सोमवार, 12 जनवरी 2009


हर शाख पे उल्लू बैठा है...

कैसे जीतोगे दौड़ यहां, हर गधे पर चार सवार हैं।
हर शाख पे उल्लू बैठा है, और बाकी भी तैयार हैं।।

दोष भले ही किसका हो, पर यूं न जलती लंका।
मरता क्या न करता रावण, विभीषण बेशुमार हैं।।

गांठ बांध लो, नेताओं की नहीं होती कोई जात।
खाल खींचकर भूसा भरते, सबके सब चमार हैं।।

मंचों से तो बहुत हो चुकीं, इंकलाब की बातें।
करो बगावत खुद ही बढ़कर, बाकी सब बीमार हैं।।

अमिताभ बुधौलिया 'फरोग'

7 टिप्‍पणियां:

समयचक्र - महेद्र मिश्रा ने कहा…

हर साख पे उल्लू बैठा है, और बाकी भी तैयार..
बाकी गुलिस्ता का क्या होगा ?
बहुत उम्दा रोचक रचना प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद्.

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत बढिया।

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत सही एवं सटीक!!! आनन्द आ गया इस सीधे वार पर.

नीरज गोस्वामी ने कहा…

आज के हालात पर सीधी चोट करती रचना...वाह...
नीरज

बेनामी ने कहा…

kavita ishaaron se bahut kuch keh rehi hai,"chamaar" shabd ki jagah koi aur shabd prayog ho to aapatti karne waalon ki sankhya kam ho sakti hai.dhanyawaad.

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