सोमवार, 2 मार्च 2009


रंगों-चित्रों में रचा-बसा अभिनेता

अभिनेता, फोटोग्राफर, चित्रकार, कवि, स्कल्पचर और लेखक, यदि एक ही व्यक्ति में यह सारी खूबियां मौजूद हों तो उसे हरफनमौला की संज्ञा दी जा सक·ती है। सुरेन्द्र राजन ऐसा ही व्यक्तित्व हैं। मुन्नाभाई एमबीबीएस, लिजेंड ऑफ भगतसिंह और कई हॉलीवुड फिल्मों में अहम भूमिका निभा चुके सुरेंद्रजी अब छोटे पर्दे पर 'बंदिनी' सीरियल में माधो सौलंकी की भूमिका निभा रहे हैं। सुरेंद्रजी अजयगढ़(पन्ना) के रहने वाले हैं। उम्र के 7०वें दशक में भी अपनी जिंदादिली और हंसमुख स्वभाव के लिए चर्चित सुरेन्द्रजी एक निजी कार्यक्रम में हिस्सा लेने भोपाल में थे।

धोखे से पहुंचा फिल्मों में
मैं मूल रूप से फोटोग्राफर और चित्रकार ही हूं। फिल्मों में तो धोखे से आ गया। प्रकाश झा की फिल्म परिणति में कला निर्देशक था। एक दिन उनका मेकअपमैन नहीं आया। प्रकाश और मेरी बात हुई और मैंने मेकअपमैन का काम शुरू कर दिया। उस फिल्म के लिए स्टिल फोटोग्राफी भी की। इसी फिल्म में एक कैरेक्टर था 'भोपा' का। प्रकाश और फिल्म की हीरोइन सुरेखा सीकरी के बीच बात हुई कि इस कैरेक्टर के लिए बिल्कुल वैसा व्यक्ति चाहिए, जैसा कि हमारा आर्ट डायरेक्टर दिखता है। सुरेखा ने कहा कि उन्हीं को इस किरदार में ले लो। प्रकाश का जवाब था -'मैं पहले ही उससे बहुत काम करा चुका हूं अब इसके लिए नहीं कह सकता।' तब सुरेखा ने मुझे इसके लिए राजी किया। मैंने सोचा पहला और आखिरी काम होगा। फिल्म रिलीज हो गई। इसके बाद अरूंधती राय ने मुझे अपनी फिल्म 'इलेक्ट्रिक मून' करने के लिए कहा। मेरे न कहने पर अरूंधती का जवाब था-'आपने उस फिल्म में तो काम कर लिया मुझे मना कर रहे हैं।' बस सिलसिला शुरू हो गया। इसके बाद मैं लोगों से कहता रहा मैं एक्टर नहीं हूं, लेकिन लोग मुझे अभिनय की तरफ मोड़ते चले गए।
अब भी अभिनय से जुड़ नहीं पाया
मेरा कोई ड्रीम रोल नहीं। कई फिल्मों में अभिनय किया है। मुन्नाभाई में जादू की झप्पी लेते मकसूद भाई के अलावा नेताजी सुभाषचंद्र बोस, वीर सावरकर जैसी चार-पांच फिल्मों में महात्मा गांधी की भूमिका की है। वन नाइट विथ द किंग सहित कई अंग्रेजी फिल्में भी की हैं। अब भी अभिनय कर रहा हूं, लेकिन इस प्रोफेशन से अटैच नहीं हो पाया। यहीं वजह है न मुझे अपने किए किसी किरदार से गहरा लगाव है और न ही मेरा कोई ड्रीम रोल। मैं उस मोची की तरह हूं जो हर तरह के जूते सी सकता है। घृणा भरे रोल नहीं कर सकता' किसी भी रोल को करने के लिए मैं ज्यादा नहीं सोचता। बस यह जरूर देखता हूं कि उसका डायरेक्टर घटिया न हो। हां, मैं ऐसा कैरेक्टर प्ले नहीं कर सकता' जिससे लोग घृणा करें। हालांकि इस प्रोफेशन में हर तरह के रोल करना चाहिए, लेकिन मैं टोटल नेगेटिव रोल प्ले नहीं कर पाता। ग्लिसरीन लगाना पसंद नहीं। इतने लंबे कैरियर में बंदिनी मेरा पहला टेलीविजन सीरियल है। पहले कोई टीवी सीरियल नहीं किया क्योंकि मैं खुद टीवी शोज को एक मिनट भी बर्दाश्त नहीं कर पाता। इनमें केवल रोना-धोना और साजिशें ही होती हैं। मैं रोने में नहीं बल्कि हंसाने में विश्वास करता हूं। ग्लिसरीन लगाना मुझे अब भी पसंद नहीं आता। बंदिनी का प्रस्ताव मेरे पास बालाजी टेलीविजन की रोशन लेकर आई थी। उसने मुझे काफी कंवेंस किया। सीरियल की थीम अच्छी थी और सबसे बड़ी बात इसमें समाज को अच्छा संदेश देने की कोशिश की जा रही थी, इसलिए मैं तैयार हो गया।

सीरियल तो जवानों को भी बेहोश कर देते हैं
मुझे लगता है सीरियल में कलाकार को काफी निचोड़ा जाता है। (हंसते हुए) इसमें तो तगड़े से तगड़े जवान भी बेहोश हो जाते हैं, मेरी तो फिर उम्र हो गई है। यही वजह है कि मैं इस सीरियल में अपनी शर्तों पर काम करने को तैयार हुआ। मैं बंदिनी के लिए अपनी क्षमता से अधिक काम नहीं करता।

सुरेन्द्र राजन के बारे में
सुरेन्द्र राजन का मप्र संस्कृति विभाग से गहरा जुड़ाव है। वे संस्कृति विभाग के विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी रहे हैं। इसके अलावा सुरेन्द्र राजन ने मप्र आदिवासी लोककला परिषद के प्रथम सचिव की कमान भी संभाली है। भोपाल में उनके परम मित्र नवल शुक्ला बताते हैं कि सुरेन्द्रजी ने अपनी रचनात्मकता की शुरूआत फोटोग्राफी से की। उन्हें रघु रॉय के बाद उसी स्तर के कलाकारों में शुमार किया जाता है। देश-विदेश के नामी अखबारों के लिए स्टिल फोटोग्राफी के साथ ही मूर्तिकला और लेखन में भी वे समान रूप से सक्रिय रहे। नवल शुक्ला कहते हैं-'सुरेन्द्र घुमक्कड़ प्रवृत्ति के हैं। इनका कोई ठौर-ठिकाना नहीं। इन्होंने मप्र व बाहर के आदिवासियों के लिए भी सक्रिय रूप से काम किया है। सच कहूं तो यह केवल मप्र के नहीं बल्कि देश भर के साहित्यकारों के प्रिय व्यक्ति हैं।'

(यह साक्षात्कार दैनिक जागरण, भोपाल के लिए पल्लवी वाघेला ने लिया था )

3 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

सुरेन्द्र राजन जी के बारे में जानकारी देने का आभार.

अनिल कान्त : ने कहा…

इतना कुछ बताने के लिए इनके बारे में शुक्रिया

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

दिगम्बर नासवा ने कहा…

विशिष्ट लोगो के बारे में जन कर अच्छा लगता है
राजन जी के बारे पढ़ कर अच्छा लगा