शुक्रवार, 13 मार्च 2009


गुलामी से बेहतर है संघर्ष : चेतन

फिल्म राजनीति में अभिनय करने वाले चेतन पंडित कहते हैं कि भोपाल बहुत खूबसूरत शहर है। यहां की लोकेशन किसी भी फिल्म निर्माता को अपनी ओर खींच सकती है।
जिन आंखों में सपने होते हैं, उन आंखों में भविष्य होता है और जहां भविष्य होता है, वहां आगे बढ़ने की अदम्य इच्छाशक्ति का संचय होने लगता है। गुलामी के कसैले अहसासों से निरंतर संघर्ष करने को बेहतर बताने वाले अभिनेता चेतन पंडित हिन्दुस्तानी फिल्म को किसी दायरे में समेटना नहीं चाहते। इन दिनों उनकी केंद्रीय चिंता में प्रदेश में एक मजबूत और बेहतर फिल्म इंडस्ट्री का निर्माण होना है। इसमें संस्कृति और इतिहास की शानदार चीजें शामिल हों। इस अनूठे प्रयास को साकार करने की दिशा में अपनी पहल और इस दौर की राजनीति और कला जगत से जुड़ी हर पहलू पर उन्होंने बड़ी संजीदगी और ईमानदारी से बेबाक संवाद किया। चेतन पंडित इन दिनों प्रकाश झा की फिल्म राजनीति में राजनेता की भूमिका अदा कर रहे हैं। इससे पूर्व उन्होंने प्रकाश झा के साथ गंगाजल, लोकनायक, अपहरण जैसी फिल्मों में काम किया है। विश्राम सावंत के निर्देशन में उनकी अगली फिल्म 26 नवंबर को हुए मुंबई हमले पर आधारित है, इस फिल्म में वे मेजर उन्नीकृषणन की भूमिका में होंगे।

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने चेतन पंडित को कितना गढ़ा?
गुरु हमें सिखाते हैं या नहीं, ऐसा सोचकर हम कभी नहीं सीख सकते। हमारी प्रवृत्ति तो ऐसी होनी चाहिए कि हम कैसे और क्या सीखें। हमें अपने अंदर इतनी कूव्वत पैदा करनी चाहिए कि गुरु हमें सिखाने के लिए बाध्य हो।

विद्यालय में प्रवेश के लिए किसी प्रकार की विशेष तैयारी ?
दाखिले से पूर्व भारत भवन के बहिरंग प्रांगण में गोपाल दुबे जी ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की तैयारी में मदद की थी।

बतौर कलाकार मुंबई में कितना संघर्ष करना पड़ा?
गुलामी के कसैले अहसासों से निरंतर संघर्ष को मैं बेहतर मानता हूं। आज जो जहां हैं, सभी को अपने-अपने ढंग से संघर्ष करना पड़ रहा है। यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। मुंबई जाने के बाद हमने एफ.एम. में बतौर उद्घोषक काम किया। उस दौरान प्रतिदिन चार निर्माता-निर्देशक के पास अपनी पोर्टफोलियो के साथ जाया करते थे। यही संपर्क आगे काम आया। इसी तरह मैं एकता कपूर, प्रकाश झा से मिला था। जब प्रकाश झा लोकनायक जयप्रकाश पर फिल्म बनाने की बात सोच रहे थे, तो उन्हें मेरी याद आई और उन्होंने मुझे बुलवा भेजा। उन्होंने मुझे इशारा भर किया था और मैं उत्साह और आत्मविश्वास के साथ हां कह दिया। इसके बाद हमने लोकनायक पर अध्ययन करना शुरू किया। इससे पूर्व सेंट्रल स्कूल में पढ़ाई के दौरान सिर्फ एक अध्याय ही उन पर पढ़ा था। जब उन पर अध्ययन प्रारंभ किया तो उनका शख्सियत सही मायने में समझ में आया।

आपके पसंदीदा लेखक?
वैसे तो हमने दुनिया की कई भाषाओं और कई विधाओं की पुस्तकें पढ़ता हूं, लेकिन मुझे प्रेमचंद की बूढ़ी काकी और ईदगाह कहानी आज भी याद है। बंगला उपन्यास कोसाई बागान का भूत, रविशंकर की पत्नी और उस्ताद अलाउद्दीन खां साहब की बेटी अन्नपूर्णा की जीवनी मुझे बहुत प्रिय है।

सिनेमा को ग्लेमर मानने वाले नवोदित कलाकारों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
सतही ग्लेमर देखकर नहीं,पूरी तैयारी और आत्मविश्वास के साथ फिल्म इंडस्ट्री में आए। मप्र में कलाकारों में अद्भुत अभिनय क्षमता है, इसलिए निरंतर कार्यशाला आयोजित होने चाहिए। उन्होंने एक कविता सुनाकर कि पेड़ खड़े हैं, क्योंकि जमीन से गड़े हैं।

क्या आपके जीवन में कनुप्रिया के आने से आपके बहुआयामी प्रतिभा को विस्तार मिला?
कनु द्वारा संचालित चिल्ड्रेन थिएटर किल्लौल में संगीत देता हूं। कनु निरंतर बच्चों के लिए कार्यशाला आयोजत करती हैं। अभी गर्मी में पृथ्वी थिएटर के साथ मिलकर कार्यशाला आयोजित करने जा रही हैं।

स्त्री शक्ति को आप किस तरह परिभाषित करेंगे?
मां ने मुझे पहली बार नाटक के लिए मंच दिया। आदिशक्ति के रूप में हम देवी को पूजते हैं। मैं यह मानता हूं कि हर दिन स्त्री के नाम होना चाहिए। वैचारिक रूप से हमें उनका सम्मान करना चाहिए, न कि एक दिन। लेकिन पिता की भूमिका भी मेरे लिए मायने रखता है, क्योंकि उन्होंने मुझे सदा मार्गदर्शन किया।

कहीं सचमुच राजनेता बनने का इरादा तो नहीं?
बिल्कुल नहीं, अभिनय में अभी लम्बी यात्रा तय करनी है।

यह साक्षात्कार भोपाल से प्रकाशित पीपुल्स समाचार के लिए रूबी सरकार ने लिया था

1 टिप्पणी:

rs00033@gmail.com ने कहा…

कृपया मेरे ब्लॉग
http://cartattack.blogspot.com/2009/03/blog-post_2890.html
पर आयें और टिप्पणी अवश्य करें.