिया आदि सबने अपने टैलेंट का 100 परसेंट आउटपुट देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।’
सुनील अपनी भावनाओं को सिनेप्रेमियों तक पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। वे उत्साह से बोलते हैं-‘पब्लिसिटी को नजरअंदाज कतई नहीं किया जा सकता। मैं दिल्ली और मुंबई के अलावा जहां भी शो करने गया या जाता हूं, वहां के लोगों को अपनी फिल्म देखने के लिए आमंत्रित करना नहीं भूलता। वहीं कई चैनल्स के प्रोग्रामों में भी हमें आमंत्रित किया गया है, जिनमें आप समय-समय पर हमारी टीम के फन का आनंद उठा सकेंगे। मैं तो अपनी ओर से अच्छी पब्लिसिटी कर रहा हूं, भगवान ने चाहा तो सबकुछ बेहतर होगा।’
‘द ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज प्रथम’ के बाद कॉमेडी शोज में ‘अभद्र भाषा और फूहड़ शैली’ के घालमेल पर सुनील एकदम दो टूक बोलते हैं-‘इसके लिए अकेले चैनलों पर दोष मढ़ना गलत है।...और इस बुराई के लिए कॉमेडियंस तो कतई जिम्मेदार नहीं। अगर दर्शक ऐसे प्रोग्राम्स को नकार देंगे, तो चैनलों की क्या मजाल, जो वे दुबारा ऐसे प्रोग्राम्स बनाएं? कहते हैं न कि कसाई से ज्यादा मांस का सेवन करने वाला जिम्मेदार होता है।’
सुनील कहां से ढूंढते हैं कॉमिक पंच? वे दार्शनिक लहजे में बोलते हैं-‘आपका सेंस आॅफ ह्यूमर लाजवाब होना चाहिए, हर चीज को देखकर, महसूस करके या उसके संपर्क में आकर आप आनंदित हो सकते हैं। मैं भी रोजमर्रा की चीजों, आप और हमलोगों से जुड़ीं बातों को ही चुटकुलों/कविताओं में इस्तेमाल करता हूं। बस उनमें थोड़ा मिर्च-मसाला डाल देता हूं, ताकि वे श्रोताओं को भीतर तक गुदगुदा दें।’
सुनील पाकिस्तानी कॉमेडियंस की बढ़ती लोकप्रियता से कतई आशंकित नहीं है। वे बिंदास बोलते हैं-‘अगर वे यहां आकर अपनी कला का प्रदर्शन करके कमा-खा रहे हैं, तो इसमें बुराई क्या है? वे भी हमारी तरह कलाकार हैं और कला सियासी सरहदों से परे है।’
अपने जन्मस्थली चंदनपुर के प्रति अटूट प्रेम रखने वाले सुनील कहते हैं-‘कर्मभूमि और जन्मभूमि; हमें दोनों का बराबर सम्मान करना चाहिए। हम जिधर भी जाएं, उस जमीं का सम्मान भी हमें करना आना चाहिए।’
सुनील ने ‘फिर हेराफेरी(2006)’ और ‘अपना सपना मनी-मनी(2006) जैसी हिट फिल्मों में मामूली किरदार भी निभाया है। हालांकि इसके बाद उन्हें ‘फूल एन फाइनल(2007)’ और ‘क्रेजी-4(2008)’ में अपना टैलेंट दिखाने का ठीक मौका मिला। सुनील दार्शनिक लहजा अख्तियार करते हैं-‘उन्हीं छोटे-छोटे कामों ने मुझे इस मुकाम पर पहुंचाया कि; मैं आज फिल्म प्रोड्यूस कर रहा हूं, लिख रहा हूं और उसे डायरेक्टर भी कर रहा हूं। आप छोटे-बड़े के फेर में न पड़ते हुए निरंतर अच्छा कार्य करते जाइए, रिजल्ट बेहतर मिलता रहेगा।’
सुनील का सूत्रवाक्य है-‘जहां माल, वहां पाल!’ इसका क्या आशय है? सुनील दो टूक कहते हैं-‘मुझे ईश्वर ने लोगों को हंसाने का हुनर दिया है, सो मैं उससे अपना घर-परिवार चला रहा हूं। वैसे यह वाक्य मैंने चुनावी प्रचार के लिए तैयार किया हुआ है। दरअसल, चुनाव के बाद नेता और जनता दोनों अपने-अपने कामों में व्यस्त हो जाते हैं। ऐसे में यदि कोई पार्टी सभाओं में भीड़ जुटाने हमारे फन को इस्तेमाल करती है, तो हम पैसा क्यों न कमाएं?’

फिल्म में मेरा किरदार है सबसे निराला, बना हूं मैं इसमें एडवोकेट बाबूलाल फांसीवाला! मुझे यह फिल्म करते वक्त खूब मजा आया। शूट करते वक्त हम खुद भी हंस-हंसकर लोटपोट हो जाते थे। इससे आप आकलन कर सकते हैं कि मूवी आपको कितना गुदगुदाएगी। एहसान कुरैशी, फिल्म के मुख्य कलाकार
यकीन मानिए, मूवी आपका भरपूर मनोरंजन करेगी। यह मेरे करियर की पहली मूवी है। इसमें मैंने छोटू छटेला का किरदार निभाया है, जो डॉन है। सुनील सिर्फ अच्छे कॉमेडियन ही नहीं है, इस फिल्म के माध्यम से उन्होंने साबित कर दिया है कि वे डायरेक्टर भी बेहतर हैं। उदय दहिया, फिल्म के मुख्य कलाकार

-मूवी में मध्यप्रदेश के तीन मशहूर कॉमेडियंस एहसान कुरैशी, उदय दाहिया और केके नायकर भी महत्वपूर्ण रोल में हैं। -13 जनवरी को मुंबई में गिनीज बुक के रिप्रजेंटेटिव के समक्ष होगा मूवी का प्रीमियर। -सुनील ‘द ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज-2005’ के विनर रहे हैं। यह कॉमेडी शो स्टार वन पर प्रसारित हुआ था।

रविवार, 3 जनवरी 2010

चेतन भगत की तरह आफाक अलमास हुसैन भी छले गए हैं


‘इडियट्स’ ही नहीं, ‘मुन्नाभाई‘ भी छलिया!
अमिताभ फरोग
यह सिर्फ चिकोटीभर काटने का मामला नहीं है, विधु विनोद चोपड़ा पर एक नहीं; दो बार छल-कपट का आरोप लगा है। ‘3 इडियट्स’ चेतन भगत; तो ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ आफाक अलमास हुसैन के लिए ‘छलिया’ साबित हुई है। हालांकि दोनों ही लेखकों ने ‘फिल्म लेखक संघ’ में अपनी शिकायत न ले जाकर सीधे मीडिया के सामने भड़ास निकाली है, इसलिए ‘संघ’ चुप्पी साधे हुए है।

यह सफलता के ‘रंग में भंग’ पड़ने-सरीखा मामला है। ...और ऐसा दूसरी बार हुआ है। चेतन भगत ने सिर्फ ‘3 इडियट्स’ के प्रोड्यूसर विधु विनोद चोपड़ा और निर्देशक राजकुमार हीरानी पर ‘श्रेय छीनने’ का आरोप मढ़ा है, आफाक अलमास हुसैन ने तो ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ की स्क्रिप्ट पर चोरी का इल्जाम लगाते हुए लीगल नोटिस तक भेजा था। यह दीगर बात है कि; यह कदम थोड़ी देर से उठाया गया, इसलिए विवाद तूल नहीं पकड़ सका।
विधु और राजकुमार ने ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ के माध्यम से भले ही दुनियाभर को नैतिकता का पाठ पढ़ाया हो, लेकिन वे स्वयं दूध के धुले नहीं है। कुछ महीने पहले ‘भोपाल ग्रुप आॅफ गांधी स्टार्स’ ने आरोप लगाया था कि; ‘लगे रहो...’ का सेंट्रल आइडिया और कहानी का मूलभूत ढांचा जानेमाने लेखक और निर्देशक आफाक अलमास हुसैन की पुस्तक ‘महात्मा’ से चुराया गया है। पिछले वर्ष ग्रुप ने इस बाबत आगरा में प्रेस कान्फेंस भी आयोजित की थी।
मूलत : लखनऊ के श्री आफाक मायूसी भरे शब्दों में बोलते हैं-‘यह पुस्तक मैंने 12 वर्ष पहले लिखी थी। इसी विषय पर वर्ष 1994 में महात्मा की वापसी नाम से नाटक का मंचन भी किया गया था। इसका निर्देशन मैंने स्वयं किया था। जिन लोगों ने यह पुस्तक पढ़ी है या फिर इस नाटक के दर्शक रहे हैं, वे बेहतर समझ सकते हैं कि लगे रहो...की स्क्रिप्ट का बेसिक कन्सेप्ट कहां से उठाया गया?’
उल्लेखनीय है कि यह पुस्तक उप्र सरकार के संस्थान ‘फखरुद्दीन अली अहमद मेमोरियल कमेटी’ के आर्थिक सहयोग से 1998 में उर्दू भाषा में प्रकाशित हुई थी।
आफाक दु:खी मन से कहते हैं-‘सितंबर 2006 में लगे रहो.. रिलीज हुई थी। मैंने तत्काल विधु विनोद और राजकुमार हीरानी से मिलने की कोशिश की, लेकिन वे कोई न कोई बहाना बनाकर मुझे टालते रहे। मैंने उन्हें एसएमएस भी भेजा, लेकिन जवाब नहीं मिला। मेरे पास इतना पैसा नहीं था कि, इतने अमीर लोगों से टक्कर ले सकूं। इस ऊहापोह में करीब 8-9 महीने निकल गए। इस दौरान जब मैं मुंबई से लखनऊ आया, तब अपने वकील आदित्य तिवारी की मदद से निर्माता और लेखक दोनों को नोटिस पहुंचाया। उनकी तरफ से कोई जवाब न मिलने पर उन्हें रिमाइंडर भी पहुंचाया। इस बीच मेरी कुछ पर्सनल प्रॉब्लम भी रही, जिनके कारण मुझे अपने इस कदम पीछे लेने पड़े।’
‘3 इडियट्स’ को लेकर उठे ताजा विवाद पर आफाक कहते हैं-‘चेतन को उनका प्रॉपर क्रेडिट मिलना ही चाहिए था। चेतन चर्चित लेखक हैं, इसलिए मीडिया का भी उन्हें बहुत सपोर्ट मिल रहा है, लेकिन मैं अकेले जूझता रहा। मेरी लड़ाई भले ही अधूरी रही गई हो, लेकिन इससे गुनाह तो कम नहीं हो जाता?
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मैं आज भी अपनी बात पर अडिग हूं, कि लगे रहो मुन्नाभाई की कहानी मेरी पुस्तक महात्मा से प्रेरित है। मैंने इस फिल्म के रिलीज होने के बाद विधु विनोद चोपड़ा को अपने वकील के माध्यम से नोटिस भी भेजा था, लेकिन उन्होंने खामोशी ओढ़े रखी। आर्थिक परिस्थिति बोलो या कुछ और; मैं सही वक्त पर लीगल एक्शन नहीं ले सका। जहां तक फिल्म लेखक संघ में शिकायत दर्ज कराने का मामला है, तो पुस्तक कॉपीराइट थी, इसलिए वहां जाने की जरूरत क्या थी? वैसे भी संघ निर्माता/निर्देशकों के विरुद्ध कभी एक्शन नहीं लेता। विवाद ज्यादा तूल पकड़ने लगे, तो वह बैठाकर समझौता करा देते हैं। भले ही अब मैं कुछ लीगल एक्शन नहीं ले सकता, लेकिन जो सच है, वो तो सच ही रहेगा।
आफाक अलमास हुसैन लेखक, महात्मा (लगे रहो मुन्नाभाई इस किताब से प्रेरित बताई जाती है)

‘यदि कोई लेखक एसोसिएशन में आकर कम्प्लेन करता है, तो हम मामले को सुलटाने का प्रयास करते हैं। चेतन भगत सीधे मीडिया के पास चले गए, इसलिए मैं इस बारे में कोई कमेंट नहीं कर सकता। फिल्म इंडस्ट्री एक फैमिली की तरह है, इसमें विवाद भी होते हैं और उनका निपटारा भी किया जाता है। न तो चेतन भगत और न ही आफाक अलमास एसोसिएशन के पास शिकायत लेकर आए, इसलिए इस बारे में हम कुछ नहीं कर सकते।’
जलीश शेरवानी अध्यक्ष, फिल्म लेखक संघ
फैक्ट
-करीब 35 करोड़ के बजट की ‘3 इडियट्स’ ने 2 अरब का बिजनेस कर चुकी है -करीब 15 करोड़ लागत की ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ ने करीब 56 करोड़ का बिजनेस किया था। -अभिजात जोशी हैं ‘3 इडियट्स’ और ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ के लेखक -आफाक अलमास दुनिया के दूसरे बड़े प्ले ‘मोहब्बत द ताज’ के निर्देशक रहे हैं और इन दिनों मुंबई में कई सीरियल लिख रहे हैं।

शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

पंकज त्रिपाठी (सीरियल ‘पाउडर’ के नवेद अंसारी)


सोचा न था डॉन बनूंगा
अमिताभ फरोग
यह बमुश्किल पांच वर्ष पुराना किस्सा है। ठेठ कस्बाई एक युवा ऊंचे ख्वाब लेकर मायानगरी पहुंचता है। तब करोड़ों की आबादी से भरी/ठुंसी मुंबई नगरिया में वह भी भीड़ का हिस्सा मात्र था। एक स्ट्रगलर एक्टर! आज जुहू जैसे पॉश एरिया में उसके 50/50 फीट के होर्डिंग लगे हैं। ‘ऐसा सिर्फ मायानगरी में ही संभव है!’ रविवार से सोनी चैनल पर शुरू हो रहे टेलीविजन इंडस्ट्री के संभवत: सबसे महंगे फिक्शन ‘पाउडर’ में ड्रग माफिया नवेद अंसारी के कैरेक्टर को निभा रहे पंकज बयां कर रहे हैं कि; उन्होंने लाखों स्ट्रगलर्स की भीड़ में कैसे स्थापित की खुद की पहचान?

पंकज एक किस्सा सुनाते हैं-‘मैंने कुछ दिन पहले ही कार खरीदी है। थोड़ा वक्त निकालकर मैं अपनी पत्नी के संग जुहू चौपाटी घूमने निकला। वहां ‘पाउडर’ के प्रमोशन बाबत मेरे बड़े-बड़े होर्डिंग लगाए गए हैं। यह देखकर कितनी खुशी हुई, शब्दों में बयां नहीं कर सकता। आप कल्पना कर सकते हैं कि; पांच वर्ष पहले मैं लोगों से रास्ता पूछते-पूछते जिस प्लेस पर पहुंचा था, वहां आज मेरे बड़े-बड़े होर्डिंगं लगे हुए हैं। शायद इसीलिए मुंबई को मायानगरी कहते हैं!’
बड़े पर्दे पर ड्रामा गढ़ने वाले विशाल भारद्वाज की ओमकारा(2006) में ‘किचलू’ जैसा छोटा-सा किरदार निभा चुके पंकज खुद को कुछ यूं परिभाषित करते हैं-‘मैं कभी छोटे-बड़े रोल के फेर में नहीं पड़ा। हां, इसका विश्लेषण अवश्य किया कि; फलां कैरेक्टर दर्शकों पर कितना प्रभाव छोड़ पाएगा? इसे सौभाग्य कहें, या मेरे काम चुनने का तरीका; चाहे ओमकारा हो या शौर्य, मेरा हर रोल फिल्म का टर्निंग पाइंट रहा है।’
फिल्मों की बात हो या टेलीविजन पर ‘बाहुबली’और अब ‘पाउडर’ का मामला अथवा टाटा टी का ‘जागो रे’ व आइडिया सेल्युलर का ‘नो...’ एड कैम्पेन; पंकज को निगेटिव शेड ही मिले हैं, क्यों? पंकज हंसते हैं-‘शायद मेरी शक्ल विलेन-सी है! खैर, यह अजीब संयोग ही है, लेकिन मैं मुंबई सिर्फ एक्टर बनने आया था, हीरो या विलेन नहीं। मैंने भावना तलवार के निर्देशन में धर्म मूवी की; इसमें भी मैं निगेटिव शेड में था। मेरे लिए यह मूवी कई मायनों में खास थी, पहला मेरा कैरेक्टर बेहद सशक्त था, दूसरा मुझे पंकज कपूर जैसे मझे हुए अभिनेता के संग कार्य करने का मौका मिला। यह मूवी कान्स फिल्म फेस्टिवल-07 और इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल आॅफ इंडिया-07 सभी जगह खूब सराही गई। वैसे मैं हर तरह के रोल निभाना चाहता हूं। मणिरत्नम की रावण में एक हिजड़ा बना हूं। यह बेहद चैलेंजिंग कैरेक्टर है। कुशर प्रसाद का भूत में मेरा कैरेक्टर एक देहाती आदमी का प्रतिनिधित्व करता है। प्रियदर्शन के साथ भी एक मूवी कर रहा हूं। इसमें अक्षय कुमार, अजय देवगन और परेश रावल जैसे स्टार काम कर रहे हैं। प्रियदर्शन के नाम से ही आप आकलन कर सकते हैं कि यह मूवी दर्शकों को हंसाएगी।’
यशराज कैम्प तक पहुंच? पंकज कहते हैं-‘कैम्प कोई भी हो; अगर आपकी एप्रोच सही है, आप टैलेंटेड हैं; तो चांस जरूर मिलता है। मुझे अमिताभ बच्चन अभिनीत तीन पत्ती में एक छोटा-सा रोल आॅफर किया गया था। किन्हीं कारणों से मैंने मना कर दिया। वहां यशराज प्रोडक्शन के हेड कास्टिंग डायरेक्टर अभिमन्यु से मुलाकात हुई थी। उन्होंने मुझे आदित्य चोपड़ा से मिलवाया। चार राउंड में ऑडीसन टेस्ट हुआ, तब कहीं जाकर मुझे नवेद कैरेक्टर के लिए सिलेक्ट किया गया।’
‘अंडरवर्ल्ड’ विषय पर सिनेमा और टेलीविजन दोनों में खूब काम हुआ है, ऐसे में ‘पाउडर’ कितना असरकारक साबित होगा? पंकज उत्साह से बोलते हैं-‘यह शो सिर्फ ड्रग्स माफिया की कहानीभर नहीं है, इसमें मानवीय संबंधों की बुनावट भी देखने को मिलेगी। मुझे यकीन है कि पाउडर टेलीविजन इंडस्ट्री की प्रोडक्शन वैल्यू में आमूल-चूल बदलाव ला देगा। इंडियन टेलीविजन में यह ऐसा पहला शो है, जिसे सिनेमा कैमरे से शूट किया गया है। इसमें एक्चुअल लोकेशंस यूज की गई हैं। दुबई, बैंकॉक, मनाली, दिल्ली, गोवा; कहानी में जो लोकेशन चाहिए थी, हम वहां गए। शो को सिनेमाई भव्यता देने के मकसद से एक एपीसोड शूट करने में 10 दिन तक लगे हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि; सीरियल में ऐसी-ऐसी महंगी प्रॉपर्टी इस्तेमाल की गई हैं, जो बड़े बजट की फिल्मों में ही पॉसिबल हैं। आपने कई फिल्मों में लिमोजिन कार देखी होगी। करीब ढाई करोड़ की यह गाड़ी विशेष आर्डर पर तैयार होती है। दुबई में हमारी शूटिंग के दौरान इसे इस्तेमाल किया गया। बजट भी किसी दूसरे शो के मुकाबले दोगुना तक खर्च हुआ है। कहने का आशय यह है कि; टेलीविजन में ऐसा साहस यशराज कैम्प ही कर सकता है। प्रोडक्शन वैल्यू के लिहाज से यह ग्रेट वर्क है। इसके प्रोडक्शन से जुड़ा हर क्रियेटिव पर्सन स्पेशल है। मसलन : इसे लिखा है रामू की कई फिल्मों के लेखक अतुल संभरवाल ने। इसमें ख्यात स्टंट डायरेक्टर श्याम कौशल ने एक्शन की कमान संभाली है। वहीं सिनेमाटोग्राफी केजी गणेशन की है। यानी हर बंदा फिल्म सिनेमा में जबर्दस्त काम कर चुका है।’
भोपाल में फिल्म प्रोडक्शन की संभावनाओं पर बतियाते वक्त पंकज उत्साहित हो जाते हैं-‘भोपाल मेरे दिल के बहुत करीब है। मैंने यहां दो प्रोजेक्ट किए हैं। पिछले वर्ष यहां कुशर प्रसाद का भूत मूवी की शूटिंग करने आया था। मेरा नजरिया है कि; आने वाले 10 वर्ष में मुंबई के बाद भोपाल दूसरा बड़ा फिल्मी हब बनने जा रहा है। भोपाल फिल्म प्रोडक्शन के प्रत्येक पैमाने पर फिट बैठता है। यह शहर सस्ता है, सुगम है और लोकेशंस भी बेशुमार हैं। यहां हर साल दो-तीन प्रोडक्शन हाउस डेरा जमाए रहते हैं। आपको बता दें कि रावण की शूटिंग भी भोपाल में ही प्रस्तावित थी। यह पिछली फरवरी की बात है, तब यहां प्रकाश झा राजनीति और आमिर खान द फॉलिंग की शूटिंग कर रहे थे। इसलिए सारे होटल बुक थे। आखिरकार मणिरत्नम को अपनी करीब 500 यूनिट की टीम को लेकर कोलकाता कूच करना पड़ा। यह फिल्म भी मेगा स्टारर है।’
आपकी नजर में सफलता का पैमाना? पंकज बगैर लागलपेट के बोलते हैं-‘मेरा सोचना है कि दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं है। हां, इसके लिए आपको ठीक रास्ते पर चलना होगा, ईमानदारी से अपने कार्य को अंजाम देना होगा। ईमानदारी सिर्फ प्रोफेशन में ही नहीं; लाइफ में भी अत्यंत आवश्यक है। किसी का दिल न दु:खाओ, अपने लक्ष्य को पाने निरंतर कड़ी मेहनत करते रहिए। जो जितना डिजर्व करता है, उसे उतना अचीव अवश्य होता है।’